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शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

गजल

जकर नै दालि गललै कड़ुआय छै ओ

समय संगे कतेको बौराय छै ओ

 

अखाड़ामे जखन जीतब कठिन रहलै

प्रपंचक  बाट धेने हरषाय छै ओ

 

सभक सोझाँ कते हिम्मत देखबै छै

मुदा जनता हियामे घबराय छै ओ

 

पहीने छै लगै केहन नीक सभटा

जखन थापर पड़ै छै पछताय छै ओ

 

कपट कय जे बुझै छै बुझलक कियो नहि

‘मनु’क ई देख मुस्की अकुलाय छै ओ

 

(बहरे करीब, मात्राक्रम : 1222-1222-2122) 

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


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