मैथिली साहित्य आ भाषा लेल समर्पित Maithiliputra - Dedicated to Maithili Literature & Language
मंगलवार, 26 जून 2012
कविता - नहि नारि बिना कल्याण
नारी अपनेके पाओल,कै रूप आ बानगी में!
देखल कै रूप अहाँ केर,अहि छोट छिन जिन्नगी में!
पहिल रूप माय केर देखल,त्याग आ अटूट स्नेह केर!
भेटल निशिदिन एकहिं टा,मूरत निश्छल नेह केर!!
भेटल दोसर रूप बहिन केर,बिना आस किछु पाबय के!
संग रहथि बा दूर जाय क,सब दिन संबंध निभाबय के!!
फेर ऐली भार्या बनि कै,सदिखन प्रेम-सुधा बरसाबय लेल!
बिना चाह अपना लेल कोनो,घर-संसार चलाबय लेल!!
तकर बाद बेटी बनि ऐली,सुन्न आँगन-द्वारि चहकाबय लेल!
सब रूपे सम्हारि जीवन के,चलि गेली सासुर गमकाबय लेल!!
भेटल आरो रूप जतेक भी,सेहो छल,बस त्याग आर ममता केर!
मुदा नहिं जानि,कतौ नहि देखल,जीवन अधिकार आ समता केर!!
नहि जानि मोन ई खिन्न रहति अछि,देखि आब ई कत्लेआम!
आबु ज्ञानी भ सोची-समझी आ ली मोन सँ ई शपथ संज्ञान!!
नारि बिना नहि मान पुरुष केर,नारि थिक पुरुषार्थक शान!
बंद करी कन्या भ्रूण-हत्या,नहि नारि बिना कल्याण!!
राजीव रंजन मिश्र
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राजीव रंजन मिश्र
हम बाटक अनजान पथिक छी
सत नेहक सदिकाल रसिक छी
जे भेटल से मानि चलल सदिखन
नै खोहिस सरकार अधिक छी
नै हाकिम नै लाट गवर्नर धरि
अपना मोनक ख़ास श्रमिक छी
जे देखल से भाखि चलल सगरो
औ बाबू ऐ मे लाज कथिक छी
बुझि राखल राजीव त' जिनगी ई
क्षणभंगुर आ चारि घऱिक छी
सोमवार, 25 जून 2012
कविता - तस्वीर बदलबा के अछि
सरल भाव संचेतन मोन में,
फुटि रहल अछि चिनगारी!
आंखि सुन्न भय देखि रहल अछि ,
मरजादा आर हया केर लाचारी!
मोन में दृढ संकल्पित भ कय,
तस्वीर बदलबा के अछि !
नहि चाही आब ओ समाज,
जाहि में नारी कानति होईति!
जग में सुन्नर रूप दया केर,
स्नेहपूर्ण आ दुखियारी !
ममता केर दरिया सन बहि क,
किया सुखायल होइथि नारी!
निश्चल भ मानी एहि अटल सत्य के,
नारि सकल जगतक सृजनकारी!
तिरस्कृत,अपमानित आ प्रतारित भ,
लेती रूप संहारकारी!
बदलल दुनिया आ सोच बदलि गेल,
पुरुशहूँ टा जरुर बदलतय!
नारियो सबतरि सम्मानित होइथी,
हुन्कहूँ दशा सुधरते!
पर ध्यान रहै माता आ बहिन,
बदलै नहि नारि सुलभ लज्जा आ चिर-मर्यादित नारी!
बदलल जुग केर एहि परिपाटी में,ई जुग पुरान सच रहै जारी!
---राजीव रंजन मिश्र
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कविता,
राजीव रंजन मिश्र
हम बाटक अनजान पथिक छी
सत नेहक सदिकाल रसिक छी
जे भेटल से मानि चलल सदिखन
नै खोहिस सरकार अधिक छी
नै हाकिम नै लाट गवर्नर धरि
अपना मोनक ख़ास श्रमिक छी
जे देखल से भाखि चलल सगरो
औ बाबू ऐ मे लाज कथिक छी
बुझि राखल राजीव त' जिनगी ई
क्षणभंगुर आ चारि घऱिक छी
रुबाइ
गोरी तोहर काजर जान मारैए
छौंरा सभ सगर हाय तान मारैए
पेएलक बड़ भाग काजर विधातासँ
तोहर आँखिमे कते शान मारैए
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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जगदानन्द झा 'मनु',
रुबाइ
रुबाइ
लाली मानि कय अहाँ ठोरसँ लगा लिअ
आँखिक अपन करीया काजर बना लिअ
एना जुनि अहाँ कनखी नजरिसँ देखू
प्रियतम बना ‘मनु’केँ करेजसँ लगा लिअ
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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जगदानन्द झा 'मनु',
रुबाइ
प्रभाकर बाबा और सुंदर कनियाँ
| मिथलांचल में ओना तऽ बाबा सब के बहुत आदर- सत्कार कैल जायत अछि, हम एहने एक प्रभाकर बाबा के हंसी भरल घटना सुना रहल छी, |
| प्रभाकर बाबा भाल्पट्टी गाम के रहनिहार छिया, इ झार-फुक सेहो करेत छथि ताहि लक् ई बहुत बिख्यात भऽ गेला, |
| प्रभाकर बाबा एक दिन कोनो कारन बस बम्बई सऽ हवाई जहाज में आबि रहल छला, हुनका बगल में एक सुंदर कनियाँ के शीट छल कनियाँ सेहो आबि क हुनका बगल में बैसी गेलैन, |
| सुंदर कनियाँ जहाज में सफर करैत काल प्रभाकर बाबा सऽ कहलखिन बाबा आहा हमरा पर एक कृपा कऽ सकेत छी ? |
| प्रभाकर बाबा सुंदर कनियाँ कहलखिन आहा कहू तऽ सही हम आहा के कि मदद करू ? |
| कनियाँ बजली बाबा हम नै एक बहुमूल्य चीज़ “लिपिस्टिक” खरिद्लो हन् लेकिन ओ कस्टम के लिमिट के ऊपर भ गेल हन्, |
| हमरा डर या जे कस्टम वला ओकरा जब्त नै कऽ लिये, आहा जे “लिपिस्टिक” के अपना चोंगा के अंदर नुका कऽ ल चलितो ! |
| प्रभाकर बाबा बजला ओना तऽ आहाक मदद करे में हमरा खुशी मिलतै, मगर आहाके कही दी जे हम झूठ नहीं बाजे छी ! |
| बाबा जी आहॅक मासूम मुह के वजह स आहाके कियो पकरत नहीं, त झूठ बाजे के सवाले नहीं उठत ! |
| प्रभाकर बाबा कहलैथ ठीक या आहाक जे विचार . |
| जखन हवाई जहाज आकाश स निचा उतरल त सब कस्टम स जय लागल, कनियाँ बाबा के आगा जय देलखिन और अपने पीछा-पीछा बीदा भ गेली |
| कस्टम के ऑफीसर सब सवारी के जेना पुछलक ओनाही प्रभाकर बाबा स सेहो पुछलक, बाबा जी आहा गैरकानुनी तरीका स किछु छुपेलो हन् त नहीं? |
| प्रभाकर बाबा बजला हमरा कापर सऽ निचा ड़ाऽर (कमर) तक किछु गैरकानुनी तौर किछु नहीं छुपेलो हन् . |
| ऑफीसर के इ प्रभाकर बाबा जबाब किछु अजीब सन् लगले, ताहि दुआरे फेर स पुछलक, और ड़ाऽर सऽ निचा जमीन तक आहा गैरकानुनी तौर पर किछु नुकेलो हाँ कि ? |
| प्रभाकर बाबा बजला हां एक छोट सुंदर चीज छुपेलो हन्.... जेकर इस्तेमाल औरते टाऽ करैत अछि...लेकिन हमरा |
| पास जे या ओकर इस्तेमाल अखन तक नहीं भेल हन् बुझलो कस्टम बाबु ! |
| जोर सऽ ठहाका
लगाबैत ऑफीसर कहलक, ठीक या बाबा
जी आहा जा सकेऽ छी, ....दोसर
आगा आबु ! ***** अजय ठाकुर (मोहन जी) |
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अजय ठाकुर (मोहन जी),
बीहनि कथा
शनिवार, 23 जून 2012
गजल
करिया आइंखक कातक काजर
शोभि रहल अहिवातक काजर
नव यौवन के प्रीत में पसरल
नयन सँ ल नथियातक काजर
लजा गेली ओ देइख क लेभरल
अपन चतुर्थी परातक काजर
सुन्न लगय बिनु काजर नयना
लेप लेलहुं बिन बातक काजर
अनसुहांत सन गप श्रृंगारक
नयन लगय नै जातक काजर
नैन हुनक जा धरि अछि मूनल
बस चुप बैसल तातक काजर
नयन-वाण सँ प्राण जों बंचि गेल
"नवल" जान लेत घातक काजर
----- वर्ण - १३ -----
►नवलश्री "पंकज"◄ गजल संख्या -१३
< २१.०६.२०१२ >
शोभि रहल अहिवातक काजर
नव यौवन के प्रीत में पसरल
नयन सँ ल नथियातक काजर
लजा गेली ओ देइख क लेभरल
अपन चतुर्थी परातक काजर
सुन्न लगय बिनु काजर नयना
लेप लेलहुं बिन बातक काजर
अनसुहांत सन गप श्रृंगारक
नयन लगय नै जातक काजर
नैन हुनक जा धरि अछि मूनल
बस चुप बैसल तातक काजर
नयन-वाण सँ प्राण जों बंचि गेल
"नवल" जान लेत घातक काजर
----- वर्ण - १३ -----
►नवलश्री "पंकज"◄ गजल संख्या -१३
< २१.०६.२०१२ >
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गजल,
पंकज चौधरी (नवलश्री)
गजल
आखर-आखर छल छिड़िआयल जोड़ि देलंहु त गजल बनल
अपन कलम केर लाधल चुप्पी तोड़ि देलंहु त गजल बनल
भाव पृष्ठ पर शब्दक अरिपन पाईर रहल छी साँझ-परात
मोनक पट हम गजल रंग सँ ढोरि देलंहु त गजल बनल
गजल-गंग केर घाट गहिंरगर गोंत लगेलौं थाह ने भेटल
मन-प्रवाह दिश लगन नाह के मोड़ि देलंहु त गजल बनल
टीस उठल किछु मोन पड़ल हम काइन क नोरे-नोर भेलंहु
पांइत-पांइत के नोरक पोखरि बोरि देलंहु त गजल बनल
वर्ण-पंखुड़ी शब्द-सुमन सँ पांइतक माला गाईथ रहल हम
शब्द के भावक सरस सरोवरि घोरि देलंहु त गजल बनल
रंग रदीफक सजल काफिया बहरक लय मतला-सँ-मकता
बुइध के परती - उस्सर धरती कोड़ि देलंहु त गजल बनल
छूटल- टूटल -रूसल सभ किछु गजल-बाट पर संगी आखर
"नवल" गजल कहबा पाछा जग छोड़ि देलंहु त गजल बनल
----- वर्ण - २५ -----
►नवलश्री "पंकज"◄ गजल संख्या- -१२
< १९.०६.२०१२ >
अपन कलम केर लाधल चुप्पी तोड़ि देलंहु त गजल बनल
भाव पृष्ठ पर शब्दक अरिपन पाईर रहल छी साँझ-परात
मोनक पट हम गजल रंग सँ ढोरि देलंहु त गजल बनल
गजल-गंग केर घाट गहिंरगर गोंत लगेलौं थाह ने भेटल
मन-प्रवाह दिश लगन नाह के मोड़ि देलंहु त गजल बनल
टीस उठल किछु मोन पड़ल हम काइन क नोरे-नोर भेलंहु
पांइत-पांइत के नोरक पोखरि बोरि देलंहु त गजल बनल
वर्ण-पंखुड़ी शब्द-सुमन सँ पांइतक माला गाईथ रहल हम
शब्द के भावक सरस सरोवरि घोरि देलंहु त गजल बनल
रंग रदीफक सजल काफिया बहरक लय मतला-सँ-मकता
बुइध के परती - उस्सर धरती कोड़ि देलंहु त गजल बनल
छूटल- टूटल -रूसल सभ किछु गजल-बाट पर संगी आखर
"नवल" गजल कहबा पाछा जग छोड़ि देलंहु त गजल बनल
----- वर्ण - २५ -----
►नवलश्री "पंकज"◄ गजल संख्या- -१२
< १९.०६.२०१२ >
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गजल,
पंकज चौधरी (नवलश्री)
गजल
काजरसँ शोभा आँखिक की आंखिसँ शोभित काजर
करिया जादू सँ केलक सभके सम्मोहित काजर
नजरि नञि ककरो लागय जादू - टोना छू - मंतर
डायनो-जोगिन के केलक मोन के मोहित काजर
लागैन्हि नजरि नें अपना की लेती प्राण अनकर
फँसल मोन दुविधा में ई देख अघोषित काजर
सम्हारल जेतै कोना क ई भाव करेजक भीतर
परसै प्रणय - निवेदन नैन नवोदित काजर
ई मेघो देखि लाजयल जे कारी खट-खट काजर
"नवल" कलंकक सोझा भ गेल अलोपित काजर
----- वर्ण - १९ -----
►नवलश्री "पंकज"◄ गजल संख्या-११
करिया जादू सँ केलक सभके सम्मोहित काजर
नजरि नञि ककरो लागय जादू - टोना छू - मंतर
डायनो-जोगिन के केलक मोन के मोहित काजर
लागैन्हि नजरि नें अपना की लेती प्राण अनकर
फँसल मोन दुविधा में ई देख अघोषित काजर
सम्हारल जेतै कोना क ई भाव करेजक भीतर
परसै प्रणय - निवेदन नैन नवोदित काजर
ई मेघो देखि लाजयल जे कारी खट-खट काजर
"नवल" कलंकक सोझा भ गेल अलोपित काजर
----- वर्ण - १९ -----
►नवलश्री "पंकज"◄ गजल संख्या-११
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गजल,
पंकज चौधरी (नवलश्री)
बाल गजल
मोन पड़ल ई कियै अनेरे बात पुरनगर बचपन के
आंखि नोरेलै मोन जड़ेलक याद रमनगर बचपन के
बचपन दाबल-गाड़ल-बिसरल यौवन के मादकता में
खोलि रहल छी खाली मोटरी बैसल असगर बचपन के
बाबुक-कनहा मायक-कोरा अनुपम झूला सन घुआ-मुआँ
ता-ता-ता थैया आर ठेहुनिया खेल छमसगर बचपन के
ठकि-फुसला क कते खुयेलइन्ह दूध-भात आ गूड़क पूआ
चंदा-मामा आर मौसी-बिलाय नेह हिलसगर बचपन के
बस फूईसक खेती द्वेषक दोषी "नवल" जुआनी निर्संतोषी
धाह जुआनिक जड़ा गेलै ओ गाछ झमटगर बचपन के
----- वर्ण - २३ -----
►नवलश्री "पंकज"◄ गजल संख्या--१०
आंखि नोरेलै मोन जड़ेलक याद रमनगर बचपन के
बचपन दाबल-गाड़ल-बिसरल यौवन के मादकता में
खोलि रहल छी खाली मोटरी बैसल असगर बचपन के
बाबुक-कनहा मायक-कोरा अनुपम झूला सन घुआ-मुआँ
ता-ता-ता थैया आर ठेहुनिया खेल छमसगर बचपन के
ठकि-फुसला क कते खुयेलइन्ह दूध-भात आ गूड़क पूआ
चंदा-मामा आर मौसी-बिलाय नेह हिलसगर बचपन के
बस फूईसक खेती द्वेषक दोषी "नवल" जुआनी निर्संतोषी
धाह जुआनिक जड़ा गेलै ओ गाछ झमटगर बचपन के
----- वर्ण - २३ -----
►नवलश्री "पंकज"◄ गजल संख्या--१०
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गजल,
पंकज चौधरी (नवलश्री)
गजल
सभ मात-पिता केर शौख-सेहन्ता बौआ करता नाम
मगन जुआनिक माया नगरी बौआ मनसुख राम
छथि बाबू-पित्ती घरक धरणि थम्हने बनि क खाम
संतति कर्म सँ देह नुकौने करम केने अछि बाम
बाबुक अरजल पर में फूटानी माटि लगै नै चाम
जों अपना कन्हा हर पड़ल त जय-जय सीता-राम
अन्तह शोणित सुखा रहल आ घर बहय नै घाम
बबुआनी केर अजब छै सनकी बैरी भ गेल गाम
ईरखे नान्गैर कटबै लै जे तेजलक मिथिला धाम
परदेसक माया ओझरायल घूमि रहल छै झाम
अपना आँगन सोन छोईड़ क अनकर बीछी ताम
घर छोड़ि घुर-मुड़िया खेलक कहिया लागत थाम
मोल बुझय नहि भावक भाषा भाव पूछय नै दाम
चलु रहब माँ मैथिल आँगन नेह बहय जै ठाम
"नवल" निवेदन मैथिल जन सँ छोडू नै मिथिलाम
छै पागक शोभा माथे पर आ चरणहि नीक खराम
----- वर्ण - २० -----
►नवलश्री "पंकज"◄ गजल संख्या -९
मगन जुआनिक माया नगरी बौआ मनसुख राम
छथि बाबू-पित्ती घरक धरणि थम्हने बनि क खाम
संतति कर्म सँ देह नुकौने करम केने अछि बाम
बाबुक अरजल पर में फूटानी माटि लगै नै चाम
जों अपना कन्हा हर पड़ल त जय-जय सीता-राम
अन्तह शोणित सुखा रहल आ घर बहय नै घाम
बबुआनी केर अजब छै सनकी बैरी भ गेल गाम
ईरखे नान्गैर कटबै लै जे तेजलक मिथिला धाम
परदेसक माया ओझरायल घूमि रहल छै झाम
अपना आँगन सोन छोईड़ क अनकर बीछी ताम
घर छोड़ि घुर-मुड़िया खेलक कहिया लागत थाम
मोल बुझय नहि भावक भाषा भाव पूछय नै दाम
चलु रहब माँ मैथिल आँगन नेह बहय जै ठाम
"नवल" निवेदन मैथिल जन सँ छोडू नै मिथिलाम
छै पागक शोभा माथे पर आ चरणहि नीक खराम
----- वर्ण - २० -----
►नवलश्री "पंकज"◄ गजल संख्या -९
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गजल,
पंकज चौधरी (नवलश्री)
गजल
देख मुहँ मूंगबा बहुतो बटाई छै
नाम ककरो गरीबक नै सुहाई छै
भेट निर्धन कए नै भेटलै मिसियो
पेट भरि जाइ सभ दीनक दबाई छै
मीठ भाषण बरख पाँचे कते दै छै
जीतकेँ बाद नेतोसभ नुकाई छै
घूस खा खा कs बनलै भोकना पारा
आन दमड़ीसँ चमड़ी बड चबाई छै
भ्रष्ट नेता घुमै बीएमडब्लूमे
एखनो हक गरीबक 'मनु' बटाई छै
(२१२२ १२२२ १२२२, बहरे-मुशाकिल )
जगदानन्द झा 'मनु' : गजल संख्या -५८
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जगदानन्द झा 'मनु'
शुक्रवार, 22 जून 2012
गजल
हमर अहाँकेँ प्रीतक खिस्सा आब दुनियाँ बिसरत नहि
युग-युग तक लोकक मोन सँ अपन नाम घटत नहि
सूर्य चान केँ प्रेमालाप सँ ई दुनियाँ प्रकाशित अछि भेल
हुनकर संग बिनु कखनहुँ ई दुनियाँ चमकत नहि
भोला शंकर डमरू बजाबथि पारवती नाचैत अँगना
हुनकर दुनू केँ इक्षा बिनु कएखनो श्रृष्टि चलत नहि
कृष्ण नचाबथि सगरो गोकुल गोबरधन पर्वत उठा
बिनु राधिका संग कएखनो हुनक मुरली बजत नहि
फूल भोंडा केँ प्रीतक खिस्सा सभतरि बहुत पुरान भेलै
'मनु' 'सुगँधाक' नाम बिनु प्रेम कथा आब गमकत नहि
(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२२)
जगदानन्द झा 'मनु' : गजल संख्या-५६
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गजल,
जगदानन्द झा 'मनु'
गुरुवार, 21 जून 2012
गजल
आई काईल क' प्रेम प्रीत एकटा जेना खेल भ' गेल छैक
शहेर बंबई केर बड़ा पाव आ पूरी भेल भ' गेल छैक
एकटा क' आंखि सौं दोसर ,तेसर क' कहल प्रेम अहिं सौं
लागै अछि जेना कोनो वस्त्र आभुषनक सेल भ' गेल छैक
नै बुझै माई बहिन नै बुझै काकी मामी भठल छै ई जुग
कहू कतेक यौ नरको में जेना ठेलम ठेल भ' गेल छैक
की बुढ्बा की जुअनका अधेर बालक त' आरो बिगरल
जेना बुझा रहल बिनु टिकट क' कोनो रेल भ' गेल छैक
कहुना अहाँ बचा क' राखु ''रूबी'' बेटी पुतहु केर लाज क'
ई भठीयेल जुग में विद्वानो त' बकलेल भ' गेल छैक
वर्ण --२२
रूबी झा
शहेर बंबई केर बड़ा पाव आ पूरी भेल भ' गेल छैक
एकटा क' आंखि सौं दोसर ,तेसर क' कहल प्रेम अहिं सौं
लागै अछि जेना कोनो वस्त्र आभुषनक सेल भ' गेल छैक
नै बुझै माई बहिन नै बुझै काकी मामी भठल छै ई जुग
कहू कतेक यौ नरको में जेना ठेलम ठेल भ' गेल छैक
की बुढ्बा की जुअनका अधेर बालक त' आरो बिगरल
जेना बुझा रहल बिनु टिकट क' कोनो रेल भ' गेल छैक
कहुना अहाँ बचा क' राखु ''रूबी'' बेटी पुतहु केर लाज क'
ई भठीयेल जुग में विद्वानो त' बकलेल भ' गेल छैक
वर्ण --२२
रूबी झा
गजल
हम कहानी जीवन केर सुनाऊ कोना
करेज चिर कs घाऊ हम देखाऊ कोना
नाम हुनके जपैतछि जे देलक दगा
द्गावाज प्रीतम सँ दिल लगाऊ कोना
चमकैत रूप पाछू जे भागल दीवाना
ओहन दगावाज के हम मनाऊ कोना
विछोडक पीड़ा सँ सुल्गैत अछि करेज
धुँवा धुँवा अछि जीनगी बताऊ कोना
विसरल नै जाईए ओ मिलनक पल
प्रीतमक ईआद दिल सँ भगाऊ कोना
जरल करेज में प्रेम जगाएब कोना
दिल में प्रेमक दीया आब जराऊ कोना
वर्ण-१५------
रचनाकार-प्रभात राय भट्ट
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गजल,
प्रभात राय भट्ट
हमर संक्षिप्त परिचय नाम:-प्रभात राय भट्ट जन्म:-बि.स.२०३६/०४/१५ पिता:- श्री गंगेश्वर राय (शिक्षक)माता:-श्रीमती गायत्री देवी (समाज सेविका)पितामह :- स्वर्गीय गौरीशंकर राय जेष्ठ भ्राता:- श्री प्रकाश राय भट्ट अनुज :- प्रवीन राय भट्ट बोहीन:- आशा देवी राय पत्नी :- पूनम देवी राय जेष्ठ पुत्री :-स्वर्णिम राय भट्ट पुत्र :-सत्यम राय भट्ट पेशा:-नोकरी नेपाल प्रहरी ५ वर्ष, वर्तमान नोकरी साउदी अरब स्थित अमेरिकन दूतावास में आर्म्ड फ़ोर्स, हमर अभिरुचि अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली बहुत जायदा पसंद करैत छी : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि तेह हमरो उदेश्य मिथिला के सम्मान करब
आर मैथिलि साहित्य में अनवरत रूपेण हम अपन योगदान दैत रही इ हमर संकल्प अछि,जय मिथिला जय मैथिलि !!!
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