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सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

गजल

हम अहाँकेँ देखिते सुधि बिसरि गेलौं

लेसने बिन आगि सौंसे पजरि गेलौं 

 

प्राण लेलक आँखि मिलनाइ हरजाइसँ

खा कऽ मोने मोन मुँगबा पसरि गेलौं 

 

अछि जकर मुस्की इजोते सगर चकमक

मोरिते मुँह पानि बिन हम  पिछरि गेलौं 

 

स्वर्ग भेटल अहाँ बिन नरक भेलै 

छोरि सुख बैकुंठकेँ झट ससरि गेलौं

 

देख निरमल नेह हुनकर हृदय गदगद

बुझि सफल ‘मनु’ भेल सपना झहरि गेलौं

 

(बहरे कलीब, मात्राक्रम 2122-2122-1222)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


शनिवार, 31 जनवरी 2026

गजल

प्रेम जिनकासँ छल मुँह मोरि लेलनि  

नेग दर्दक  द झट नाता तोरि लेलनि  


ओ हमर दर्दकेँ हँसि खिल्ली उड़ाकय

छोरि आनसँ किए नाता जोरि लेलनि  

 

प्रेम केनाइ की बुझता निर्दयी ओ

जे हृदय केकरो छनमे कोरि लेलनि

 

सीखता की चलब नेहक फूलपर ओ

संग चलनाइ शूलक जे छोरि लेलनि

 

‘मनु’ अनाड़ी कपट छलकेँ चिन्हलक नहि

मोन नहि ओ करेजोकेँ झोरि  लेलनि

 

(बहरे असम, मात्राक्रम 2122-1222-2122)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

गजल

अहाँ मुस्कैत रही  हमरा देखैत रही

अहाँकेँ प्रेम गजल नव-नव सुनबैत रही


रुसल सजनी जँ रही प्रेमसँ बौसैत रही

सगर गुणगान अहाँकेँ हम गाबैत रही

 

मधुरगर बोल अहाँ सदिखन बाजैत रही

अहाँकेँ सुनि क सिनेहे हम ताकैत रही

 

अहाँ  ढारैत रही डुबि हम तीतैत रही

सुनरकी  संग मउध प्रेमक पीबैत रही

 

अहाँ जीतैत रही ‘मनु’ हम हारैत रही

पिया अनुराग सँ ई जीवन जीबैत रही

 

(मात्राक्रम 1222-112-2222-112 सभ पाँतिमे) 

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

शनिवार, 17 जनवरी 2026

गजल

हमरा प्रेम करु सदिखन बसन्ती पिया
नहि बाबूक  हम यौ आब रहलहुँ धिया

 

साजन लेल रखने नेह छी कोंढ़ तर

रुकि नहि करु जुलम तरसै हमर जिया

 

बहुते जतन  सोलह वर्ष सम्हारलहुँ

सहलो जाइए नहि आब टूटे हिया

 

आँकुर फूटि गेलै आब मनमे हमर

रोपल  जे करेजामे सिनेहक बिया

 

साउन बित रहल दम टूटिमनु’केँ रहल

जल्दी आउ ने  जरि गेल  आसक दिया

 

(बहरे कबीर, मात्राक्रम 2221-2221-2212)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

रुबाइ

नैन्हेंटा हाथमे केहन लकीड़ छै

नै माय बाप केहन तकदीर छै

धो धो कऽ ऐँठ कप लकीड़ो खीएलै

नै सुनलक कियो दुनियाँ बहीर छै

                ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

मैथिली साहित्यमे गजेन्द्र ठाकुर जीक योगदान

मैथिली साहित्यमे गजेन्द्र ठाकुर जीक काजपर प्रकाश देबाक माने भेल सूर्यकेँ दीप देखेनाइ। तथापि एहिठाम प्रयास कय रहल छी मैथिली साहित्यक अनंत अंतरिक्षमे गजेन्द्र रूपी सूर्यकेँ अपन आखरक माध्यमसँ दीप देखेबाक। गजेन्द्रजीक जन्म- 30 मार्च 1971 (भागलपुर), एखन करीब 54 वर्षक एतेक कम अवस्थामे एतेक बेसी उपलब्धि, दुनियामे बहुत कम देखै लेल भेटै छैक। एखन धरि गजेन्द्र ठाकुर जी मुख्यतः मैथिली एवं अंग्रेज़ी भाषामे अनुसंधान, पंजी इतिहास, भाषा विज्ञान, मैथिली-अंग्रेज़ी शव्दकोश आ अनुवाद एवं मौलिक साहित्य सहित करीब सवा सयसँ बेसी पोथी लीखि चुकल छथि। जे कि मैथिली साहित्य लेल आकाशगंगा सन एकटा अनंत शृंखला बनल अछि, जाहिमे मैथिली साहित्य, इतिहास आ अनुसंधानकेँ विद्यार्थी संगे संग विद्वान लोकनि अपन ज्ञानक पियासकेँ मेटा सकैत छथि। मैथिली लेखनक कोनो एहेन विधा नहि जाहिमे ओ अद्भुत काज नहि केने होथि। एक इतिहासकारकेँ रूपमे, मिथिला आ मैथिलकेँ वर्तमान समयमे स्थापित करैक रूपमे, आधुनिक मैथिली-अंग्रेजी शव्दकोशक निर्माण, प्राचीन मिथिलाक पंजी व्यवस्थाक संग्रह आ संकलन एहन दुरूह काजकेँ सम्पन्न केनाइ कोनो चमत्कारसँ कम नहि बुझना जाइत अछि। एतबे नहि हुनक सभ रचना, खोज, ग्रन्थकेँ ओ देवनागरी सहित मैथिलीक मूल लिपि, तिरहुता लिपि (मिथिलाक्षर लिपि) मे सोहो लीखि कय मिथिलाक धरोहर आ साहित्यए टा नहि वरन अति प्राचीन तिरहुता लिपिक विकास आ प्रचार पर सेहो खूब बेस काज कय रहल छथि। संगे-संग ब्रेल लिपिपर हुनक काजक जतेक प्रसंसा कयल जाए से कम।

मैथिली साहित्यमे कतेको एहन विधा जकर अस्तित्व गजेन्द्र युगसँ पहिने नहि वा नहिए जकाँ छल, ओहन कतेको विधाकेँ मैथिली साहित्यमे स्थापित करै मे हुनक योगदानकेँ जतेक कहल जाए से कम होयत। जेना कि गजलशास्त्र, बीहनि कथा, रुबाइ, टंका, शेनर्यू आ हैबून आदि-आदि।  टंका, शेनर्यू आ हैबून ई तीनू जापानी काव्य विधाकेँ मैथिलीमे गजेन्द्र ठाकुरजी अनलाह। मैथिलीमे हाइकू पहिनेसँ छै मुदा टंका, शेनर्यू आ हैबून गजेन्द्रजीसँ पहिने मैथिलीमे नहि छल। गजेन्द्र ठाकुर जी मात्र एकटा इतिहासकार, पुरालेखविद्, विद्वान, साहित्यकार, लेखक, कथाकार, कवि, गजलकार, समीक्षक सहित कलमेटाक धनी नहि अपितु एकटा श्रेष्ठ लीडरक सभटा गुण हुनकामे भरल अछि। ओ अपन साहित्यिक ज्ञान आ मातृभाषा मैथिलीक सिनेह केर अपन नेतृत्व गुणसँ इन्टरनेटपर परसि कऽ दुनियाँकेँ अलग-अलग हिस्सामे रहै बला मैथिली अनुरागी पाठक, मैथिली भाषाक विद्यार्थी आ साहित्यकार सभकेँ एक ठाम अनि कय मैथिली साहित्य केर विकासक गतिकेँ दुनियाँक आन-आन विकसित भाषा सभक समक्ष आनि ठार कय देला।

इन्टरनेटपर मैथिली भाषाक प्रथम उपस्थित ‘भालसरिक गाछ’ केर रुपमे सन 2000 मे हुनके द्वारा भेल अछि। इएह भालसरिक गाछ 2008 मे विदेहक नामसँ पाक्षिक पत्रिकाक रूपमे आएल। वर्तमानमे विदेहक माध्यमें मैथिली भाषा आ साहित्य लेल जतेक काज भेलै से केकरोसँ नुकाएल नहि अछि। ओ काज नव-नव विद्याकेँ मैथिलीमे स्थापित केनाइ हो, नव-नव प्रतिभाकेँ इन्टरनेटकेँ द्वारा ताकि कय, माँजि कय, पॉलिश कय कऽ दुनियाँक सामने प्रस्तुत केनाइ हो। अनेको नव-नव प्रतिभाकेँ जिनका साहित्य वा मैथिली साहित्यसँ दूर-दूर धरि कोनो सम्बन्ध नहि छल ओ सभ गजेन्द्र ठाकुर जीसँ विदेह व आन-आन इन्टरनेटक माध्यमसँ जुड़ि आइ स्थापित साहित्यकार, लेखक, कवि, गजलकार, कथाकार आदि आदिकेँ रूपमे जानल जाइ छथि। नव-नव विधा आ नव-नव प्रतिभाकेँ आगू बढ़बै संग विदेह पुरान आ स्थापित मैथिली साहित्यकार सभकेँ दुनियाँक सामने एकटा आँगुरकेँ क्लिकसँ पहुँचाबैक अवसर देलकै। ततबे नहि पुरानसँ पुरान पिछला अंक सभकेँ पढ़ै केर सुविधा संगे संगे अनेको लेखक आ साहित्यकारक बहुत रास पोथीक ई-वर्जन विदेह आर्काइवकेँ मैथिली पोथी डाउनलोडमे राखल अछि। जे कि अपना आपमे एकटा अनुपम उपलब्धि अछि। इन्टरनेटकेँ दुनियामे एकटा एहन पुस्तकालय अछि जे विद्यार्थी, शोधकर्ता, साहित्यकार, लेखक, पाठक आ मैथिली अनुरागीकेँ बिना कोनो मोल आ समयक स्वतंत्रता संगे पढैक अवसर दै छै।

एहन समय अथवा कालखंड जाहिमे कोनो सरकार, संस्था वा अकादमी, मैथिली भाषा व साहित्य लेल पूर्ण समर्पणसँ काज नहि कय रहल अछि ओही समयमे गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा व्यक्तिगत रूपसँ एतेक रास काज केनाइ अकल्पनीय आ अविश्वसनीय अछि। एतेक रास काज हुनक ज्ञान, योग्यता आ मातृभाषा मैथिलीक प्रति हुनक समर्पणकेँ तँ देखाइए रहल अछि संगे-संग एहिमे लगै छै समय आ धन दुनू। एकटा आम व्यक्ति लग आइकेँ समयमे धन आ समय दुनूक अभाव रहै छै आ जिनका लग छनि हुनका लग मोन नहि। एहिठाम गजेन्द्र ठाकुर जीक ऊपर गणेश जीक बुद्धि, सरस्वती जीक ज्ञान रूपी आशीर्वाद तँ छनिहें संगे महामायाक देल ओ विराट करेजा, जे ओ धन वा कोनो तरहक नाम व पुरस्कारक मोह देखने बिना मैथिली भाषा आ साहित्य लेल भगीरथ काज कय रहल छथि। एही भगीरथ काजक लेल हुनकर जतेक प्रशंसा कयल जाए से कम होएत। मैथिली भाषा आ साहित्य प्रति हुनक एहि समर्पणकेँ कोनो मूल्य वा पुरस्कारसँ नहि नापल जा सकैए, ओ अमूल्य अनमोल अछि। कोनो पुरस्कारसँ श्रेष्ठ अछि। मैथिली भाषा आ साहित्यमे हुनकर एहि योगदानकेँ लेल हुनका युग-युग तक याद राखल जायत।


✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 


शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

गजल

करेजमे बसा हमरो तँ कनी  पिआर करु

अपन बना क हमरा प्रिय अहाँ दुलार करु 

 

नुका क छी अहीँकेँ हम रखने हिया त’रे

करब अहाँक पूजा नै सगरो पसार करु 


मनक तरंग सबटा छोरि अहीँक छी बनल

विचारु नै इना जल्दीसँ अहाँ कहार करु

 

सिनेह होइ की छै आबु  तँ हम कहैत छी

जिवू खुशीसँ जीवन नै अकरा पहार करू

 

दुलार नै जतय धन केर बिना कियो करै

सिनेह ओइ ‘मनु’ दुनियासँ किना उधार करु

 

(मात्राक्रम 12-12-12-221-12-12-12 सभ पाँतिमे)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


सोमवार, 1 सितंबर 2025

गजल

नुका कय मुँह अपन सगरो कनै छी हम 

विरहकेँ आगिमे  सदिखन जरै छी हम 


लगा नेहक किए ई आँच चलि गेलौं

करेजक दर्द सहियो नहि सकै छी हम

 

लगन एतेक सतबै छै बुझल नहि छल
विछोहे राति दिन घुटि-घुटि मरै छी हम 

 

नजरिमे छी सभक हारल बताहे टा

बुझत की आन आनंदे रहै छी हम

 

पिया ओता हमर ई सोचि जीबै छी

लगोने आश ‘मनु’ रस्ता तकै छी हम 

 
(बहरे हजज, मात्राक्रम : 1222-1222-1222)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’