छुपि-छुपि राति दिन हम बाट निहारै छी
जल्दीसँ आबू बड़ आस कराबै छी
पूरा होयत कखन ‘मनु’ मनोकामना
हमरा किए नहि करेजसँ लगाबै छी
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
मैथिली साहित्य आ भाषा लेल समर्पित Maithiliputra - Dedicated to Maithili Literature & Language
छुपि-छुपि राति दिन हम बाट निहारै छी
जल्दीसँ आबू बड़ आस कराबै छी
पूरा होयत कखन ‘मनु’ मनोकामना
हमरा किए नहि करेजसँ लगाबै छी
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
अपन एकटा पुरान वार्णिक गजलकेँ, कनीक पॉलिश कय क बहरे हजजमे प्रस्तुत क रहल छी।मतलाक मिसरा-ए-ऊला सभार, ओम प्रकाश जी, लाइव मोशायरा विदेह फेशबूक ग्रूपसँ (03/03/2012)।
गजल
अहाँ कखनो तँ बाट हमर घरक धरबै
अहाँ बिन हाथ नहि दोसर वरक धरबै
निहारै राति दिन हम बाट खाली छी
अहाँ कखनो कनी कोनो सड़क धरबै
सगर सिंगार टुकली नाककेँ नथिया
अहीँ सेनुर पियाजी सिथ परक धरबै
मिलनकेँ आशमे साजनसँ हम चललौं
गड़ी घोड़ा ज भेटल नहि टरक धरबै
हमर जीवन सगर अछि ई अहीँ वास्ते
अहाँ बिन छोरि जीवन ‘मनु’ नरक धरबै
(बहरे हजज, मात्राक्रम- 1222-1222-1222, मतलाक मिसरा-ए-ऊलामे दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानक छूट लेल गेल अछि।)
सुझाव, समीक्षा, आदेश सादर आमंत्रित अछि।
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
प्रियतम अहाँक सुधिमे रहनाइ भेल मुश्किल
जीवैत हम तँ छी नहि मरनाइ भेल मुश्किल
की हाल कहु करेजक टुकड़ी हजार भेलै
सभमे अहीँक छवि छल गिननाइ भेल मुश्किल
छी नींद चैन सबपर कब्जा अपन क लेने
कयलौं पिया कि जादू सुतनाइ भेल मुश्किल
बड़ मोनकेँ बुझेलौं ई किछु बुझैत नहि अछि
आइब कनी बुझा दिअ बुझनाइ भेल मुश्किल
सदिखन ‘मनु’क हृदय मंदिरमे मुरुत अहीँकेँ
बिन पूजने अहाँकेँ सहनाइ भेल मुश्किल
(मात्राक्रम 2212-122 / 2212-122)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
हम अहाँकेँ देखिते सुधि बिसरि गेलौं
लेसने बिन आगि सौंसे पजरि गेलौं
प्राण लेलक आँखि मिलनाइ हरजाइसँ
खा कऽ मोने मोन मुँगबा पसरि गेलौं
अछि जकर मुस्की इजोते सगर चकमक
मोरिते मुँह पानि बिन हम पिछरि गेलौं
स्वर्ग भेटल ओ अहाँ बिन नरक भेलै
छोरि सुख बैकुंठकेँ झट ससरि गेलौं
देख निरमल नेह हुनकर हृदय गदगद
बुझि सफल ‘मनु’ भेल सपना झहरि गेलौं
(बहरे कलीब, मात्राक्रम 2122-2122-1222)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
प्रेम जिनकासँ छल ओ मुँह मोरि लेलनि
नेग दर्दक द झट नाता तोरि लेलनि
ओ हमर दर्दकेँ हँसि खिल्ली उड़ाकय
छोरि आनसँ किए नाता जोरि लेलनि
प्रेम केनाइ की बुझता निर्दयी ओ
जे हृदय केकरो छनमे कोरि लेलनि
सीखता की चलब नेहक फूलपर ओ
संग चलनाइ शूलक जे छोरि लेलनि
‘मनु’ अनाड़ी कपट छलकेँ चिन्हलक नहि
मोन नहि ओ करेजोकेँ झोरि लेलनि
(बहरे असम, मात्राक्रम 2122-1222-2122)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
अहाँ मुस्कैत रही हमरा देखैत रही
अहाँकेँ प्रेम गजल नव-नव सुनबैत रही
रुसल सजनी जँ रही प्रेमसँ बौसैत रही
सगर गुणगान अहाँकेँ हम गाबैत रही
मधुरगर बोल अहाँ सदिखन बाजैत रही
अहाँकेँ सुनि क सिनेहे हम ताकैत रही
अहाँ ढारैत रही डुबि हम पीबैत रही
सुनरकी संग हिया रसमे तीतैत रही
अहाँ जीतैत रही ‘मनु’ हम हारैत रही
पिया मनुहार सँ ई जीवन जीबैत रही
(मात्राक्रम 1222-112-2222-112 सभ पाँतिमे)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
हमरा प्रेम करु सदिखन बसन्ती पिया
नहि बाबूक हम यौ आब रहलहुँ धिया
बहुते जतन सोलह वर्ष सम्हारलहुँ
सहलो जाइए नहि आब टूटे हिया
साजन लेल रखने नेह छी कोंढ़ तर
रुकि नहि करु जुलम तरसै हमर ई जिया
आँकुर मोनमे प्रेमक जखन फूटलै
दुनियामे रहल नै आब कोनो ठिया
गेलै बीत साउन टूटि दम अछि रहल
जल्दी आउ ‘मनु’ जरि गेल आशक दिया
(बहरे कबीर, मात्राक्रम 2221-2221-2212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’