दुनिया जँ नै पुछलक तँ कोनो बात नहि
राखू मोन अहाँ इ तेहनो बात नहि
चिन्है सगर समाज आइ धनीकेकेँ
‘मनु’केँ जँ जाइ बिसरि एहनो बात नहि
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
दुनिया जँ नै पुछलक तँ कोनो बात नहि
राखू मोन अहाँ इ तेहनो बात नहि
चिन्है सगर समाज आइ धनीकेकेँ
‘मनु’केँ जँ जाइ बिसरि एहनो बात नहि
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
जे जन्म देलन्हि ओ कहलन्हि गदहा
जे पोसलन्हि ओ मानलन्हि गदहा
गदहा जँका सगरो जिन्दगी बितेलहुँ
जिनका बियाहलहुँ ओ बुझलन्हि गदहा
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
मुँह पर दरद आबि जेए ओ मरद नै
जे हर बहैत बसि जेए ओ बरद नै
जिम्मेदारी घरक ल गेल विदेशमे
केना ‘मनु’ बुझलक जेए ओ दरद नै
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
जखन सगरो दर्द भेटल
अपन सीलौं ठोर रेतल
द’बल अपने हाथ गरदनि
तखन के ई नोर मेटल
घरक बन्हन छोरि दुनिया
सटल जतए नोट गेटल
भरोसा करु आब कोना
लखन भेषे चोर फेटल
दहेजक ‘मनु’ चारिचक्का
बियाहक पहिनेसँ सेटल
(बहरे मजरिअ, मात्राक्रम 1222-2122)
जगदानन्द झा ‘मनु’
जखन मोन कानल गजल कहलौं
रहल कोंढ़ छानल गजल कहलौं
जमाना सुतल छल जखन नींदसँ
तहन राति जानल गजल कहलौं
लगन भेल तीसम बरख धरि नहि
पड़ोसनसँ गानल गजल कहलौं
जुआ छल लदल कांहपर लोकक
पसीनासँ सानल गजल कहलौं
उमर ‘मनु’ बितल आर की करबै
अपन मोन ठानल गजल कहलौं
(मात्राक्रम सभ पाँतिमे 122-122-1222)
जगदानन्द झा ‘मनु’
नैन्हेटा हाथमे केहन लकीड़ छै
नै माय बाप ई केहन तकदीर छै
धो धो कऽ ऐँठ कप लकीड़ो खीएलै
नै सुनलक कियो ई दुनियाँ बहीर छै
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
सगरो मैथिली साहित्य दहकैत अछि
नव नव विधाक आँच आइ पजरैत अछि
कोटी नमन जिनकर बिछल जारैन अछि
बारल आगि विदेहक 'मनु' लहकैत अछि
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
मिथिलामे जमेएकें भोजन परसैत काल साउस पुछलथिन : "झा जी खीर खेबइ कि हलुआ..??"
जमेए : "किएक घरमे कटोरी एक्के टा छैक की ?''
मैया हमर जगतारनि कल्याणी
सबहक अहाँ सुधि लेलौं महरानी
नै हम मिलब माँ बाटक गरदामे
चिंता किए जेकर माय भवानी
जग ठोकरेलक सदिखन ढेपासन
देलौं शरण निर्बलके हे दानी
दर्शन अपन दिअ हे अम्बे माता
नै सोन झूठक चाही नै चानी
धेलक चरण 'मनु' तोहर हे मैया
नै आब जगमे ककरो हम जानी
(मात्रा क्रम : २२१२-२२२-२२२)
जगदानन्द झा 'मनु'