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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

मैथिली साहित्यमे गजेन्द्र ठाकुर जीक योगदान

मैथिली साहित्यमे गजेन्द्र ठाकुर जीक काजपर प्रकाश देबाक माने भेल सूर्यकेँ दीप देखेनाइ। तथापि एहिठाम प्रयास कय रहल छी मैथिली साहित्यक अनंत अंतरिक्षमे गजेन्द्र रूपी सूर्यकेँ अपन आखरक माध्यमसँ दीप देखेबाक। गजेन्द्रजीक जन्म- 30 मार्च 1971 (भागलपुर), एखन करीब 54 वर्षक एतेक कम अवस्थामे एतेक बेसी उपलब्धि, दुनियामे बहुत कम देखै लेल भेटै छैक। एखन धरि गजेन्द्र ठाकुर जी मुख्यतः मैथिली एवं अंग्रेज़ी भाषामे अनुसंधान, पंजी इतिहास, भाषा विज्ञान, मैथिली-अंग्रेज़ी शव्दकोश आ अनुवाद एवं मौलिक साहित्य सहित करीब सवा सयसँ बेसी पोथी लीखि चुकल छथि। जे कि मैथिली साहित्य लेल आकाशगंगा सन एकटा अनंत शृंखला बनल अछि, जाहिमे मैथिली साहित्य, इतिहास आ अनुसंधानकेँ विद्यार्थी संगे संग विद्वान लोकनि अपन ज्ञानक पियासकेँ मेटा सकैत छथि। मैथिली लेखनक कोनो एहेन विधा नहि जाहिमे ओ अद्भुत काज नहि केने होथि। एक इतिहासकारकेँ रूपमे, मिथिला आ मैथिलकेँ वर्तमान समयमे स्थापित करैक रूपमे, आधुनिक मैथिली-अंग्रेजी शव्दकोशक निर्माण, प्राचीन मिथिलाक पंजी व्यवस्थाक संग्रह आ संकलन एहन दुरूह काजकेँ सम्पन्न केनाइ कोनो चमत्कारसँ कम नहि बुझना जाइत अछि। एतबे नहि हुनक सभ रचना, खोज, ग्रन्थकेँ ओ देवनागरी सहित मैथिलीक मूल लिपि, तिरहुता लिपि (मिथिलाक्षर लिपि) मे सोहो लीखि कय मिथिलाक धरोहर आ साहित्यए टा नहि वरन अति प्राचीन तिरहुता लिपिक विकास आ प्रचार पर सेहो खूब बेस काज कय रहल छथि। संगे-संग ब्रेल लिपिपर हुनक काजक जतेक प्रसंसा कयल जाए से कम।

मैथिली साहित्यमे कतेको एहन विधा जकर अस्तित्व गजेन्द्र युगसँ पहिने नहि वा नहिए जकाँ छल, ओहन कतेको विधाकेँ मैथिली साहित्यमे स्थापित करै मे हुनक योगदानकेँ जतेक कहल जाए से कम होयत। जेना कि गजलशास्त्र, बीहनि कथा, रुबाइ, टंका, शेनर्यू आ हैबून आदि-आदि।  टंका, शेनर्यू आ हैबून ई तीनू जापानी काव्य विधाकेँ मैथिलीमे गजेन्द्र ठाकुरजी अनलाह। मैथिलीमे हाइकू पहिनेसँ छै मुदा टंका, शेनर्यू आ हैबून गजेन्द्रजीसँ पहिने मैथिलीमे नहि छल। गजेन्द्र ठाकुर जी मात्र एकटा इतिहासकार, पुरालेखविद्, विद्वान, साहित्यकार, लेखक, कथाकार, कवि, गजलकार, समीक्षक सहित कलमेटाक धनी नहि अपितु एकटा श्रेष्ठ लीडरक सभटा गुण हुनकामे भरल अछि। ओ अपन साहित्यिक ज्ञान आ मातृभाषा मैथिलीक सिनेह केर अपन नेतृत्व गुणसँ इन्टरनेटपर परसि कऽ दुनियाँकेँ अलग-अलग हिस्सामे रहै बला मैथिली अनुरागी पाठक, मैथिली भाषाक विद्यार्थी आ साहित्यकार सभकेँ एक ठाम अनि कय मैथिली साहित्य केर विकासक गतिकेँ दुनियाँक आन-आन विकसित भाषा सभक समक्ष आनि ठार कय देला।

इन्टरनेटपर मैथिली भाषाक प्रथम उपस्थित ‘भालसरिक गाछ’ केर रुपमे सन 2000 मे हुनके द्वारा भेल अछि। इएह भालसरिक गाछ 2008 मे विदेहक नामसँ पाक्षिक पत्रिकाक रूपमे आएल। वर्तमानमे विदेहक माध्यमें मैथिली भाषा आ साहित्य लेल जतेक काज भेलै से केकरोसँ नुकाएल नहि अछि। ओ काज नव-नव विद्याकेँ मैथिलीमे स्थापित केनाइ हो, नव-नव प्रतिभाकेँ इन्टरनेटकेँ द्वारा ताकि कय, माँजि कय, पॉलिश कय कऽ दुनियाँक सामने प्रस्तुत केनाइ हो। अनेको नव-नव प्रतिभाकेँ जिनका साहित्य वा मैथिली साहित्यसँ दूर-दूर धरि कोनो सम्बन्ध नहि छल ओ सभ गजेन्द्र ठाकुर जीसँ विदेह व आन-आन इन्टरनेटक माध्यमसँ जुड़ि आइ स्थापित साहित्यकार, लेखक, कवि, गजलकार, कथाकार आदि आदिकेँ रूपमे जानल जाइ छथि। नव-नव विधा आ नव-नव प्रतिभाकेँ आगू बढ़बै संग विदेह पुरान आ स्थापित मैथिली साहित्यकार सभकेँ दुनियाँक सामने एकटा आँगुरकेँ क्लिकसँ पहुँचाबैक अवसर देलकै। ततबे नहि पुरानसँ पुरान पिछला अंक सभकेँ पढ़ै केर सुविधा संगे संगे अनेको लेखक आ साहित्यकारक बहुत रास पोथीक ई-वर्जन विदेह आर्काइवकेँ मैथिली पोथी डाउनलोडमे राखल अछि। जे कि अपना आपमे एकटा अनुपम उपलब्धि अछि। इन्टरनेटकेँ दुनियामे एकटा एहन पुस्तकालय अछि जे विद्यार्थी, शोधकर्ता, साहित्यकार, लेखक, पाठक आ मैथिली अनुरागीकेँ बिना कोनो मोल आ समयक स्वतंत्रता संगे पढैक अवसर दै छै।

एहन समय अथवा कालखंड जाहिमे कोनो सरकार, संस्था वा अकादमी, मैथिली भाषा व साहित्य लेल पूर्ण समर्पणसँ काज नहि कय रहल अछि ओही समयमे गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा व्यक्तिगत रूपसँ एतेक रास काज केनाइ अकल्पनीय आ अविश्वसनीय अछि। एतेक रास काज हुनक ज्ञान, योग्यता आ मातृभाषा मैथिलीक प्रति हुनक समर्पणकेँ तँ देखाइए रहल अछि संगे-संग एहिमे लगै छै समय आ धन दुनू। एकटा आम व्यक्ति लग आइकेँ समयमे धन आ समय दुनूक अभाव रहै छै आ जिनका लग छनि हुनका लग मोन नहि। एहिठाम गजेन्द्र ठाकुर जीक ऊपर गणेश जीक बुद्धि, सरस्वती जीक ज्ञान रूपी आशीर्वाद तँ छनिहें संगे महामायाक देल ओ विराट करेजा, जे ओ धन वा कोनो तरहक नाम व पुरस्कारक मोह देखने बिना मैथिली भाषा आ साहित्य लेल भगीरथ काज कय रहल छथि। एही भगीरथ काजक लेल हुनकर जतेक प्रशंसा कयल जाए से कम होएत। मैथिली भाषा आ साहित्य प्रति हुनक एहि समर्पणकेँ कोनो मूल्य वा पुरस्कारसँ नहि नापल जा सकैए, ओ अमूल्य अनमोल अछि। कोनो पुरस्कारसँ श्रेष्ठ अछि। मैथिली भाषा आ साहित्यमे हुनकर एहि योगदानकेँ लेल हुनका युग-युग तक याद राखल जायत।


✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 


गुरुवार, 5 जून 2025

बीहनि कथाक कथा कहानी संगे

हिन्दी साहित्यमे पहील कहानी किछु गोटे "रानी केतकी की कहानी" केर मानै छथि। कथा सैयद इंशाअल्लाह खान द्वारा 1803 या 1808 मे लिखल गेल छल कहानी मध्यकालीन भारतक प्रेमकथा अछि कथामे रानी केतकी राजकुमार वीरसेनक प्रेम कहानी कहल गेल अछि ओतए किछु गोटे किशोरी लालक इन्दुमती केर तँ आओर किछु गोटे माधवराव केरएक टोकरी मिट्टीकेर।  मुदा हिन्दी कहानीक असली विकास प्रेमचंदक कहानी हुनक समयसँ भेल

प्रेमचंदक जीवन काल - 1880 सँ 1936 छल, 1803 सँ पहिने कहानी शब्दक प्रयोग कियो नहि केलक। तँ की 1803 वा प्रेमचंद केर युगसँ पहिने कोनो कहानी नहि छल ? वेद, उपनिषद, पुराणमे हजारो कहानीक वर्णन अछि, मुदा ओकरा कथा कहल जाइत छल। जेना पंचतंत्रक कथा जे की 300 .पू. पहिने लिखल गेल छल।

वर्तमानक हिन्दी साहित्यमे कहानीक अर्थ अंग्रेज़ी केर Sort story सँ लेल जाइ छैक। मुदा हिन्दी साहित्यमे आइ-काल्हि हिन्दी साहित्यक कहानीसँ अलग, छोट छोट कहानी क़रीब तीन चारि सय शब्दमे खूब लिखल जा रहल अछि तेकर नामकरण हिन्दी साहित्यमे लघु कथा केर नामसँ भेल अछि। एहि लघु कथाकेँ ज्ञानी लोकनि सभ मैथिली केर बीहनि कथासँ तुलना करै लेल आतुर छथि। ज़खन कि मैथिलीमे बीहनि कथा लघु कथा दुनू स्वतंत्र रूपसँ लिखल जा रहल अछि।

आब मैथिली कथाक वर्गीकरण केर हम एना देख सकैत छी-

बीहनि कथा : कथ्य वा संवाद जेकर मुख्य अंग छैक, एक दृश्यमे संपूर्ण कथा होइ, शब्द सीमा अधिकतम एकसय तक करीब हुए तँ  उत्तम।

लघु कथा : संवाद संगे भुमिका अथवा बिना संवादों, एकसँ दूँ दृश्यमे संपन्न होबा चाही, शब्द सीमा क़रीब पाँच सय तक।

कथा : जकरा हिन्दी साहित्यमे कहानी कहल गेल छैक। मैथिली साहित्यमे कथा वा कथाक संग्रह केर खूब रचना भेल अछि।

दीर्घ कथा : अर्थात नमहर कथा। जाहि ठाम विस्तारसँ व्याख्या कय रचना केएल गेल हुए। एतेक नमहर जे चारि-पाँच टा कथासँ एकटा पोथीक निर्माण सकेए।

आब कने गप्प करै छी, बीहनि कथा केर मादे -

बीहनि कथा नव विधा होइतो, आइ कोनो तरहक परिचय लेल मोहताज नहि अछि।  मैथिलीमे नित्य नव-नव बीहनि कथा बीहनि कथाक पोथी लिखल जा रहल अछि। हम एकर इतिहास उत्पतिकेँ मादे एखन नहि कहब मुदा एतवा कहबामे कोनो हर्ज नहि जे बीहनि कथाक स्थापना विकास लेल मुन्नाजीक (मनोज कर्ण) भगरथि योगदानकें नहि बिसरल जा सकैत अछि। हमरो हुनके मार्गदर्शन सहयोगे बीहनि कथा लेखनमे उदय भेल। मुन्नी कामतजी, डॉ. आभा झाजी, सात्वना मिश्राजी, कल्पना झाजी, गजेन्द्र ठाकुरजी, घनश्याम घनेरोजी, विद्याचन्द झा 'बंमबंम' जी, डॉ. प्रमोद कुमारजी, ओमप्रकाश झाजी, डॉ. उमेश मण्डलजी, कपिलेश्वर राउतजी आदिक बीहनि कथा लेखनमे जतेक प्रशंसा कएल जे से कम। वर्तमान समयमे मैथिलीक बीहनि कथाकार सभ दुनियाँक बड़का-बड़का भाषाकेँ एहि दिस सोचै लेल बिबस कए देलखिन्ह। अंग्रेजीमे एकर  नामकरण अथवा भाषांतर सीड स्टोरीकहि भेल। हिंदी अंग्रेजीमे जकर कोनो स्थान नहि ओहेन एकटा नव विधाक अग्रज मैथिली साहित्य विधा थिक  “बीहनि कथा

किछु लोक बीहनि कथा लघु कथामे फराक नहि कय पबैत छथि मुदा दुनूमे बहुत फराक अछि। बीहनि अर्थात बीआ। तेनाहिते मोनक बिचारक बीआ जे कखनो कतौ फूटि सकैए, बीहनि कथा। विचारक एकटा एहेन बीहनि, बीआ, सीड जे लोकक करेजाकेँ स्पर्श करैत, मस्तिष्ककेँ सोचै लेल विवस दै।

बीहनि कथाक आवश्यकता समयक संग जरुरी अछि, जेना एक समयमे पाँच दिनक क्रिकेट मैचक प्रचलन छल ओकर बाद आएल वन डे क्रिकेट आजुक समयक माँग अछि ट्वेन्टी ट्वेन्टी। तेनाहिते एखुनका समय अछि बीहनि कथाक।          

बीहनि कथा कोना लिखबा चाही आओर एकरामे की-की गुण होइत छैक ? शंक्षेप्तमे कही तँ एक गोट श्रेष्ठ बीहनि कथामे निचाँ लिखल गुणँ होबाक चाही      

▪️सम्पूर्ण कथा मात्र एकटा दृश्यमे होबाक चाही। जेना नाटकक मंचन मंचपर होइत छैक ओहिमे कतेको बेसी दृश्य भऽ सकैत छैक मुदा बीहनि कथाक कथ्य कथा दुनू एके दृश्यमे सम्पन्न भए जेबा चाही।

▪️बीहनि कथाक मुख्य अंग संवाद अछि। जतेक सटीक नीक संबाद होएत ओतेक नीक। शव्द चयन एहेन हेबा चाही जे पाठककेँ अर्थ बुझैक लेल सोचय नहि परनि। तुरन्त जे हम कहै चाहै छी पाठकक मानस पटलपर जेए।

▪️कथाक गप्प पाठकक करेजाकेँ छूबि लनि पढ़ला बादो करेजामे दस्तक दैत रहनि ओकर परिणाम वा समाप्तिक फरिछौँटमे नहि परि कय पाठकपर छोरि दी।

▪️जँ कथा कोनो सार्थक उदेश्य वा गप्पकेँ प्रस्तुत करैमे सफल अछि, समाजकेँ कोनो नीक बेजए पक्षकेँ दखा रहल अछि तँ सर्वोतम।

▪️पढ़ैक कालमे पाठकक मोनमे मनोरजन संगे-संगे रूचि कौतुहल जगा सकेए। एना नहि बुझना पड़े जे कोनो प्रवचन सुनि रहल छी।

▪️जँ सम्भव हुए तँ इतिहास बनि गेल पात्र आ घटनासँ बचबाक चाही।

✍🏻 जगदानन्द झामनु