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सोमवार, 8 जून 2026

गजल

छूलक जे मोनसँ ओ आखर कहि दिअ

आँखिसँ जे पीलौं ओ सागर कहि दिअ

 

निर्मोही दुनियामे  सभ मतलबकेँ

धोखा जे देलक ओ पाथर कहि दिअ

 

मोनक कोठीमे छी जे दुख रखने

आजुक दिन ओ सभकेँ सादर कहि दिअ

 

नेहक रस छलकैए आँखिक रस्ता

प्रेमसँ भरि ओ सुंदर गागर कहि दिअ


प्रेमक आगिसँ  जीया धड़कय  लागल

कोमल मोनक ‘मनु’ ओ कातर कहि दिअ 

 

(बहरे मीर, मात्राक्रम : 22-22-22-22-22)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


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