“कोस-कोसपर बदले पानी, तीन कोसपर बदले वाणी।” ई कथ्य किनकर अछि, हम नहि जानै छी मुदा ई जग-जाहिर अछि। कोनो एहन सुधी मनुख नहि हेताह जे एहि पाँतिसँ अनभिक होथि। आ ई कथ्य सोलह आना सत्य अछि। एक गामसँ दोसर गामक इनार पोखरिक पानिमे अन्तर आबि जाइ छैक। ओना आब इनारक जमाना तँ रहल नहि। गामक घरे-घर चापाकऽल चलि गेल आ शहरक घरे-घर टंकी। टंकीक पानिमे तँ कनिक समानता देखलो जा सकैत अछि मुदा एक आँगनक चापाकऽलक पानिक स्वाद दोसर आँगनक चापाकऽलसँ भिन्न होएत अछि। परञ्च हम एहिठाम पानिक संदर्भमे गप्प नहि कहि कऽ भाषाक पक्षक मादे कहब चाहैत छी।पानि जकाँ भाषाक मिजाज सेहो सगरो तीन-चारि कोसपर बदलल देखाइत छैक। ई असमानता मिथिले-मैथिलीमे नहि भऽ कऽ कम-बेसी सम्पूर्ण भारतीय वा अभारतीय भाषामे देखार भऽ चुकल अछि आ ओ गुण कोनो भाषाक विकास आ ओकर उन्नतिक पक्षक धियान राखि ठीके अछि।
पानिक मादे जेना कोनो नदी हेतु ओहिमे बहाव भेनाइ स्वभाविक छैक नहि तँ ओ नदीसँ डबरा भऽ जेतैक। तेनाहिते कोनो भाषाक चहुमुखी विकास लेल ओहिमे निरन्तर बहाव, अर्थात् नव-नव शब्दक वृद्धि, आन-आन भाषाक सटीक आ प्रचलित शब्दकेँ स्वीकार केनाइ आवश्यक छैक। आ दुनियाँक ओ कोनो भाषा जे अपना आपके एकटा बहुत पैघ रुपे स्थापित केलक, ओकर विकासक इहे अबधारना वा गुणक कारणे संभब भेल अछि। हमरा इआद अछि जखन अंग्रेजीक प्रथम शब्दकोष बनल रहैक तँ ओहिमे मात्र एक हजार शब्दकेँ जगह भेटल रहैक आ आइ..... ?
मुदा मैथिलीक संगे, ई गुण किछु बेसीए अछि। किएक तँ मैथिल किछु बेसीए बुद्धिजीवी, शिक्षित आ चलएमान छथि। जतए-जतए गेला, अपन भाषाकेँ अपनासंगे नेने गेला आ ओतुका भाषाक शब्दकेँ अपनासंगे जोड़ने गेला। ओनाहितो अपन मिथिलांचलक हरेक तीन-चारि कोसक बादक भाषामे भिन्नता अछि। पछिमाहा मैथिली, पुरबाहा मैथिली, दछिनाहा मैथिली, उत्तर भरक मैथिली, कमला कातक मैथिली, कोसी कातक मैथिली। एक्के गाममे बड़काक मैथिली, छोटकाक मैथिली। नीक गामक मैथिली तँ बेजए गामक मैथिली। शिक्षितक मैथिली तँ अशिक्षितक मैथिली। धनीकक मैथिली तँ गरीबक मैथिली। एक्के बेर एतेक बेसी असमानता भऽ गेल अछि जे कतेक ठाम तँ मैथिली नहि कहि कऽ दोसर नामसँ संबोधन भँ रहल अछि।
अपन जाहि गुणक कारणे दुनियाक कोनो दोसर भाषा विकासक रस्तापर चलि रहल अछि, ओतए हमर सभक मैथिली एहि क्रममे पछुआ रहल अछि। एकर की कारण? तँ उत्तरमे हमरा मैथिलीक एकटा लोकोक्ति याद आबि रहल अछि, “जे बड्ड होशियार, से तीन ठाम गूँह मखै।” एहि लोकोक्तिकेँ कनी फरिछाबी; एकटा पढ़ल-लिखल, विद्वान् गूँह मखि गेला, आब ओ एहि गप्पक खोजमे लागि गेला जे, जे मखलहुँ से गूँहे अछि वा किछु आरो। एहि क्रममे ओ पएरकमखल गूँहकेँ अपन हाथक आँगुरसँ छुवला बाद नाकसँ सुँघला। लगलनि ने तीन ठाम - पएरमे, हाथक आँगुरमे, अन्ततोगत्वा नाकमे। ओतए एकटा दोसर व्यक्ति बेसी खोज बिन नहि कऽ, मखला बाद पेएरकेँ पानिसँ धो लेलक। “अति सर्वत्र वर्जयेत्,” इहे रोग मैथिली भाषाक विकासमे लागि गेल अछि। जाहि गुणक कारणे हम आगू बढ़ि सकैत छलहुँ, अपन ओहि गुणकेँ कारण ठमैक गेल छी।
एहि गुण, अतिशय गुण वा कहूँ तँ अवगुणकेँ हम सामान्य लोकक लेल जेना अछि तेना छोड़िदी, विकासक क्रममे समयक संगे मानिली जे ओ अपने ठीक भऽ जएतै। मुदा जे अपनाकेँ बुद्धिजीवी कहैत छथि, शिक्षित आ मैथिली विकासक ठेकेदार अपनाकेँ मानैत छथि तिनका सभकेँ तँ कदापि नहि छोड़ल जाए, आ हुनके सभक एकरूपताक अभावे मैथिलीक गति अवरुद्ध भेल अछि। एकटा सामान्य लोक ककरा देखत, पढ़त ? एकगोट बुद्धिजीवीकेँ, साहित्यकारकेँ, पत्र-पत्रिकाकेँ, ऑडियो-वीडियो मीडियाकेँ; मुदा एखुनका समयमे मैथिली भाषाक एकरूपतामे बहुत कम समानता अछि। एहिठाम हम सामान्य लोकक गप्प नहि कहि रहल छी, पढ़ल-लिखल, मैथिलीमे ऑनर्स, एमए०, पिएचडी करै बला लोकक गप्प कऽ रहल छी; जिनक सभक कतेको मैथिली पोथी छपायल अछि, मैथिलीक पत्र-पत्रिकाक संपादक आ संपादक मण्डलीक गप्प कऽ रहल छी। सैकड़ो मैथिली पुस्तक छापि चुकल प्रकाशकक गप्प कऽ रहल छी। ऑडियो-वीडियो बेचि कऽ अपन कमाइ करै बला चैनल, म्यूजिक वीडियो आ फिल्म कम्पनीक गप्प कऽ रहल छी।
चहुदिस भाषाक एकरूपताक अभाव अछि। कनिक काल लेल किनको अज्ञान मानि कऽ क्षमा कएल जा सकैत अछि, मुदा ओहि छन की कएल जाए जखन कियो गोटा अपनाकेँ मुख्य संपादक, संपादक, मैथिलीक ऑनर्स, एमए पिएचडीक चश्मा पहिरने, ओहि घोड़ा जकाँ लगैत छथि जेकरा आँखिपर हरियर पट्टी बान्हल छैक आ ओकरा सगरो दुनिया हरियरे-हरियर नजरि अबैत छैक। ई विडम्बना मैथिलीए संग किएक ? जीवन भरि अपन घर-परिवारमे मैथिली नहि बजै बला मैथिलीक ठेकेदार बनि जाइत छथि किएक ? एहिठाम हम ‘विदेह’ ग्रूपक प्रशंसा करब जे अन्तर्जाल आ प्रिन्ट दुनू रूपमे मैथिली भाषाक समृद्धि आ एकरूपता लेल भगीरथ प्रयासमे लागल छथि।
कतेको प्रकाशकक पोथी, कतेको लेखक आ साहित्यकारक कृति, कतेको पत्र-पत्रिका, फलाँ-फलाँ मैथिली अकादमीक पोथी आ पत्रिका हमरा लग अछि जाहिमे विभक्तिक प्रयोग हिन्दीक तर्जपर कएल गेल अछि। कतेक मैथिलीक महान-महान विभूतिसँ हम व्यक्तिगत निवेदन केलहुँ जे, मैथिलीमे विभक्तिकेँ सटा कऽ लिखबाक चाही; मुदा नहि, ओहे आँखिपर पट्टी बान्हल घोड़ा बला हिसाब। एकटा मुख्य-संपादक, संपादक, ऑनर्स, एमए, पिएचडी, कएनिहार अपनाकेँ मैथिलीक ठेकेदार बुझनिहार, दोसर लोकक गप्प कोना मानि लेताह? लागल छथि सभकेँ सभ मैथिलीकेँ हिंदी टच देबयमे। जीवन होए वा साहित्य, ई गप्प मानै बला अछि जे लोक गल्तीए कऽ कऽ आगू बढ़ैत अछि। मुदा ओही लोक आ संस्थाक की, जे गल्तीओ करत, गल्तीकेँ मानबो नहि करत, आ बाजू तँ लड़बो करत? ई तँ ओहे गप्प भेल ‘जकर लाठी तकरे महीष’, मुदा एहिठाम गप्प महीषक नहि भऽ कऽ एकटा प्राचीन, समृद्ध आ श्रेष्ठ भाषाक भविष्य आ एकरूपताक छैक।
दुनियाक सभ समृद्ध भाषामे एहन देखल गेल अछि जे आम बोलचाल आ साहित्य, शिक्षा वा सार्वजनिक भाषामे भेद पाओल जाइत छैक। आम बोलचाल आ प्रचलनमे बहुत रास छूट छैक वा बन्हनक आभाव छैक मुदा साहित्य, शिक्षा आ सार्वजानिक मंच हेतु ओहि भाषाक एकटा मानक रूपक प्रयोग कएल जाइत छैक। एहि तरहक अभाव मैथिलीक संगे किएक? मैथिली साहित्यकार, संपादक, प्रकाशक मैथिलीक मानक रूपक प्रयोग किएक नहि करैत छथि? कतेको विद्वान तँ सीखक डरे एक्के बेर कहता, “चलू-चलू अहाँ फलाँ-फलाँ ग्रूपसँ जुड़ल छी, ई ओकर सभक चर्चा थिक। “यौ महराज ई चर्चा अहाँ लग के अनलक ई नहि देखि, ई देखू जे की अनलक। कनिक देखक अपन नजरि बदलि लिअ तँ अहूँक विकास आ संगे-संग भाषाक विकासक सेहो सम्भावना, मुदा नहि, हमर एकटा आँखि फूटेए तँ फूटेए तोहर दुनू फोरबौ। आ एहि फोरा-फोरीमे ई किनको चिंता नहि जे ओहि माए-बाबूक कि हाल जिनक करेजाक टुकरा अपन दुनू छी।
मैथिलीमे एकरूपताक अभाव, स्थिति, कारण आ निदानपर चर्चा करी तँ एकटा बेस मोटगर पोथी बनि जाएत, मुदा मैथिलीक अनवरत विकास हेतु हमरा सभकेँ अपन-अपन आँखि नहि मुनि एहि चर्चाकेँ आगू बढ़ाबय पड़त। आ अति शीघ्र मैथिलीक वर्तमान पत्र-पत्रिकाक संपादक, प्रकाशक, साहित्यकार, लेखक आर कोनो सार्वजनिक मंचकेँ देखनिहार लोक सभकेँ मानक मैथिलीकेँ स्वीकार कए ओकरा आगू आनय पड़त, नहि तँ ओ दिन दूर नहि जहिया हमर सभक धिया-पूता एकरा इतिहासक पोथीमे पढ़त।
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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