जकर नै दालि गललै कड़ुआय छै ओ
समय संगे कतेको बौराय छै ओ
अखाड़ामे जखन जीतब कठिन रहलै
प्रपंचक बाट धेने हरषाय छै ओ
सभक सोझाँ कते हिम्मत देखबै छै
मुदा जनता हियामे घबराय छै ओ
पहीने छै लगै केहन नीक सभटा
जखन थापर पड़ै छै पछताय छै ओ
कपट कय जे बुझै छै बुझलक कियो नहि
‘मनु’क ई देख मुस्की अकुलाय छै ओ
(बहरे करीब, मात्राक्रम : 1222-1222-2122)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’