मैथिली साहित्य आ भाषा लेल समर्पित Maithiliputra - Dedicated to Maithili Literature & Language
गुरुवार, 10 मई 2012
गजल
काइल्ह सौं काग क्रूरे भीतक कगनी पर
बाल-गजल
हे रौ गुलेटेनमा सुन रौ टुनटुनमा एलै छुट्टी गर्मी क'
चल इस्कूल क' कहिये हम टाटा आब भेलै छुट्टी गर्मी क'
अन्हर बताश में खूब हम घुमब गाछी जा आमो चुनब
पाकल आमक रस निचोरब आई चढ़लै छुट्टी गर्मी क'
मेघ बुन्नी में खूब नहायेब माई क' हम बातो नै मानब
हत्ता-खत्ता में चल मान्छ जा' क' मारब बढ़लै छुट्टी गर्मी क'
हाट बजार में त' बाबु संग जेबै लेमंचुस बिस्कुट खेबै
मेला में जा' क' हम झुला झुलब कम बचलै छुट्टी गर्मी क'
इस्कूल क' गृहकार्य बांचल अछि रत्तियो नै त' वक्त छैक
अछि मोन विधुआयेल किये ख़तम भ' गेलै छुट्टी गर्मी क'
(सरल वार्णिक बहर वर्ण -२२)
रूबी झा
चल इस्कूल क' कहिये हम टाटा आब भेलै छुट्टी गर्मी क'
अन्हर बताश में खूब हम घुमब गाछी जा आमो चुनब
पाकल आमक रस निचोरब आई चढ़लै छुट्टी गर्मी क'
मेघ बुन्नी में खूब नहायेब माई क' हम बातो नै मानब
हत्ता-खत्ता में चल मान्छ जा' क' मारब बढ़लै छुट्टी गर्मी क'
हाट बजार में त' बाबु संग जेबै लेमंचुस बिस्कुट खेबै
मेला में जा' क' हम झुला झुलब कम बचलै छुट्टी गर्मी क'
इस्कूल क' गृहकार्य बांचल अछि रत्तियो नै त' वक्त छैक
अछि मोन विधुआयेल किये ख़तम भ' गेलै छुट्टी गर्मी क'
(सरल वार्णिक बहर वर्ण -२२)
रूबी झा
कलाकन्द भऽ गेलहुँ (बाल-गीत)
धिया-पुता देखिकय आनन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ
केहेन सहज मुख पर मुस्कान छै
छन मे झगड़ा छनहि मिलान छै
तीरथ बेरागन व्यर्थ करय छी
सद्यः धिया-पुता सोझाँ भगवान छै
हँसी खुशी देखिकय बुलन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ
बनि कियो इन्जन रेल चलाबय
कियो फूँक मारय पीपही बजाबय
बिनु पैसा के हँसि हँसि घूमय
छन कलकत्ता दिल्ली पहुँचाबय
लागय बच्चा सँगे जुगलबन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ
कियो जोर खसलय कियो जोर हँसलय
कियो ठेलि देलकय कहुना सम्हरलय
देखलहुँ निश्छल रूप मनोहर
सुमन अपन सब कष्ट बिसरलय
मोन साफ भेल शकरकन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ
केहेन सहज मुख पर मुस्कान छै
छन मे झगड़ा छनहि मिलान छै
तीरथ बेरागन व्यर्थ करय छी
सद्यः धिया-पुता सोझाँ भगवान छै
हँसी खुशी देखिकय बुलन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ
बनि कियो इन्जन रेल चलाबय
कियो फूँक मारय पीपही बजाबय
बिनु पैसा के हँसि हँसि घूमय
छन कलकत्ता दिल्ली पहुँचाबय
लागय बच्चा सँगे जुगलबन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ
कियो जोर खसलय कियो जोर हँसलय
कियो ठेलि देलकय कहुना सम्हरलय
देखलहुँ निश्छल रूप मनोहर
सुमन अपन सब कष्ट बिसरलय
मोन साफ भेल शकरकन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ
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गीत,
श्यामल सुमन
क्या कहूँ अपने से अपने ही बारे में? इस प्रतियोगी युग में जीने के लिए लगातार कार्यरत एक जीवित-यंत्र, जिसे सामान्य भाषा में आदमी कहा जाता है और जो इसी आपाधापी से कुछ वक्त चुराकर अपने भोगे हुए यथार्थ की अनुभूतियों को समेट, शब्द-ब्रह्म की उपासना में विनम्रता से तल्लीन है - बस इतना ही। शिक्षा - एम० ए० (अर्थशास्त्र)
तकनीकी शिक्षा - विद्युत अभियंत्रण मे डिप्लोमा
सम्प्रति - प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर
रुचि के विषय : नैतिक-मानवीय मूल्य एवं सम्वेदना
बुधवार, 9 मई 2012
हे मिथिला तूं कानय नै
हे मिथिला तूं कानय नै
जानय छी तोरा बड़ दुःख होई छौ
लेकिन नोर खासबय नै
हे मिथिला ...........................
हमहूँ तोहर कर्जदार छी
अपने कर्मे शर्मसार छी
भागी गेल छी गाम छोरी क
एबऊ तूं घबराबई नै
हे मिथिला.......................
याद अबैये खेत पथार
एतय बनल छी हम लाचार
पेट के खातिर भटैक रहल हम
लग किओ बैसाबई नै
हे मिथिला तूं .....................
तू त में छे दुःख के बुझ्बें
अप्पन कस्ट के तू नै कहबे
जनई छी तोहर ममता गे में
मिथिला में फेर बजाबई ने
हे मिथिला तूं कानय नै
रचनाकार -आनंद झा ....
जानय छी तोरा बड़ दुःख होई छौ
लेकिन नोर खासबय नै
हे मिथिला ...........................
हमहूँ तोहर कर्जदार छी
अपने कर्मे शर्मसार छी
भागी गेल छी गाम छोरी क
एबऊ तूं घबराबई नै
हे मिथिला.......................
याद अबैये खेत पथार
एतय बनल छी हम लाचार
पेट के खातिर भटैक रहल हम
लग किओ बैसाबई नै
हे मिथिला तूं .....................
तू त में छे दुःख के बुझ्बें
अप्पन कस्ट के तू नै कहबे
जनई छी तोहर ममता गे में
मिथिला में फेर बजाबई ने
हे मिथिला तूं कानय नै
रचनाकार -आनंद झा ....
I am a management graduate done MBA and Post graduate diploma in financial management . Done Become(H) and also a supplement consultant for nutrition and health. writing poetry in maithili and hindi
गजल
जुलुम ऐना करै छी कोना
अहाँ ऐना बिसरै छी कोना
ककर राखी करेज मांथ
धक् सौ क' बजरै छी कोना
बैरिन मुख क' देखि अहाँ
हाथे छाहेर करै छी कोना
हमर आत्मा छाउर बना
आनक संग धरै छी कोना
सात जन्म क' संग फुसिये
एके जन्म में छोरै छी कोना
कहलों जिबी अहिं ल' ''रूबी''
सौतिन पर मरै छी कोना
(सरल वार्णिक बहर,वर्ण --१०)
स्व्स्नेह- रूबी झा
अहाँ ऐना बिसरै छी कोना
ककर राखी करेज मांथ
धक् सौ क' बजरै छी कोना
बैरिन मुख क' देखि अहाँ
हाथे छाहेर करै छी कोना
हमर आत्मा छाउर बना
आनक संग धरै छी कोना
सात जन्म क' संग फुसिये
एके जन्म में छोरै छी कोना
कहलों जिबी अहिं ल' ''रूबी''
सौतिन पर मरै छी कोना
(सरल वार्णिक बहर,वर्ण --१०)
स्व्स्नेह- रूबी झा
गजल
अहाँक गहिर झील सन आइंख क' जौं हम नील कमल कैह दी'
सौंस नगर जैर क' मैर जैत जौं एही पर कोनो गजल कैह दी'
अहाँ चली जखन थामि-थामि क' हजारो नजेर अहिंक तकै अछि
अहाँक संगमरमर सन देह क' किये नै ताजमहल कैह दी'
इठला- इठला क' छुवी-छुवी जाई अहाँक बदन पवन पुरिवा
आई अहाँ लेल पुरिवा क' हम कियेक नै पवन चंचल कैह दी'
कमला- कोशी क' देखू धार बहे अछि अहींक चलब अनुकूले त'
देखू किये नै हम सबटा धारो के अहिंक नाम सौं बहल कैह दी'
मेघो बरसय अछि अहींक केशक करि घटा सौं पूछीये -पूछीये
कहू किएक हम नै अहाँक केशो क' घन करिया बादल कैह दी'
(सरल वर्णिक बहर, वर्ण --२५)
रूबी झा
गजल
मीठगर बोली हम जनय छी
तैयो तीतगर बात करय छी
जौं साहित्य समाजक दर्पण
पाँती मे दर्पण देखबय छी
मिथिला के गुणगान बहुत भेल
जे आजुक हालात, कहय छी
भजन बहुत मिथिला मे लिखल
अछि पाथर, भगवान देखय छी
रोटी पहिने या सुन्दरता
सभहक सोझाँ प्रश्न रखय छी
भूख, अशिक्षा, बेकारी सँग
साल साल हम बाढ़ि भोगय छी
सुमन लिखत श्रृंगारक कविता
पहिने हालत केँ बदलय छी
तैयो तीतगर बात करय छी
जौं साहित्य समाजक दर्पण
पाँती मे दर्पण देखबय छी
मिथिला के गुणगान बहुत भेल
जे आजुक हालात, कहय छी
भजन बहुत मिथिला मे लिखल
अछि पाथर, भगवान देखय छी
रोटी पहिने या सुन्दरता
सभहक सोझाँ प्रश्न रखय छी
भूख, अशिक्षा, बेकारी सँग
साल साल हम बाढ़ि भोगय छी
सुमन लिखत श्रृंगारक कविता
पहिने हालत केँ बदलय छी
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गजल,
श्यामल सुमन
क्या कहूँ अपने से अपने ही बारे में? इस प्रतियोगी युग में जीने के लिए लगातार कार्यरत एक जीवित-यंत्र, जिसे सामान्य भाषा में आदमी कहा जाता है और जो इसी आपाधापी से कुछ वक्त चुराकर अपने भोगे हुए यथार्थ की अनुभूतियों को समेट, शब्द-ब्रह्म की उपासना में विनम्रता से तल्लीन है - बस इतना ही। शिक्षा - एम० ए० (अर्थशास्त्र)
तकनीकी शिक्षा - विद्युत अभियंत्रण मे डिप्लोमा
सम्प्रति - प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर
रुचि के विषय : नैतिक-मानवीय मूल्य एवं सम्वेदना
मंगलवार, 8 मई 2012
................माँ धरती के पुकार............
हम धरती मिथिलांचल के, एखनो तक गुलाम छि!
अंग्रेज के कैद सs छुटलोउ, अपनों कैद में पड़ल छि!
अंग्रेज सs लड़िकs हमर पुत्र आज़ाद करौलक
अपन जे छल वैह लूटि लूटी कs खाया
रिश्वत आ भ्रस्टाचार के ज़ंजीर में आयो ज़करल छि !
दो सो साल तक अंग्रेज के झूठा खेलोऊ
हमर पुत्र जवान दुसमन के कैद सs छुरौलक
आई के नेता की जाने, हम कोण आइग में जलाल छि !
जवान पुत्र के कुर्बानी के हम एखन तक नय छि बिसरल.
इ कुर्सी के भूखल नेता फेर सs सूली पर चढ़ेलाक
पकिस्तान बना कs जखन हमरा बाटल गेल
हमर दोनों बाह कसाय के हाथ कटी देल गेल
धरा ऊपर खींचि देल डढैर, दुइ भागमें एना हम बँटल छी
आजादी के झूठे अग्वे कुर्सी सरताज भय गेल
शहीद के वंश एक एक रोटी के मोहताज भय गेल
"रधे" हालत के देख आई शहीदों के , हम धरती में गड़ल छि !!
गजल
घर केँ तोड़ि मकान बनाबी
टाका अछि तऽ आदर भेटत
द्वारो पर दोकान बनाबी
आगाँ पाछाँ लोक घूमत जौं
सज्जन केँ नादान बनाबी
बच्चा सब केँ हास्टल भेजू
कुक्कुर केँ सन्तान बनाबी
जीवन देलक आस लगाऽ जे
मातु पिता निम्झान बनाबी
सबटा सुख हमरे लग आबय
एहेन कियै अरमान बनाबी
हमहुँ जीबी लोकक संग मे
दुनिया सुमन महान बनाबी
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गजल,
श्यामल सुमन
क्या कहूँ अपने से अपने ही बारे में? इस प्रतियोगी युग में जीने के लिए लगातार कार्यरत एक जीवित-यंत्र, जिसे सामान्य भाषा में आदमी कहा जाता है और जो इसी आपाधापी से कुछ वक्त चुराकर अपने भोगे हुए यथार्थ की अनुभूतियों को समेट, शब्द-ब्रह्म की उपासना में विनम्रता से तल्लीन है - बस इतना ही। शिक्षा - एम० ए० (अर्थशास्त्र)
तकनीकी शिक्षा - विद्युत अभियंत्रण मे डिप्लोमा
सम्प्रति - प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर
रुचि के विषय : नैतिक-मानवीय मूल्य एवं सम्वेदना
सोमवार, 7 मई 2012
गजल
अप्पने देशमें बनल छि हम सभ परदेशी यौ
जन्मशिद्ध अधिकार सं बंचित छि सभ मधेशी यौ
शोषक शाषक कें बोली सं चलैय मधेश में गोली
मरैय मधेशी जेना लगैय माल जाल मवेशी यौ
नारकीय जिन्गी जीवै पर हम सभ छि मजबूर
करेज चुभैय बबुर जौं कियो कहैय विदेशी यौ
यी जन्मभूमि कर्मभूमि हमर स्वर्गभूमि मधेश
मधेश माए केर संतान हम सभ छि स्वदेशी यौ
बन्ह्की परल मधेश माए कल्पी कल्पी कानैय
स्वतंत्र मधेश के संविधान में करू समावेशी यौ
.................वर्ण-१९...... ........
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट
अप्पने देशमें बनल छि हम सभ परदेशी यौ
जन्मशिद्ध अधिकार सं बंचित छि सभ मधेशी यौ
शोषक शाषक कें बोली सं चलैय मधेश में गोली
मरैय मधेशी जेना लगैय माल जाल मवेशी यौ
नारकीय जिन्गी जीवै पर हम सभ छि मजबूर
करेज चुभैय बबुर जौं कियो कहैय विदेशी यौ
यी जन्मभूमि कर्मभूमि हमर स्वर्गभूमि मधेश
मधेश माए केर संतान हम सभ छि स्वदेशी यौ
बन्ह्की परल मधेश माए कल्पी कल्पी कानैय
स्वतंत्र मधेश के संविधान में करू समावेशी यौ
.................वर्ण-१९......
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट
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गजल,
प्रभात राय भट्ट
हमर संक्षिप्त परिचय नाम:-प्रभात राय भट्ट जन्म:-बि.स.२०३६/०४/१५ पिता:- श्री गंगेश्वर राय (शिक्षक)माता:-श्रीमती गायत्री देवी (समाज सेविका)पितामह :- स्वर्गीय गौरीशंकर राय जेष्ठ भ्राता:- श्री प्रकाश राय भट्ट अनुज :- प्रवीन राय भट्ट बोहीन:- आशा देवी राय पत्नी :- पूनम देवी राय जेष्ठ पुत्री :-स्वर्णिम राय भट्ट पुत्र :-सत्यम राय भट्ट पेशा:-नोकरी नेपाल प्रहरी ५ वर्ष, वर्तमान नोकरी साउदी अरब स्थित अमेरिकन दूतावास में आर्म्ड फ़ोर्स, हमर अभिरुचि अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली बहुत जायदा पसंद करैत छी : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि तेह हमरो उदेश्य मिथिला के सम्मान करब
आर मैथिलि साहित्य में अनवरत रूपेण हम अपन योगदान दैत रही इ हमर संकल्प अछि,जय मिथिला जय मैथिलि !!!
गजल
कतेक सहत एही मिथिला में मैथिली बेटी अपमान यौ
आबियो ये बहिना बढ़ू यौ भैया करू मिथिलाक उत्थान यौ
गाम में दहार छल आयेल भदबारी क' फसलो भासल
रबी फसल देखि बाबु माथ हाथ द' बैसला खरिहान यौ
माँ मुख बाबु नै ताकैथ एको बेर नजरियों नै मिलाबैथ
माँ के करेज त ऐना फाटे छैन जेना फाटल आसमान यौ
बाबा गेलखिन वर ताको लेल सौंसे मिथिला घूमी क एला
धिया क' सूरत देखि- देखि दाई क' छुटये छएन प्राण यौ
अछि ईंजिंयर क' मांग बीस लाख डाक्टरक शान की कहू
बड़का ऑफिसरक नै पुछू जेना खुजल अछि दोकान यौ
अछि की दोख एही में कन्या क' सासुर जा क' ओ मारल जेती
नैहरो में त' दहेज़ बिनु आई बेटीये तजै छथि प्राण यौ
कहे ओना छथ बेटी क' लक्ष्मी एहन किएक केलो बिधना
जखने बेटी भूमि खसली सबहक मोन किये निम्झान यौ
----------------सरल वार्णिक बहर वर्ण -२२-----------------
[रूबी झा ]
गजल
प्रेमक दीप जरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु
अपन जान चोरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु
कतेक पैघ-पैघ चोट भेंटल तखनो नै अनुमान भेल
विरह तीर गरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु
सपना में त' पिया मिलन के हम स्वप्न सजा के राखए छी
सिनेह घैल भरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु
आँचर सौं बाट बहारब झार पात हटायेब पिपनी सौं
आँगन सौं त' परा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु
इ त' प्रेमक अनुभूति छैक कोना बूझत जे नै प्रेम करै
रूबी आइंख नोरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु
--------------सरल वार्णिक बहर वर्ण -२२ ---------------
(रूबी झा )
गजल
भेट जाय भगवान किंचित्, की भेटत इन्सान यौ
मुँह सँ जे लोक अप्पन, मोन सँ बेईमान यौ
एक दोसर बात पर, विश्वास कोना, के करत
छोड़ि दियऽ बात आनक, प्रश्न मे सन्तान यौ
बल जाबत छल, कमेलहुँ, धन अरजलहुँ पुत्र लय
आय बनिकय छी उपेक्षित, अपने घर मेहमान यौ
काज आजुक जेहेन हम्मर, भाग्य निर्धारित तेहेन
सूत्र जीवन के बिसरिकय, कोन ठाँ अछि ध्यान यौ
नीति जेहेन, तेहने नीयत, वो नियति छी काल्हि के
जीबू अपनहुँ, लोक जीबय, ई सुमन अरमान यौ
मुँह सँ जे लोक अप्पन, मोन सँ बेईमान यौ
एक दोसर बात पर, विश्वास कोना, के करत
छोड़ि दियऽ बात आनक, प्रश्न मे सन्तान यौ
बल जाबत छल, कमेलहुँ, धन अरजलहुँ पुत्र लय
आय बनिकय छी उपेक्षित, अपने घर मेहमान यौ
काज आजुक जेहेन हम्मर, भाग्य निर्धारित तेहेन
सूत्र जीवन के बिसरिकय, कोन ठाँ अछि ध्यान यौ
नीति जेहेन, तेहने नीयत, वो नियति छी काल्हि के
जीबू अपनहुँ, लोक जीबय, ई सुमन अरमान यौ
Labels:
गजल,
श्यामल सुमन
क्या कहूँ अपने से अपने ही बारे में? इस प्रतियोगी युग में जीने के लिए लगातार कार्यरत एक जीवित-यंत्र, जिसे सामान्य भाषा में आदमी कहा जाता है और जो इसी आपाधापी से कुछ वक्त चुराकर अपने भोगे हुए यथार्थ की अनुभूतियों को समेट, शब्द-ब्रह्म की उपासना में विनम्रता से तल्लीन है - बस इतना ही। शिक्षा - एम० ए० (अर्थशास्त्र)
तकनीकी शिक्षा - विद्युत अभियंत्रण मे डिप्लोमा
सम्प्रति - प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर
रुचि के विषय : नैतिक-मानवीय मूल्य एवं सम्वेदना
रविवार, 6 मई 2012
हजल
भेल किछु बात एहन जे कना गेल हमरा
हरासंखनी कनियाँ माथ बथा गेल हमरा ओना त छै अमावश्या सन कारी केश ओकर
मुदा ओहि मे फड़ल चोर पटा गेल हमरा ओना नाम छै शांती मुदा घर छै माछक हाट
छ' टा बरदक पिलवान बना गेल हमरा फोटूये देख परान उड़ि गेल छल हमर
से माँथ पर बंदूक राखि उड़ा गेल हमरा सब दिन कहै यै जे प्यार नै करै छेँ हमरा
जँ भागौँ त' सौँसे देह दाँत गड़ा गेल हमरा माइ के बजाबे भाइ के बजाबे सब दिन ओ
चाउर दालि आँटाक भाव बता गेल हमरा भने फूलेसरा कुमारे रहि गेल भाइ सब
"अमित" ओ त' जीते जी श्राद्ध करा गेल हमरा सरल वार्णिक बहर
वर्ण-17
अमित मिश्र
हरासंखनी कनियाँ माथ बथा गेल हमरा ओना त छै अमावश्या सन कारी केश ओकर
मुदा ओहि मे फड़ल चोर पटा गेल हमरा ओना नाम छै शांती मुदा घर छै माछक हाट
छ' टा बरदक पिलवान बना गेल हमरा फोटूये देख परान उड़ि गेल छल हमर
से माँथ पर बंदूक राखि उड़ा गेल हमरा सब दिन कहै यै जे प्यार नै करै छेँ हमरा
जँ भागौँ त' सौँसे देह दाँत गड़ा गेल हमरा माइ के बजाबे भाइ के बजाबे सब दिन ओ
चाउर दालि आँटाक भाव बता गेल हमरा भने फूलेसरा कुमारे रहि गेल भाइ सब
"अमित" ओ त' जीते जी श्राद्ध करा गेल हमरा सरल वार्णिक बहर
वर्ण-17
अमित मिश्र
बाल गजल
पीठ पर छै बैग बौआ चलल इस्कुल,
लाल पियर ड्रेस चमकै भरल इस्कुल मांथ टोपी घेँट मे छै लंच लटकल
दाइ संगे चलल मोने रमल इस्कुल खेल सेहो नीक खेलै छोट बौआ
वर्ग छै मैदान खेलक बनल इस्कुल चित्र पाड़ै मे लगै छै मोन ओकर
मीठ झगड़ो पर त' खूबे हँसल इस्कुल नै पहाड़ा पढ़ब नै सीखब ककहरा
आब छै कंपुटर सीखा रहल इस्कुल भेल छुट्टी संग हल्ला घर चलल ओ
नाम जहिया "अमित" अपनो लिखल इस्कुल फाइलातुन
2122 तीन बेर
बहरे-रमल
अमित मिश्र
लाल पियर ड्रेस चमकै भरल इस्कुल मांथ टोपी घेँट मे छै लंच लटकल
दाइ संगे चलल मोने रमल इस्कुल खेल सेहो नीक खेलै छोट बौआ
वर्ग छै मैदान खेलक बनल इस्कुल चित्र पाड़ै मे लगै छै मोन ओकर
मीठ झगड़ो पर त' खूबे हँसल इस्कुल नै पहाड़ा पढ़ब नै सीखब ककहरा
आब छै कंपुटर सीखा रहल इस्कुल भेल छुट्टी संग हल्ला घर चलल ओ
नाम जहिया "अमित" अपनो लिखल इस्कुल फाइलातुन
2122 तीन बेर
बहरे-रमल
अमित मिश्र
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