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गुरुवार, 21 अगस्त 2014

माएक भक्त

दिल्लीसँ पटना जएबाक लेल सम्पूर्ण क्रांतिक द्वितीय श्रेणीक स्लीपर क्लासक डिब्बा भीड़सँ खचा-खच भरल छल। तीन सीटक जगहपर पाँच-पाँचटा लोक बैसल छलाह। साँझक साढ़े पाँच बजे ट्रेन अपन नियत समयसँ चलल। दनादन पूर्ण गतिसँ ट्रेन चलि रहल छल। रातिक लगभग आठ बजे पैंट्रीकार वला हाथमे एकटा पुर्जी नेनेभोजन, भोजन बाजू।बाजैत, पुर्जीपर सीट नम्बर लिखैत आगू बढ़ि रहल छल।

संतोष, ठीक-ठाक भेष-भूषामे समृद्ध घरक लागि रहल छल। जखन पैंट्रीकार वला संतोष लग गेल तँ संतोषक बगलमे बैसल तीन गोटेक समूहमे सँ एकटा २०-२१ वर्षक युवक चट्टे बाजि उठल, “हम तँ गरीब आदमी छी, एतेक महग खाना नहि लेब।

संतोषक मोन ओहि नवयुवकक उतरसँ आहत भेलै तैँ ओहि युवकसँ बाजि उठल, “एहि दुनियामे कियो अमीर-गरीब नहि छैक, सभटा लोकक अपन-अपन मनक भ्रम छैक। आजुक घड़ीमे सभ कियो अमीरे अछि, बस अपनामे विश्वास आ किछु नम्हर करबाक इच्छा होबाक चाही।

हम सभ पाँच-सात हजार रुपैया महिना कमाइ बला तँ गरीबे भेलहुँ ने।

गरीब कोना भेलहुँ? अपन एकटा हाथ एक लाखमे देबै।

नहि।

दोसर हाथक एक लाख रुपैया आओर भेटत।

नहि।

आगू संतोष ओकरासँ किछु आओर बुझितै वा किछु गप्प करितै की संतोषक आगूक सीटपर बैसल एकटा बेस पुष्ट, चानन-ठोप कएने आ टिकी रखने, भेष-भूषासँ नीक विद्वान लागि रहल छला, झटसँ बाजि उठला, “हमरा एक लाख रुपैया दिअ हम अपन हाथ दै छी।

एना नहि भऽ सकै छै, एक लाख रुपैयामे कियो स्वस्थ जवान व्यक्ति अपन हाथ कोना देतै?

हम देब ने, लाबू हमरा एक लाख रुपैया।

दोसरो-दोसरो सभ कहलनि, “नहि! एना तँ नहि भऽ सकैए, कियो एक लाख रुपैयामे अपन हाथ कोना दऽ देतै।

संतोष, “जकरा अपन भगवानपर अपनापर भरोसा छै, अपन माए-बाबू धिया-पुतासँ सिनेह छै, ओ एक लाखमे की करोड़ो रुपैयामे अपन अंग नहि देतै।

देतै किएक नहि, दुनियामे देखियौ आइ लोक सय-सय रुपैया लेल दोसरक जान लऽ लइ छै।

हाँ अहाँक ई गप्प सत अछि, सय-सय रुपैयामे लोक लोकक जान लऽ लइ छै। एक्सीडेंटमे छनमे लोकक जान चलि जाइ छै। हारी-बीमारी, दाही-रौदीमे परिवारक परिवार खत्म भऽ जाइ छैक। डिप्रेशनमे लोक अपने जान अपने लऽ लइ छै। सभ एकटा भिन्न विषय-वस्तु छैक, मुदा एक गोट व्यक्ति मात्र एहि द्वारे कि गरीब अछि अपन अंग बेच देतै, हमरा हिसाबे तँ नहि हेतै।”

भरिसक बुझाबैक चेष्टामे संतोष बाजल, मुदा सामने बला जिद्द वाद-विवादकेँ आगू बढ़ाबैक चेष्टामे एकदम तनि कऽ बाजल, “ सभ रहै दिऔ ने, अहाँ एक लाख रुपैया दिअ, हम अपन हाथ दै छी।

हुनक जिद्द तामससँ मिश्रित गप्पसँ संतोष अपनापर काबू नहि राखि सकल खिसिया कऽ बाजल, “उतरु अगिला स्टेशनपर! अपन हाथ कोनो चलैत ट्रेनक सोझाँ राखू, हाथ कटिते देरी हम अहाँकेँ एक लाख रुपैया देब।

नहि एना नहि पहिने पाइ राखू।

से किएक? पहिने एटीएम मशीनमे कार्ड दै छै, तकर बाद ने पाइ अबै छै! तेनाहिते अहाँ अपन हाथ ट्रेनक नीचाँ राखू, हाथ कटिते देरी हम एक नहि, दस लाख रुपैया देब।

रहए दियौ रहए दियौ, दस लाख रुपैयाक अहाँक ओकाइतो अछि?

हमर ओकाइत छोरु, अपन हाथ काटू  हाथ कटिते देरी हम अहाँकेँ दस लाख रुपैया देब।

------- बस एनाहिते, जे सभ नहि बजबाक चाही, सेहो सभ दुनू गोटेमे होबय लागल। करीब आधा घंटाक वाद-विवादक बाद दोसर-दोसर यात्रिक हस्तक्षेपसँ विवाद कनीक शांत भेल, खत्म नहि।

अहाँ एखन दुनिया नहि देखने छी, लोक पाइ द्वारे की-की करै छै, अपन किडनी धरि बेच दैत छै।

हाँ बेच दै छै, मुदा ओहेन-ओहेन लोककेँ किछु विशेष मजबूरी वा परिस्थिति होइत छैक अथवा ओकरा भगवान अपनापर तनिको भरोसा नहि हेतै।

तँ हमर की परिस्थिति अछि, अहाँ बुझै छी की?”

नहि, हम तँ अहाँक परिस्थिति किछु नहि बुझै छी।

तहन अहाँ कोना कहैत छी जे हम दस लाखमे अपन हाथ नहि देबै?

देखू, अहाँक परिस्थिति हमरा ठीके नहि बुझल, मुदा रुपैयासँ कतेक दिन चलत? एहि हाथसँ जीवन भरि कमा-खा सकै छी।

अहाँक गप्प ठीक अछि, मुदा जखन ओहेन परिस्थिति अबैत छैक, तँ लोककेँ आगू-पाछू  ताकबाक सामर्थ खत्म भऽ जाइ छै।

संतोष कहलक, “अपना जगह अहूँ ठीके छीबिचमे हम बहुत कटू बजलहुँ, क्षमा करब।  मुदा एतेक काल तक नीक-बेजाय वाद-विवादक बाद, हम एतेक तँ जानबाक उम्मीद रखै छी जे अहाँ अपन मजबूरी हमरा बताबी। 

हमर माए दू वर्षसँ बहुत दुखित छथि। दरिभंगासँ पटना, पटनासँ आब दिल्ली एम्सक पाँच माससँ चक्कर काटि रहल छी। कोनो समाधान नहि।

एम्समे की कहैत अछि ?”

कहैत छैक लेफ्ट आर्टरीज ७०% ब्लॉक छनि, ऑपरेशन हेतैन पटनोमे इहे कहलक, मुदा ओतए दू वर्षसँ पहिने ऑपरेशनक डेट नहि। दिल्लीमे चारि माससँ खाली तरह-तरहक टेस्ट कएला बाद आब कहैत अछि जे ऑपरेशन हेतैन ऑपरेशनक तारीख आँगा छह मास बादक देने अछि। छह महिनामे हुनका की हेतैन ....?  प्राइवेटसँ ऑपरेशन कराबी तँ तीन-चारि लाख रुपैयाक खर्चा, हमरा सभ लग जे किछु छल पहिने बेच-बिचुन कऽ सभटा लगा देलहुँ। कहैत माएक प्रति सिनेह अपन लचारीसँ हुनक आँखि नम भऽ गेलैन।

आगू दिल्ली कहिया जाएब?”- संतोष पुछलनि।

ऑपरेशन तारीख तँ छह महिना बादक भेटलन्हि, मुदा दबाइ खाइत महिनामे एक बेर एम्स आबैक लेल कहने अछि।

आब कहिया एम्स जा रहल छी ?”

इहे मासम दिन बाद, पन्द्रह तारीख केर टिकट अछि।

आब एम्स जाएब तँ हमरा फोन कऽ लेब, भऽ सकत तँ हम किछु सहायक हेबऽ।

कोना? कोनो डॉक्टरकेँ चिन्है छी की?

हाँ।

तँ हमरा हुनकर फोन नम्बर दऽ दिअ, नहि तँ हमरा एखने एक बेर गप्प करा दिअ।

एखन नहि हम गप्प करा सकैत छी नहि हम हुनकर नम्बर दऽ सकै छी, किएक तँ केकरो नम्बर देनाइ एलाऊ नहि छैक। हाँ, अहाँ जखन जाएब हमरा फोन कऽ लेब, हमर फोन नम्बर लऽ लिअ। एकटा मनुक्ख बुते जतेक सहायता भऽ सकैत छै, अहाँकेँ भेटत, बांकी भगवतीक कृपा।

रहए दियौ, अहाँ एनाहिते बड़का-बड़का फेकै छी! कनिक काल पहिने एक हाथक बदला दस लाख रुपैया दैत छलहुँ, आब एम्समे अहाँक जान-पहचान भऽ गेल। डॉक्टरक नम्बर मांगै छी तँ एलाऊ नहि छैक। एलाऊ किएक नहि रहतै? एखनो हमरा लग चारि-चारिटा डॉक्टरक नम्बर अछि, मुदा किनकोसँ कोनो मदति नहि भेटल।

अहाँ एहेन बड़का-बड़का फेकबाक गप्प कहि कऽ हमरा उलाहना किएक दैत छी। गप्प अहाँ जखन कहितहुँ जखन हम अहाँक किछु गछि कऽ नहि दैतहुँ कि नहि करितहुँ। एहन तँ नहि भेल अछि। हाथ बला गप्पमे अहाँक हाथ अहाँ लग हमर पाइ हमरा लग। रहल एम्स बला गप्प तँ महिने-महिने अहाँ जाइते छी, एक बेर हमरासँ सेहो गप्प कए लेब किछु सहायता भेल तँ ठीक नहि तँ अहाँकेँ नुकसाने की? हाँ ओकर बादक अपन दुनूक भेटमे अहाँ हमरा एहि तरहक अनर्गल गप्प कहि सकैत छी। कहि संतोष एकटा पुर्जापर अपन नाम संतोष मोबाईल नम्बर लिख हुनका दऽ देलनि। सामने बला सेहो अनमने मोने ओहि पुर्जाकेँ अपन जेबीमे राखि लेलनि।

एक महिना बाद, दिल्ली एम्समे। ओहे संतोषक सामने बला सबारी, अपन माएक संगे। हाथमे मोबाइल रखने ओहिमे संतोषक नम्बर शेव कएने एहि गुनधुनमे की फोन करू की नहि, “झुठ्ठेकेँ ठकने होएत, ठकनेहेँ होएत तँ हमर की लय लेत, एक बेर फोन कइए लै छी।नम्बर लगेलक चट्टसँ घंटी बाजल, “ट्रिन ट्रिन .......”

हेलोदोसर कातसँ

के संतोषजी ?”

जी हाँ, अहाँ के ?”

जी हम मुरारी, महिना भरि पहिने अपन दुनू दिल्लीसँ पटना जाए काल ट्रेनमे भेट भेल रही। अहाँ हमर एक हाथक बदला दस लाख रुपैया दै लेल तैयार रही।

हाँ हाँ मुरारीजी हमरा सभटा याद आबि गेल, कहू की समाचार, माए केहन छथि?”

समाचार की कहू, ओहे माएकेँ लऽ कए दिल्ली आएल छी। सोचलहुँ एक बेर अपनेकेँ कहि दी।

हाँ हाँ बड्ड नीक केलहुँ, एम्स कहिया अबै छी ?”

एखन एम्सेमे छी।

अच्छा ! कोन यूनिटमे देखाबैक अछि ?”

प्रो० एस० चौधरीक यूनिटमे।

अच्छा, माता जीक की नाम छनि ?”

सरोज देवी।

ठीक छैक, अहाँ आबू।उम्हरसँ फोन बंद।

मुरारीजी सोचै लगला, “भेल! सभ गप्प सुनला बाद फोन बंद कऽ देला। हिनको बुते किछु नहि होएत।

मन-मसोसि कऽ आगू बिदा भेला। करीब आधा घंटा पएरे चलला बाद, साढ़े दस बजे ओपीडी पुर्जापर तारीखक मोहर लगा कऽ प्रो० एस० चौधरीक यूनिट पहुँचला। पुर्जा डॉक्टर कक्षकेँ दुआरिपर ठार अर्दलीकेँ दऽ बाहर वेटिंग कुर्सीपर माए संगे अपनों बसि रहला। हुनकासँ पहिने करीब ४०-४५ गोते वेटिंग कुर्सीपर बैसल छलाह। भीर देखि सोचय लगला, “भेल! फोन करबाक चक्करमे आधा घंटा आओर बेसी देरी भऽ गेल, ओकर परिणाम आइ दू बजेसँ पहिने नम्बर आबैक कोनो भरोसा नहि।

मुरारीजी बीतल दू वर्षक दिक्कत कष्टक खाका मोने-मोन तैयार कऽ रहल छलाह। एगारह बजे अर्दली आवाज देलक, “सरोज देवी।

मुरारीजी हरबरा कऽ उठला, “ की! कतए दू बजे नम्बर आबैक उम्मीद छल, कतए ११ बजे न० आबि गेल। हमरासँ पहिलुक सभ तँ एखन ओनाहिते बैसल अछि। मुश्किलसँ तीनो गोटा नहि देखेलकैक अछि।दिमाग सोचैत रहल, मुदा शरीर एतबामे माए सहीत डॉक्टर लग पहुँचि गेल। माए डॉक्टर लग जा पेशेंटक वास्ते बनल स्टूलपर बैसि रहली। मुरारीजी हुनकेँ पांजरमे ठार भेला। डॉक्टर माएक पुर्जापर हुनक नाम देखते देरी पहिने हुनका दुनू हाथ जोरि प्रणाम कएलनि ओकर बाद ध्यानसँ हुनकर पुरनका पुर्जा सभ देखला बाद, अंदर केबिनमे लऽ जा कऽ नीक जकाँ जाँच कएलनि। केविनसँ बाहर आबि, आठ-दसटा जाँचक पुर्जा बना कऽ दैत, अर्दलीकेँ आवाज देलनि अर्दलीक लग एला बाद, “माए जीक संगे जाउ सभटा टेस्ट एखने अपने संगे पूरा करा कऽ, रिपोर्ट हाथो-हाथ नेने आबू।

जीकहैत अर्दली डॉक्टरसँ पुर्जा सभ लेला बाद माएसँ, “चलू।

मुरारीजी हुनकर माए अर्दलीक पाछाँ-पाछाँ स्वचालित मशीन जकाँ बिदा भऽ गेला। जतए-जतए अर्दली लऽ गेलनि ततए-ततए जाइत रहला करीब दू घंटाक बाद, सभटा टेस्ट- जेना इसीजी, अल्ट्रासाउन्ड, एक्स-रे, खून-पेशाब आदिक जाँच भेला बाद,  फेरसँ ओहिठाम डॉक्टर लग आपस एला। डॉक्टर सभटा रिपोर्टकेँ गंभीरतासँ देखला बाद कहलनि, “हाँ रिपोर्ट सभक अनुसार ऑपरेशन जल्दी हेबाक चाही, नहि तँ कखनो अटेक भऽ सकैए। एना करू (किछु हुनक पुर्जापर लिखैत) - दबाइ खेला बाद परसु आबि कऽ माँ जीकेँ भर्ती करा दियौन। परसु एगारह बजे ऑपरेशन हेतनि।

मुरारीजी हक्का-बक्का की भऽ रहल अछि? जाहि ऑपरेशनक लेल छह महिना बादक तारीख भेटल छल, आइ दू दिन बाद कोना? भारतमे चिकित्सा-व्यवस्था एतेक चुस्त-दुरुस्त कोना भऽ गेल, ओहो एम्स एहेन सरकारी अस्पतालक? अपन उत्सुकतापर नियन्त्रण नहि राखि सकला डॉक्टरसँ पुछिए बैसला, “डॉक्टर साहब, माफ करब एकटा गप्प पुछि रहल छी जाहि ऑपरेशन कराबै लेल हम सभ दू वर्षसँ हरान निराश छलहुँ, अहूँ लग करीब पाँच महिनासँ दौरि रहल छी, पिछला महिना अहीं छह महिना आगूक तारीख देने रहि। आइ दू घंटामे सभटा टेस्टक रिपोर्ट हाथो-हाथ दू दिन बाद ऑपरेशन, ई चमत्कार कोना?

एहिमे चमत्कारक कोन गप्प! पहिने हमरा सभकेँ कहाँ बुझल जे अपने प्रोफेसर साहबकेँ संबंधीत छियनि।

कोन प्रो० साहब।

अरे, अपन प्रो० साहब जिनक यूनिट अछि, प्रो० एस० चौधरी।

प्रो० एस० चौधरी हमर संबंधीत मुदा एहि गप्पकेँ मुरारीजी अपन मोनेमे रखने रहला, मुँहसँ बाहर नहि निकालला। आगू डॉक्टरसँ कहलनि, “अपनेसँ कनी निवेदन छल।

की कहू ने।

कनिक प्रो० साहबसँ भेट भऽ जाइते।

किएक नहि! हमरा सभक दिससँ अपनेक सेवामे कोनो कमी तँ नहि रहल?

नहि-नहि, की कहै छी! बस कनी हुनकासँ भेट करबाक लालसा छल।

डॉक्टर साहब अर्दलीकेँ कहैत कहलखिन, “हिनका दुनू गोटेकेँ  भीतर प्रोफेसर साहबक केबिनमे नेने जाइयौन।


मुरारीजी माए अर्दली संगहि संग बिदा भेला पाँच मिनट पेएरे चलला बाद एकटा लग्जरी एसी केबिन, बाहर बोर्डपर लिखल, यूनिट प्रो० डॉ० एस० चौधरी। अर्दली केबाड़ खोललक, तिनू गोटे भीतर गेला। भीतर प्रो० एस० चौधरी केबाड़क दिस पीठ कऽ कऽ एकटा नम्हर लग्जरी कुर्सीपर बैसल छलाह, आ हुनकर सामने बैसल तीनटा डॉक्टर हुनकासँ परामर्श लैत रहथि। केबाड़ खुजलासँ हुनको ध्यान उम्हर गेलनि। घूरि देखला तँ मुरारीजी, हुनका बुझैमे देरी नहि लगलनि जे हुनक संगे हुनकर माए छथिन। चट्टसँ माएकेँ गोर लागि आशीर्वाद लेलनि। माएकेँ गोर लागैत देखि, बाँकी तीनू डॉक्टर सेहो सीटसँ उठि ठार भऽ गेलाह। डॉ० एस० चौधरी आन डॉक्टरसँ,  “Excuse me, we will meet after five minutes तीनू डॉक्टर, कक्षसँ बाहर चलि गेला। मुरारीजी आश्चर्यसँ बजला, “अहाँ एहिठाम, एस० चौधरी यानी संतोष चौधरी?संतोष हुनका दिस देखि मंद-मंद मुस्काइत रहला।

मुरारीजी संतोषक पएरपर झुकबाक कएलनि, मुदा ओहिसँ पहिने संतोष हुनका उठा कऽ अपन करेजासँ लगा लेलनि। मुरारी, “हमरा क्षमा कऽ देब, अहाँक बारेमे हम की-की सोचैत रहलहुँ, ओहि दिन ट्रेनमे हम नहि जानि की-की कहि देलहुँ, क्षमा कऽ दिअ।

संतोष, “की सभ अनाप-शनाप बजै छी। ओहि दिनका गप्पकेँ बिसरि जाउ। आब कहू जे माएक इलाजमे कोनो कमी तँ नहि।

कमी? आब कोनो कमी नहि! परसु ऑपरेशन हेबाक निश्चित भेल अछि।

हाँ, हमर आइ काल्हि केर समय पहिनेसँ बुक छल, परसु करीब दू घंटाक समय हमरा लग खाली छल, ओहिमे हम माँजीक ओपरेशन करबनि।

अहाँक उपकार हम जीवन भरि नहि बिसरब, हमरा लेल तँ अपने साक्षात भगवान बनि कऽ एलहुँ।

की! आब अहाँ हमर दोस्त छी, दोस्तीमे कोनो उपकार कोना? ओनाहितो अस्पताल हमर तँ नहि, सरकारक अछि।

अहाँ जे कहू, सरकारक हिसाबे तँ ओपरेशनक छह महिना बादक समय भेटल छल।

हमहूँ सभ की करबै, एतेक भीड़-भाड़ छैक जे नम्बर लगाबय परैत छैक एक दिनमे सात-आठटा ऑपरेशन होइत छैक, एहि हिसाबे एवरेज निकालि कऽ ककरो तारीख देल जाइ छैक। सिस्टमे एहन छैक। एकरा सभकेँ छोरु, कहू ठहरल कतए छी? कोनो दिक्कत तँ नहि?

नहि, कोनो दिक्कत नहि। जे दिक्कत छल, अपने दूर कऽ देलहुँ, आब आँगा! माँ भगवतीक हाथमे।

ठीक छैक, तँ परसु फेर भेट हेतै।

ठीक, मुदा एकटा प्रश्न पूछब अपनेसँ।

की?”

एतेक पैघ डॉक्टर भऽ कऽ अहाँ ओहि दिन द्वितीय श्रेणीक स्लीपर क्लासमे किएक छलहुँ?”

संतोष हँसैत हँसैत, “हा हा हा, द्वितीय श्रेणीक स्लीपर क्लासमे नहि रहितहुँ, तँ अपनेसँ कोना भेट होइते? (गप्पकेँ बदलैत) हम अपने जकाँ माएक एतेक भक्त तँ नहि छी जे अपन हाथ कटवा दी, मुदा एतेक सिनेह तँ अपन माएसँ करितहि छी जे हुनका लेल द्वितीय श्रेणीक स्लीपर क्सासमे एक दिन यात्रा कऽ सकी।

से की, नहि बुझलहुँ?”

बात कि हम सभ मुलतः मधुबनी जिलाक छी, मुदा २५-२६ वर्ष पहिने हमर बाबूजी पटना शिफ्ट कऽ गेला। एखन हमर परिवार सभ पटनेमे छथि। ओहि दिन भोरे एकाएक पटनामे हमर माएक मोन बड्ड खराप भऽ गेल रहनि। आब १०-१२ घंटामे नहि कोनो एयरलाइंसक टिकट नहि कोनो ट्रेनक प्रथम वा कोनो एसीक टिकट भेटल, मुदा गेनाइ जरूरी छल तहन कोनो दलालसँ एकटा द्वितीय श्रेणीक स्लीपर क्लासक टिकट भेटल, ओहि विधि अपनेसँ भेट होबाक उपरबलाक कोनो प्रयोजन रहल हेतनि। किएक तँ घर पहुँचैत-पहुँचैत माएओ एकदम ठीक भऽ गेल छली। दिनभरि रहि, अगिला दिन भोरे हवाई जहाजसँ आपस आबि ड्यूटी केलहुँ।” 

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 


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