ई जँ अंतिम राति भेलै तँ की करबै
काल्हि नै नव भोर एलै तँ की करबै
आइ छी हमरासँ रूसल अहाँ बहुते
काल्हि हम्मर प्राण गेलै तँ की करबै
ताकि रहलहुँ बाट भरि युग अहाँकेँ हम
नेह आँखिसँ बहि क हेलै तँ की करबै
हँसि क सहि लेलहुँ जमानाक सभ पीड़ा
छलसँ अपने पाछु ठेलै तँ की करबै
छोड़ि दुनिया जा रहल छी भरोसेपर
भाग्य एना ‘मनु’ जँ खेलै तँ की करबै
(बहरे कलीब, मात्राक्रम : 2122-2122-1222)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें