वेदरदिया नै दरदिया जानै हमर
टाकासँ जुल्मी प्रेमकेँ गानै हमर
सदिखन जरैए मन विरहकेँ आगिमे
तैयो पिया नै किछु दरद तानै हमर
साउन बितल घुरियो कऽ नै एला पिया
नहि खीच हुनका प्रेम लऽग आनै हमर
गरजय बिलोका बड्ड बरिसय झिहिर घन
छाती दगध भेलै हिया कानै हमर
बसला पिया ‘मनु’ दूर बड़ परदेशमे
जुल्मी बिना नै मोन ई मानै हमर
(बहरे रजज, मात्राक्रम 2212-2212-2212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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