मैथिलीपुत्र ब्लॉग पर अपनेक स्वागत अछि। मैथिलीपुत्र ब्लॉग मैथिली साहित्य आ भाषा लेल समर्पित अछि। अपन कोनो तरहक रचना / सुझाव jagdanandjha@gmail.com पर पठा सकैत छी। कृपया एहि ब्लॉगकेँ subscribe/ फ़ॉलो करब नहि बिसरब, जाहिसँ नव पोस्ट होएबाक जानकारी अपने लोकनिकेँ भेटैत रहत।

गुरुवार, 10 मई 2012

कलाकन्द भऽ गेलहुँ (बाल-गीत)

धिया-पुता देखिकय आनन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ

केहेन सहज मुख पर मुस्कान छै
छन मे झगड़ा छनहि मिलान छै
तीरथ बेरागन  व्यर्थ करय छी 

सद्यः धिया-पुता सोझाँ भगवान छै
हँसी खुशी देखिकय बुलन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ

बनि कियो इन्जन रेल चलाबय
कियो फूँक मारय पीपही
बजाबय
बिनु पैसा के हँसि हँसि घूमय
छन कलकत्ता दिल्ली पहुँचाबय
लागय बच्चा सँगे जुगलबन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ

कियो जोर खसलय कियो जोर हँसलय
कियो ठेलि देलकय कहुना
सम्हरलय
देखलहुँ निश्छल रूप मनोहर
सुमन अपन सब कष्ट बिसरलय
मोन साफ भेल शकरकन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ

बुधवार, 9 मई 2012

हे मिथिला तूं कानय नै

हे मिथिला तूं कानय नै
जानय छी तोरा बड़ दुःख होई छौ
लेकिन नोर खासबय नै
हे मिथिला ...........................
हमहूँ तोहर कर्जदार छी
अपने कर्मे शर्मसार छी
भागी गेल छी गाम छोरी क
एबऊ तूं घबराबई नै
हे मिथिला.......................
याद अबैये खेत पथार
एतय बनल छी हम लाचार
पेट के खातिर भटैक रहल हम
लग किओ बैसाबई नै
हे मिथिला तूं .....................
तू त में छे दुःख के बुझ्बें
अप्पन कस्ट के तू नै कहबे
जनई छी तोहर ममता गे में
मिथिला में फेर बजाबई ने
हे मिथिला तूं कानय नै 


रचनाकार -आनंद झा ....

गजल

जुलुम ऐना करै छी कोना
अहाँ ऐना बिसरै छी कोना

ककर राखी करेज मांथ
धक् सौ क' बजरै छी कोना

बैरिन मुख क' देखि अहाँ
हाथे छाहेर करै छी कोना

हमर आत्मा छाउर बना
आनक संग धरै छी कोना

सात जन्म क' संग फुसिये
एके जन्म में छोरै छी कोना

कहलों जिबी अहिं ल' ''रूबी''
सौतिन पर मरै छी कोना

(सरल वार्णिक बहर,वर्ण --१०)
स्व्स्नेह- रूबी झा 

गजल


अहाँक गहिर झील सन आइंख क' जौं हम नील कमल कैह दी'
सौंस नगर जैर क' मैर जैत जौं एही पर कोनो गजल कैह दी'

अहाँ चली जखन थामि-थामि क' हजारो नजेर अहिंक तकै अछि
अहाँक संगमरमर सन देह क' किये नै ताजमहल कैह दी'

इठला- इठला क' छुवी-छुवी जाई अहाँक बदन पवन पुरिवा
आई अहाँ लेल पुरिवा क' हम कियेक नै पवन चंचल कैह दी'

कमला- कोशी क' देखू धार बहे अछि अहींक चलब अनुकूले त'
देखू किये नै हम सबटा धारो के अहिंक नाम सौं बहल कैह दी'

मेघो बरसय अछि अहींक केशक करि घटा सौं पूछीये -पूछीये
कहू किएक हम नै अहाँक केशो क' घन करिया बादल कैह दी'

(सरल वर्णिक बहर, वर्ण --२५)

 रूबी झा 

गजल

मीठगर बोली हम जनय छी
तैयो तीतगर बात करय छी

जौं साहित्य समाजक दर्पण
पाँती मे दर्पण देखबय छी

मिथिला के गुणगान बहुत भेल
जे आजुक हालात, कहय छी

भजन बहुत मिथिला मे लिखल
अछि पाथर, भगवान देखय छी

रोटी पहिने या सुन्दरता
सभहक सोझाँ प्रश्न रखय छी

भूख, अशिक्षा, बेकारी सँग
साल साल हम बाढ़ि भोगय छी

सुमन लिखत श्रृंगारक कविता
पहिने हालत केँ बदलय छी

मंगलवार, 8 मई 2012

................माँ धरती के पुकार............


हम धरती मिथिलांचल के, एखनो तक गुलाम छि!
अंग्रेज के कैद सs छुटलोउ, अपनों कैद में पड़ल छि!
अंग्रेज सs लड़िकs हमर पुत्र आज़ाद करौलक
अपन जे छल वैह लूटि लूटी कs खाया
रिश्वत आ भ्रस्टाचार के ज़ंजीर में आयो ज़करल छि !
दो सो साल तक अंग्रेज के झूठा खेलोऊ
हमर पुत्र जवान दुसमन के कैद सs छुरौलक
आई के नेता की जाने, हम कोण आइग में जलाल छि !
जवान पुत्र के कुर्बानी के हम एखन तक नय छि बिसरल.
इ कुर्सी के भूखल नेता फेर सs सूली पर चढ़ेलाक
पकिस्तान बना कs जखन हमरा बाटल गेल
हमर दोनों बाह कसाय के हाथ कटी देल गेल
धरा ऊपर खींचि देल डढैर, दुइ भागमें एना हम बँटल छी
आजादी के झूठे अग्वे कुर्सी सरताज भय गेल
शहीद के वंश एक एक रोटी के मोहताज भय गेल
"रधे" हालत के देख आई शहीदों के , हम धरती में गड़ल छि !!

गजल

व्यर्थ कियै दालान बनाबी
घर केँ तोड़ि मकान बनाबी

टाका अछि तऽ आदर भेटत
द्वारो पर दोकान बनाबी

आगाँ पाछाँ लोक घूमत जौं
सज्जन केँ नादान बनाबी

बच्चा सब केँ हास्टल भेजू
कुक्कुर केँ सन्तान बनाबी

जीवन देलक आस लगाऽ जे
मातु पिता निम्झान बनाबी

सबटा सुख हमरे लग आबय
एहेन कियै अरमान बनाबी

हमहुँ जीबी लोकक संग मे
दुनिया सुमन महान बनाबी

सोमवार, 7 मई 2012

गजल
अप्पने देशमें बनल छि हम सभ परदेशी यौ
जन्मशिद्ध अधिकार सं बंचित छि सभ मधेशी यौ

शोषक शाषक कें बोली सं चलैय मधेश में गोली
मरैय मधेशी जेना लगैय माल जाल मवेशी यौ

नारकीय जिन्गी जीवै पर हम सभ छि मजबूर
करेज चुभैय बबुर जौं कियो कहैय विदेशी यौ

यी जन्मभूमि कर्मभूमि हमर स्वर्गभूमि मधेश
मधेश माए केर संतान हम सभ छि स्वदेशी यौ

बन्ह्की परल मधेश माए कल्पी कल्पी कानैय
स्वतंत्र मधेश के संविधान में करू समावेशी यौ
.................वर्ण-१९..............
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट
गजल

कतेक सहत एही मिथिला में मैथिली बेटी अपमान यौ
आबियो ये बहिना बढ़ू यौ भैया करू मिथिलाक उत्थान यौ

गाम में दहार छल आयेल भदबारी क' फसलो भासल
रबी फसल देखि बाबु माथ हाथ द' बैसला खरिहान यौ

माँ मुख बाबु नै ताकैथ एको बेर नजरियों नै मिलाबैथ
माँ के करेज त ऐना फाटे छैन जेना फाटल आसमान यौ

बाबा गेलखिन वर ताको लेल सौंसे मिथिला घूमी क एला
धिया क' सूरत देखि- देखि दाई क' छुटये छएन प्राण यौ

अछि ईंजिंयर क' मांग बीस लाख डाक्टरक शान की कहू
बड़का ऑफिसरक नै पुछू जेना खुजल अछि दोकान यौ

अछि की दोख एही में कन्या क' सासुर जा क' ओ मारल जेती
नैहरो में त' दहेज़ बिनु आई बेटीये तजै छथि प्राण यौ

कहे ओना छथ बेटी क' लक्ष्मी एहन किएक केलो बिधना
जखने बेटी भूमि खसली सबहक मोन किये निम्झान यौ

----------------सरल वार्णिक बहर वर्ण -२२-----------------
[रूबी झा ]

गजल

प्रेमक दीप जरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु
अपन जान चोरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु

कतेक पैघ-पैघ चोट भेंटल तखनो नै अनुमान भेल
विरह तीर गरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु

सपना में त' पिया मिलन के हम स्वप्न सजा के राखए छी
सिनेह घैल भरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु

आँचर सौं बाट बहारब झार पात हटायेब पिपनी सौं
आँगन सौं त' परा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु

इ त' प्रेमक अनुभूति छैक कोना बूझत जे नै प्रेम करै
रूबी आइंख नोरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु
--------------सरल वार्णिक बहर वर्ण -२२ ---------------
(रूबी झा )

गजल

भेट जाय भगवान किंचित्, की भेटत इन्सान यौ 
मुँह सँ जे लोक अप्पन, मोन सँ बेईमान यौ

एक दोसर बात पर, विश्वास कोना, के करत
छोड़ि दियऽ बात आनक, प्रश्न मे सन्तान यौ

बल जाबत छल, कमेलहुँ, धन अरजलहुँ पुत्र लय
आय बनिकय छी उपेक्षित, अपने घर मेहमान यौ

काज आजुक जेहेन हम्मर, भाग्य निर्धारित तेहेन
सूत्र जीवन के बिसरिकय, कोन ठाँ अछि ध्यान यौ

नीति जेहेन, तेहने नीयत, वो नियति छी काल्हि के
जीबू अपनहुँ, लोक जीबय, ई सुमन अरमान यौ

रविवार, 6 मई 2012

हजल

भेल किछु बात एहन जे कना गेल हमरा
हरासंखनी कनियाँ माथ बथा गेल हमरा
ओना त छै अमावश्या सन कारी केश ओकर
मुदा ओहि मे फड़ल चोर पटा गेल हमरा
ओना नाम छै शांती मुदा घर छै माछक हाट
छ' टा बरदक पिलवान बना गेल हमरा
फोटूये देख परान उड़ि गेल छल हमर
से माँथ पर बंदूक राखि उड़ा गेल हमरा
सब दिन कहै यै जे प्यार नै करै छेँ हमरा
जँ भागौँ त' सौँसे देह दाँत गड़ा गेल हमरा
माइ के बजाबे भाइ के बजाबे सब दिन ओ
चाउर दालि आँटाक भाव बता गेल हमरा
भने फूलेसरा कुमारे रहि गेल भाइ सब
"अमित" ओ त' जीते जी श्राद्ध करा गेल हमरा
सरल वार्णिक बहर
वर्ण-17
अमित मिश्र

बाल गजल

पीठ पर छै बैग बौआ चलल इस्कुल,
लाल पियर ड्रेस चमकै भरल इस्कुल
मांथ टोपी घेँट मे छै लंच लटकल
दाइ संगे चलल मोने रमल इस्कुल
खेल सेहो नीक खेलै छोट बौआ
वर्ग छै मैदान खेलक बनल इस्कुल
चित्र पाड़ै मे लगै छै मोन ओकर
मीठ झगड़ो पर त' खूबे हँसल इस्कुल
नै पहाड़ा पढ़ब नै सीखब ककहरा
आब छै कंपुटर सीखा रहल इस्कुल
भेल छुट्टी संग हल्ला घर चलल ओ
नाम जहिया "अमित" अपनो लिखल इस्कुल
फाइलातुन
2122 तीन बेर
बहरे-रमल
अमित मिश्र

गजल

कतय पुरनका  गाम हेरायल
किंचित् हमरो नाम हेरायल

प्रेम-सहज, सद्भाव, समर्पण
सचमुच ई परिणाम हेरायल

बुधियरका सब गेल 
शहर मे
हुनको छन्हि आराम हेरायल

शहर सँ टाका
, गामक खेती
सब छूटल,
अंजाम हेरायल

सुख-दुख मे जे छल सहयोगी
हृदय-भाव, सत्काम हेरायल

मान करय छल छोट, पैघ के
लागय एखन लगाम हेरायल

सुमन सहोदर भाग्य सँ
भेटल
पुनि ताकू अछि राम हेरायल

शनिवार, 5 मई 2012

गजल-मैथिल मिथिला नाज हमर

भेद भाव बिनु सबकय जोड़ू, बाँचत तखन समाज हमर
सबकियो मिलिकय बाजू सगरे, चाही मिथिला राज हमर

राज बहुत पहिने सँ मिथिला, छिना गेल अछि साजिश मे
जाबत ओ सम्मान भेटत नहि, बाँचत कोना लाज हमर

विविध विषय के ज्ञानी मैथिल, दुनिया मे भेटत सगरे 
मुँह बन्द
राखब कहिया तक, के सुनतय आवाज हमर

आजादी के बादो सब दिन, भेल उपेक्षा सरकारी
बहल विकासक गंगा प्रायः, बाँचल खाली काज हमर

सज्जनता श्रृंगार सुमन छी, दिल्ली बुझलक कमजोरी
जागू मिथिलावासी आबो, मैथिल मिथिला नाज हमर