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सोमवार, 20 मई 2013

गजल

अछि जँ ई जिनगी  प्रेम केनाइ सीखू

डर बिसरि जगमे दुख मिटेनाइ सीखू

 

काल्हिकेँ नै कोनो भरोसा बचल अछि

आइ सभकेँ  अप्पन बनेनाइ सीखू

 

जीवनक सुख दुख बाट दू छैक बुझलौं

दूबटीयापर हँसि क  गेनाइ सीखू

 

राग मनमे प्रेमक जगाबैत सगरो

आँखि सबहक सोझाँ उठेनाइ सीखू

 

‘मनु’ अछुत छै अपने किए मानने छी

डाह बिसइर छाती लगेनाइ सीखू

 

(बहरे खफीक, मात्राक्रम  2122-2212-2122)

 ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

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