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सोमवार, 7 जनवरी 2013

गजल- भास्करान्द झा भास्कर


गाम- घरमें बड्ड कहबैका, सबके नीक लगैया
बाप हुनक छैथ ज्ञानी- दानी बेटा भीख मंगैया

लोकक लागल भीड़ घरमें निजस्व प्रयोजन संगे
सबहक घर निर्माणमें लागल हुनकर चार कनैया

सखा सहोदर नोरे डुबल, दहि गेल सगरो घरारी
शीत बसातमें कठुआयल, मन मोने मोन मरैया

भेल निठल्ला दलाने बैसल, पैसल बूढबा बीमारी
परिवारक झरि बहैत नोर पर सगरो गाम हसैया

खरहीक टूटल टाट कात बिना पगहा मरल बरद
नाइदक सान्ही खाली देखीकए बरदो आब लड़ैया 

-----------------------भास्करानन्द झा भास्कर

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

गीत- भास्करानन्द झा भास्कर


मिथिला सत्य साहित्यक भूमि, छी गीत संगीतक उर्वर भूमि
हे विद्या-बुद्धि सपन्न मैथिल ! मिथिला-सांस्कृतिक श्रॄंगार करु।

मिथिला ज्ञान विज्ञानक भूमि, छी सिद्ध साधकक तपो भूमि
हे गौतम, वशिष्ठ, कणाद सपूत ! प्रगति-पथ आविष्कार करु।

मिथिला नीति राजनीतिक भूमि, छी स्वच्छ सुनेतृत्वक भूमि
हे सहॄदय स्वच्छ मानस मैथिल ! सतत सामाजिक सुधार करु।

मिथिला आत्म अध्यात्मिक भूमि, छी अनुपम, मनोहर भूमि
हे गहन अध्ययनरत जनकपुत्र ! निरन्तर आर्थिक सुधार करु।

मिथिला अमिट संस्कारक भूमि, छी चिन्तित चिता पर भूमि
हे चीर निन्द्रामें सूतल मैथिल ! जागृत मानसिक विचार करु।

मिथिला अन्न धन-धान्यक भूमि, छी महापुरुषक कर्म भूमि
हे मरुभूमिमें लोटल मैथिल ! महत मातॄभूमिपर उपकार करु ।

मिथिला मंडन अयाचीक भूमि, छी वाचस्पति विद्यापतिक भूमि
हे बिसरल अवचेतन मैथिल ! निज मैथिली चेतना संचार करु ।


---------------------- भास्कर झा, दिसंबर 2012

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

मिथिलाक नोर - भास्करानंद झा भास्कर



हहरि हहरि कए कानथि मिथिला
नुका नुका कए खसाबथि दुख नोर
राइतक अन्हरियामें छै भुतलायल
सम्मान-किरण युक्त सूरजक भोर।

मिथिला- सोईरीक जनमल बच्चा
ठमकि ठमकि भ गेलै वो सियान
नगर-नगरमें बनाबैथ महल अटारी
अप्पन धरतीक नहिं कोनो धियान।

मिथिला-मैथिलीके बिसरैत नवपीढी
सुन्न- सुबैक रहल छै गामक गाम
पोसनाहरक नोरक छै के पोछनाहर
कलपि रहल अछि विद्यापतिक धाम।

------ भास्कर झा 11 दिसंबर 2012

   

बुधवार, 29 अगस्त 2012

गजल- भास्कर झा

नव विचारक सचार सजाबैत रहू
पुरान बातक ओहार हटाबैत रहू।

आजुक समयमें बढबा अछि आगू
त परिवर्तनक कहार बजाबैत रहू ।


नहिं झगरु ने रगड़ू, संभरिके चलू
ईर्ष्याद्वेषक गाईंठ सोझराबैत रहू।



नवबाटक बटोही बनू अहां जगमें
प्रेमफ़ूलक सजावट लगाबैत रहू ।

बिर्रो उठत कखनो अन्हर खसत
नव- लक्ष्यक सुअक्ष उठाबैत रहू ।

- भास्कर झा 25 अगस्त 2012

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

फ़ेसबुकिया पति (कविता)



केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला !

फ़ेसबुक पर दिन भरि बैसल
धड़ खसौने वो असगर बैसल
घरमें भेल मुंह फ़ुल्ली-फ़ुल्ला
केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला !

मुंह मोड़ि, सब काज छोड़ि,
दिनचरजा के देलखिन तोड़ि
आब प्रियतम भेल निठल्ला
केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला !

कनफ़ुकबामें मुंह-कान सटौने
मूस-पीठके सदिखन मूठियेने
सीन देखिकए फ़ूटे हंसगुल्ला
केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला !

धिया पुता के भेल आजादी
सच पुछू त भविष्यक बरबादी
ककरो अलगे ने कोनो कल्ला
केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला !

घरक कनिया तनिया मुनिया
नून, हरदि, दालि मूंग ,धनिया
भंसा घरक खाली भेल गल्ला
गृह-कलह जानल सब मोहल्ला
केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला ।

- भास्कर झा 20 जुलाई 2012

भाई, हमहुं कवि छी (हास्य)


हमहुं किछु लिखलै छी
मनमें फ़ुटैत बात कहुना
किछु बिम्ब,किछु छंद संग
तुकबंदी, शब्दक अंग भंग
सुखद अभाव केर छवि छी ।
भाई, आब हमहुं कवि छी ।

हमहुं कहिं ऊड़ि जायत छी
कल्पनाक पांखि लगा कए
कखनो बहैत बसातक संग
मनमें चहकैत चिड़ै के संग
विचारक की आब कमी छी ?
भाई, आब हमहुं कवि छी ।

हमहुं घुसि जायत छी कहुना
पकड़ने आयोजकक ठाड़ टीकी
नित चलैत सब काव्य-गोष्ठी में
मिथिला– मैथिलीक संगोष्ठी में
किछु विशेष प्रतिभाक धनी छी
…….भाई, आब हमहुं कवि छी ।

हमहुं जोगाड़ कय लैत छी
आलेख-प्रलेख, काव्यक पेटी
किछु काटी -किछु छांटि कए
रचना -सर्जना सब बांटि कए
-----साहित्यक जे पुजारी छी
भाई, आब हमहुं कवि छी !!!!

-भास्कर झा 19 जुलाई 2012

हम भन्ने नहिं छी (हास्य)



हम भन्ने नहिं छी 
--------तथाकथित कवि
नईं त आई हमहुं रहितहुं
साहित्यक अन्हार कोना में
छल-बल लोकक कोनो खेमा में !

हम भन्ने नहिं छी 
------- कोनो साहित्यकार
नईं त आई हमहुं लड़ितहुं
पुरस्कार तुरस्कार के लेल
अहि संग देय टाका के लेल।

हम भन्ने नहिं छी
---------- कोनो कथाकार
नईं त आई हमहुं लिखतहुं
पुरस्कार लोलुपक खिस्सा
खएतहुं गायरक अप्पन हिस्सा !

हम भन्ने नहीं छी
प्रगतिशीलताक कोनो पुरोधा
नहिं त हमहुं पतीत होयतहुं
सब सर्वहारा वर्गक नाम पर
लोक पीठ थपथपी ईनाम पर ।

हम भन्ने नहीं छी
कोनो पत्रिकाक पाठक
नहिं त हमरो मन में रहैत
रचना छपबावक सेहन्ता
फ़ुसफ़ुसिया आ व्यर्थक चिन्ता !


---- भास्कर झा 17 जुलाई 2012

शुक्रवार, 4 मई 2012

गजल- भास्कर झा


लाज करैत जं बात जे करबै , निरलज हम करबे करब
आंखि नुका कए जौं अहां देखब, नैनक ताप सहबे करब ।

सखी बहिनपा संग चोरबा नुक्की, खेलैत काया कितकित
एना करब जं सदिखन खेला, प्रेमक खिस्सा कहबे करब ।

कोमल अंगसं फ़ुटैत तरेगन, करेज इजोरिया भेल दपदप
नैसर्गिक सौन्द्रर्य देखि कए, गजलक पाति लिखबे करब ।

मधुर भाव के गाम बनल जौं, रचनाक मन मचान बनत
आसीन भए शान्त -प्रान्त में, सुन्नर दृश्य देखबे करब ।

----------------------------भास्कर झा 04/05/2012

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

गजल

धक सं लागल चोट, करेजा हमर तोड़ि देलऊं
एहन भेलऊं अहां कठोर कि हमरा छोड़ि देलऊं ।
दिन हो चाहे राइत अहांके हम ईयाद छलऊं
एहन अहांके कि भ गेल कि हमरा छोड़ि देलऊं ।

सदिखन छलहुं हमर पास संग आब छोड़ि देलऊं
हम देखितॆ रहलऊं बाट अहां मुख मोड़ि लेललऊं ।
टूटल हमर पूर्ण विश्वास, दूख संग जोड़ि गेलऊं
हमरा सं कि गलती भेल कि हमरा छोड़ि गेलऊं ।
- भास्कर झा 22/03/2012

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

गजल- भास्करानन्द झा भास्कर

प्रेम-गाछ पर बैसल वो चिड़ै , कुन दिशा में उड़ि गेलई
मोनक बात मोने में रहिके अंकुरित भकअ गड़ि गेलई ।

दूर उड़ान हरि लेलक प्राण, हर्खक बरखी लागै भय गेल
बनिके ठूठ ठाड़े मोन रहिगेल, हरियर फ़ुनगी झड़ि गेलई ।

मन उपवन छल स्वच्छ सुवासित चाहक छाया बड गंभीर
हॄदयक वेदना सं तप्त त्रस्त, सुखायलओ जड़ि जड़ि गेलई ।

कानै आंखि दुनु झड़ि झड़ि, ककरा सं कहब ई प्रेमक पीड़
प्रेयसी प्रेम पीड़ित प्रियतम के अनंत पीड़ा में छोड़ि गेलई ।
भास्कर झा 31/01/2012

गजल- भास्करानन्द झा भास्कर

बड मनभावन नयनक शोभा, काया श्याम वर्ण उत्किर्ण
सहसमुखी सौन्दर्यक अक्ष छनि, वक्ष समक्ष प्रेम उतीर्ण ।

पैघ केशक कलि फ़ूटित बनिकए खिलि प्रेमक किसलय
नख सिख दहक महक विराजत , हॄदय होयत विदिर्ण ।

मुसिक मुसिक मन उपवन विचरय सुन्दर सब नर- नारी
प्रेमालय केर छात्र गिरि कए भय जायत बहुधा अनुतीर्ण ।

प्रेम पथिक पथ जीवन बिसराए , पटकैत सदिखन माथ
बनि कवि आब सर्वत्र बौराए, दूषित देह लागै जीर्ण शीर्ण ।

- भास्कर झा 31/01/2012