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मंगलवार, 1 मई 2012

गजल

खून सँ भिजलै धरती  मिथला बनबे करतै 
आब  जोड लगाबे कियो झंडा फहरेबे करतै

सुनु बलिदानी सुनु शैनानी आब दिन दूर नै 
विश्वक नक्सा में मिथिलाक नाम देखेबे करतै

कतबो चलतै बम निकलै चाहे हमर दम 
क्रांति बढल आगु आब जुनि इ रुकबे करतै

बहुत छिनलक सभ नै सहबौ आब ककरो 
गर्म सोनित त आब हिलकोर मारबे करतै
रंजू झा

एक खुनक बूंद सँ सय-सय रंजू जन्म लेतै 
आताताई सँ बदला ओ चूनि-चूनि लेबे करतै

(सरल वर्णिक बहर, वर्ण-१८)
जगदानन्द झा 'मनु'
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संस्कार सन्तान मे


स्वजन मृत्यु पर कानैत बाजैत, गेल छलहुँ शमशान मे
आनल जायब एहिना हमहुँ, आयल अचानक ध्यान मे


बाजी सब कियो राम नाम संग, सभहक गाति एहने होइछै
बाहर आबिते फूसि फटक्कर, केलहुँ शुरू दलान मे


बात सदरिखन की लऽ एलहुँ, की लऽ जायब दुनिया सँ
मुदा सहोदर सँ झगड़ा नित, जुड़ल स्वार्थ सम्मान मे


भाग्य लिखल जे हेबे करतय, काज करय के काज की
बाजू एतबे चिकरि चिकरि कय, खेलू ताश मचान मे


सुमन मनुक्खक जीवन भेटल, घटना छी अनमोल यौ
सफल तखन पल पल जीवन के, संस्कार सन्तान मे

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

गजल

किए एखन दिल हमर शाइर बनल छै
लिखल जेकर नाम ओ एखन कटल छै
बनाबी हम रूप जे शब्दक नगर मे
नगर ओकर नैन के लागै जहल छै
गजल जेहन हम लिखै सबदिन छलौँ से
कहाँ हमरा मोन मे ओहन गजल छै
दिनक काटै रौद रातिक चान धधकै
बहर मारै जान पथ काँटक बनल छै
कखन हारब जीवनक अनमोल पारी
"अमित" जा धरि छी करै शेरक कहल छै
मफाईलुन-फाइलातुन-फाइलातुन
1222-2122-2122
बहरे - सरीम
अमित मिश्र

गजल

करेजक नस मांसके पाथर बना लिअ
गरीबक दुख दर्दके मोहर बना लिअ
मरै छै बेटी जँ कोखे दिन दहारे
पवनपुत्रक धामके कोबर{कोहबर} बना लिअ
सिनेहक बीया असंभव भेल रोपब
मनोजक नद मोनके विषधर बना लिअ
कलह करबै भूख नेता देखियौ ने
जवानक सब बातके सोँगर बना लिअ
अपन हेतै देश संगे प्रात हेतै
कटारक कर "अमित" के भोथर बना लिअ
मफाईलुन-फइलातुन-फइलातुन
1222-2122-2122
बहरे -सरीम
अमित मिश्र

गजल@प्रभात राय भट्ट


साबन में बरसै छै बदरिया गाम आबू ने पिया सिनेहिया
अंग अंग में उठल दरदिया गाम आबू ने पिया सिनेहिया

प्रेम मिलन के आएल महिना बड मोन भावन छै सावन
कुहू कुहू कुह्कैय कोईलिया गाम आबू ने पिया सिनेहिया

नील गगन सीतल पवन लेलक चढ़ल जोवन उफान
इआद अबैय प्रेम पिरितिया गाम आबू ने पिया सिनेहिया

मोन उपवन साजन प्रेम रासक रस सं भरल जोवन
मोन पडैय अहाँक सुरतिया गाम आबू ने पिया सिनेहिया

मोन बौआइए किछु ने फुराइए जागी जागी वितैय रतिया
पिया कटैय छि हम अहुरिया गाम आबू ने पिया सिनेहिया
.................वर्ण:-२३.....................

रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

गजल@प्रभात राय भट्ट


सावन भादव कमला कोशी जवान भSगेलै
कमला कोशी मारैय हिलोर तूफान भSगेलै


कोशी केर कमला सेहो पैंच दैछई पईन
कोशीक बहाब सं मिथिला में डूबान भSगेलै


कोशी के जुवानी उठलै प्रलयंकारी उन्माद
दहिगेलै वलिनाली बर्बाद किसान भSगेलै


गिरलै महल अटारी आओर कोठी भखारी
खेत बारी घर घर घरारी सभ धसान भSगेलै


निरीह अछि मिथिलावासी के सुनत पुकार
खेतक अन्न घरक धन अवसान भSगेलै


कोशिक कहर नहि जानी की गाम की शहर
घुईट घुईट जहर सभ हैरान भSगेलै


खेत में झुलैत हरियर धान बारीमे पान
दाहर में डुबिक नगरी समसान भSगेलै


भूखल देह सुखल "प्रभात" मचान भSगेलै
कोशिक प्रकोप सं मिथिला परेशान भSगेलै
...........वर्ण-१७..............
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

गजल

हुनक नाम लिखि-लिखि मेटेनाई बिसैर गेलहुँ
हुनका याइद क' क' बिसरनाई बिसैर गेलहुँ

बहुत रास गप त' अछि करेजे गरल हमरा
जखन भेलैन ओ सोझा सूनेनाई बिसैर गेलहुँ

हुनका बाद त' एक छण कटै अछि असमंजस
स्वप्न में रातिओ हुनका बतेनाई बिसैर गेलहुँ

साँझ में प्रतिदिन सोचेई छि बिसरायेब हुनका
मुदा भेल भिनसर बिसरनाई बिसैर गेलहुँ

आएँख में ओना त' अखनो सागर छूपेने छि हम
हुनका लग एको बुन खसेनाई बिसैर गेलहुँ

(सरल वार्णिक बहर,वर्ण -१९)

रूबी झा 

गजल


तकियो कनी कानैए उघारल लोक
गाडब कते, दुख मे बड्ड गाडल लोक

धरले रहत सब हथियार शस्त्रागार
बनलै मिसाइल भूखे झमारल लोक

छै भरल चिनगीये टा करेजा जरल
अहुँ केँ उखाडत सबठाँ, उखाडल लोक

लोकक बले राजभवन, इ गेलौं बिसरि
खाली करू आबैए खिहारल लोक

माँगी अहाँ "ओम"क वोट मुस्की मारि
पटिया सकत नै एतय बिसारल लोक
बहरे-सलीम
दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व, दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व
मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु (पाँति मे एक बेर)

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

गजल


कनिया निक लगैय श्रृंगार कने सैज धैजके चलु
गला शोभैय हिरा हार कने चमैक चमैकके चलु

शोरह वसंतक जोवन लगैय हिमगिरी पहार
गोरी भगेल अहाँ से पियार कने सैट सैटके चलु

अहाँक रूपरंगक छाया में भSगेलैय लोक बीमार
चढ़ल छै कतेको कें बोखार कने हैट हैटके चलु

सोनपरी के देख दुनिया फेकी रहल छै मायाजाल
गोरी बड जालिम छै संसार कने बैच बैचके चलु

इन्द्रपरी गगन सं उतरी चलैय प्रभातक संग
देखैला लोक लागल बजार कने हैंस हैंसके चलू
............वर्ण-२०..................
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

गजल

 कहियौ छोड़ब नै  अहाँक पछोर यौ अहाँ जायब कतऽ
राखब संगे अहाँ के साँझ सँ भोर यौ अहाँ जायब कतऽ

चिन्हलौ नहि जानलौ अहाँ किएक एखन धरि हमरा
प्रेम बरखा सँ करब सराबोर यौ अहाँ जायब कत़ऽ

अहाँ लेल तियागल लाजो तियागल धाखो अहीँक लेल
प्रेम सरिता बहाएल पोरे पोर यौ अहाँ जायब कतऽ

छोरलहुँ हम नैहर सासुरो छोरलहुँ अहिँक लेल
मायक ममताक छोड़लहुँ कोर यौ अहाँ जाएब कतऽ

अहाँ बाजु एकबेर  किरीया खाउ हम ककरा लगा के
मात्र अहीँटा छी "रूबी"के चितचोर यौ अहाँ जाएब कतऽ

         (सरळ वार्िणक़ बहर ) बर्ण-२१

रुबी झा

गजल

 प्रियवर सँ आखिक नोर नुकौलो ने भेल हमरा
किछ कहलो ने गेल किछु बतौलो ने भेल हमरा

मुखक आभा देखि ओ बुझि गेला अपने सभकिछु
गाल परहक नोर धार मेटौलो ने भेल हमरा

जाइक बेर मनमीत सँ तऽ किछु कहलो ने भेल
आँचर तर अपन मुख नुकौलो ने भेल हमरा

हुनका यदि रोकितहुँ अटकि जैतथि ओ जरूर
बताहि भेल हम छी हाथ बढौलो ने भेल हमरा

प्रेमक डोरी सँ बान्हि आँचर नुका हम रखितहुँ
जौ छाती सटा के रोकितहुँ सटौलो ने भेल हमरा.
-------------------वर्ण-१९----------------
रुबी झा

बाल -गजल


कंटीरबा आ कंटीरबी माँ बापक लेल दुनू आँखिक पुतली
एकटा अछि हीरा त' दोसर मोती भेल दुनू आँखिक पुतली

बौआ खेलय गेल गेंद कब्बडी बुच्ची खेलय कनिआ-पुतरा
डाँर में घुघरू पैर पाजेब बाजि गेल दुनू आँखिक पुतली

ठुमैक चलै अछि बौआ ललन छ्मैक चलै बुच्ची लालपरी
जुडबै छाती माँ के बापक ओ शान भेल दुनू आँखिक पुतली

बौआ खेलक खोआ मिश्री बुच्ची खेलक करकर कचरी माछ
फरिछ बाजै बुच्ची बौआ त' तोतला गेल दुनू आँखिक पुतली

रूबी लेल दुनू गौरब छै बौआ राजाबाबू बुच्ची छै लालपरी
बनि जए ओ कोनो हाकिम माँ बाप लेल दुनू आँखिक पुतली

वर्ण-२३
रुबी झा

गजल

पुछितहुँ त अहाँ एक बेर जिबै छी कोना हम
अनुराग सँ भरल पत्र पठबै छी कोना हम

अहाँ पिबैत होयब जीवन केर मधुर प्याला
देखू तीत नीम सन जिनगी पिबै छी कोना हम

नाम अछि छपल अहाँक धरा सँ गगन धरि
करेज पर अंकित नाम मेटबै छी कोना हम

देखने होएब बहुतो मोर पपिहा क' निहोरा
अछि भावना किछु थोर नै बजबै छी कोना हम

नित बढल जाए अछि विरह अग्नि केर ज्वाला
हेबै सोझा त' करेज फारि देखबै छी कोना हम

दहारे दहायल "रुबी" क पहाड सन जीबन
सावन के मेघ जकाँ नोर बहबै छी कोना हम
----------- ------वर्ण १८-----------------
( रुबी झा )

गजल

 ईहे हमर प्रेमक सजा राखने छी त' कोनो बात नै
आई हमरा ज्यो ई व्यथा अहाँ देने छी त कोनो बात नै

ईहो कम छैक अहाँ देखैत छी ओत कात सँ अखनो
जँ आई हमरा मजधारे डूबेने छी त कोनो बात नै

छलौ हम राखने करेजाक अंतिम तह में नुका क
अहाँ ओ अन्तःपूर अपने छोरने छी त कोनो बात नै

अहीं निर्मल शीशा एहन हमर आत्मा बनोने छलौं
ओ शीशा जँ अहाँ अपने सँ तोरने छी त कोनो बात नै

छैक ककर मजाल कहत रुबी क' अपन दीवानी
मुदा जँ ई गप अहाँ कतौ बजने छी त कोनो बात नै

वर्ण- २०
रुबी झा

उपकार


रग्घू कनियाँ पीलियासँ ग्रस्त अंतिम अवस्थामे दिल्लीक लोकनायक जयप्रकाश अस्पतालमे आइ  दस दिनसँ भर्ती भेल जीवन आ मृत्युक बिच संघर्ष कए रहल छलथि  | पीलियाक अधिकता आ कोनो आन कारणे आँखिमे से इन्फेक्सन भए गेलनि लोकनायक जयप्रकाश अस्पतालक डाक्टर रग्घूसँ कहलकनि जे कनियाँक आँखि लोकनायक जयप्रकाश अस्पतालक बगलेमे आँखिक अस्पताल गुरुनानक आई हॉस्पिटल छैक ओहिठामसँ जाँच करा कए आनै लेल |
रग्घू  डाक्टरक बात मानि एहि काजमे लागि गेला | लोकनायक आ गुरुनानक दुनू सरकारी अस्पताल छैक तैं खर्चाक बात नहि मुदा  रग्घूकेँ  बोनि मजुरी रहैन रोज कमाऊ आ रोज खाऊ आ आइ दस दिनसँ अपन बोनि छोरि कनियाँ संगे एहि ठाम अस्पतालमे छथि | दस दिनसँ नव काज नै | जमा पूंजी खत्म | एखन तत्काल लोकनायकसँ गुरुनानक अस्पताल तक जाइमे पन्द्रह रुपैया जइती आ पन्द्रह रुपैया आबितीतिस रुपैया चाही  | हुनका लग छलनि कुल दस रुपैया | ओहि दस रुपैयामे अपन किछु  नास्ता भोजन सेहो, कनियाँकेँ  तँ  अस्पतालेमे भेट जाइ छलनि | ओइ ठामसँ काज करै लेल कतौ जेबों करता ताकी पाइ  होइन तँ  कम सँ कम दस रुपैया बस भारा चाहीएन |
  सभ समस्याकेँ जनैत रग्घूक कनियाँ रग्घूसँ कहलनि,  " फोन कए  ' अपन भैयासँ दू सय रुपैया माँगि लिअ, काइल्ह-परसु काज कएला बाद पाइ होएत तँ  दए  देबैन |"
रग्घू अपन कनियाँकेँ कन्हापर उठा लोकनायकसँ गुरुनानक अस्पतालकेँ लेल बिदा भए गेला आ चलैत-चलैत बजला, "अहाँ जुनि चिंता करु, रिक्सासँ नीक सबारी हमर पिठक होएत आ रहल ई  मुसीबत तँ  ई तँ चारि दिन बाद खत्म भए  जाएत मुदा केकरो उपकार सधबैमे पूरा जीवनों कम परत |"   

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जगदानन्द झा 'मनु'