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मंगलवार, 10 अप्रैल 2012


संबाद@:-प्रभात राय भट्ट

                   संबाद !!

काका:- सुन रे बौआ  देशक हाल बड बेहाल छै 
             जनता के लुईट लुईट चोर नेता सभ नेहाल छै 


भतीजा:- सुन हो काका गामक छौरा सभ भSगेलैय चोर डाका 
               लुईट लुईट आनक धन ताडिखाना में उड़बैय छै टाका


काका:- कह रे बौआ पैढ़लिख तोहूँ आब करबे की ?
            भेटतहूँ  नहि कतहु नोकरी चाकरी कह तोहूँ आब करबे की ?


भतीजा:- पैढ़लिख हम नेता बनब काका करब देशक सेवा 
               भूख गरीबी दूर भगा करब हम जनसेवा 


काका:- देश डुबल छै कर्जा में बौआ नेता सभक खर्चा में 
            भ्रष्टाचारी नेता सभक नाम छपल छै अख़बार पर्चा में 


भतीजा:- भ्रष्टाचारी  नेता सभ कें मुह कारिख पोती गदहा चढ़ाऊ
               राजनीती में कुशल सक्षम युवा सभ के आगू बढ़ाऊ


काका:- जे जोगी एलई काने छेदेने नै छै ककरो ईमान रौ
            कायर गद्दार नेता सभ बेच  देलकैय स्वाभिमान रौ 


भतीजा:- क्रांतिकारी युगांतकारी युवा नेता में दियौ मतदान यौ
               सुख समृद्धवान  देश बनत ,बनत सभ कें अपन पहिचान यौ 
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट 

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

गजल

मोन कियै सिंहासन पर
घर मे आफत राशन पर

काज करय मे दाँती लागय
तामस झाड़ी बासन पर

लाज करू जे पाहुन जेकाँ
खाय छी कोना आसन पर

खोज-खबर नहि धिया-पुता के
बात सुनाबी शासन पर

बिना कमेने किछु नहि भेटत
जीयब खाली भाषण पर

कहू सोचिकय कहिया सुधरब
जखन उमरि निर्वासन पर

सुमन समय पर काज करू
आ सोचू निज अनुशासन पर

विहनि कथा-नव अंशु

विहनि कथा-नव अंशु
प्रभात बाबू माँजल संगीतकार-गायक आ शिवाजीनगर काँलेजक संगीत विभागक प्रधान प्रोफेसर छलखिन ।एक बेर पटना सँ प्रोग्राम क' ट्रेन सँ गाम आबैत छलाह ।भरि रातिक झमारल तेँए आँखि बंद केने सुतबाक अथक कोशिश केलनि मुदा हो-हल्ला सँ नीन कोसोँ दूर भागि गेल ।तखने एकटा नारी कंठ कोलाहल के चिरैत हुनक कान के स्पर्श केलकै ,आरोह-अवरोह के फूल सँ सजल सप्त-सुरी माला मे गजबे आकर्षण छलै । प्रभात बाबू आँखि खोलि चारू कात हियासलाह मुदा केउ देखाइ नै देलकै ,मुदा आभास भेलै जे ओ कोकिल-कंठ लग आबि रहल छै ।कने कालक बाद लागलेन जे ओ बगल मे आबि गेल छै ,आंखि खोललनि त' नीच्चा 10-12 वर्षक बच्ची झारू लेने फर्श साफ करैत आ लोक सब के एक टकिया दैत देखलनि ।प्रभात बाबू ओकरा लग बजा नाम-पता पुछलनि ,हुनका बूझहा गेलै जे ओहि अनाथ मे शारदा बसल छथिन ।ओकरा अपना संग चलबाक लेल आ नीक स्कुल मे नाम लिखा देबाक बात कहलनि , ओ तैयार भ' गेल ।अपना लग बैसा प्रभात बाबू गीत सुनैत रहलखिन ,ओकर हर-एक स्वर संग दुनूक दिल सँ निकलैत नव किरण आँखिक बाटे निकलि सगरो संसार के प्रकाशित क' रहल छल ।आशक नव अंशु पिछला जीवनक अन्हार के इजोर क' देने छल ।
अमित मिश्र

अपन महिष कुरहैरिये नाथब हम्मर अपने ताल

धरती के आकास कहब , आ अकास के पाताल
अपन महिष कुरहैरिये नाथब हम्मर अपने ताल
धरती .......................................................
चिबा चिबा क बात बजई छी, मिथिला हम्मर गाम
टांग घिचय में माहिर छी, बस हम्मर अतबे काम
तोरब दिल के सदिखन सबहक, पुइछी पुइछी क हाल
अपन महिष ......................................
आदि काल स लोक कहई ये , छी हम बड़ विद्वान
झूठक खेती खूब कराइ छी, झूठे के अभिमान 
दोसर के बुरबक बुझई छी, क के हाल बेहाल
अपन महिष .......................................
इक्कर गलती ओक्कर गलती, गलती टा हम तकाई 
एकरा उलहन ओकरा उलहन, जत्तेक हम सकई छी
भेटत फेर "आनंद" कोना क बनब अगर कंगाल
अपन महिष ....................................................

गजल


मन होइए हम मरि जाइ
बस पाञ्च काठी परि जाइ

छै झूठ में सदिखन रमल
दुनिआ तs ओ सब गडि जाइ

नै घुस बिना जतए काज
ओ सगर सासन जरि जाइ

एको सडल पोखरि में जँ
सब माछ ओकर सडि जाइ

कुल जाहि में एको भक्त
ओ सगर कुल मनु तरि जाइ

(बहरे-मुन्सरक, SSIS+SSSI)
***जगदानन्द झा 'मनु'

गजल

प्रस्तुत अच्छी रूबी झाजिक गजल, हुनक अनुरोध पर --

सिहकल जखन पुरबा बसात अहाँ अयलहु किये नहि
मोन उपवन गमकल सूवास अहाँ अयलहु किये नहि

चिहुकि उठि जगलहु आध-पहर राति सपन हेरायल
आँखि खुजितहि टुटिगेल भरोस अहाँ अयलहु किये नहि

चेतना हमर प्रियतम फेर किएक देलहु अहाँ बौराय
बेकल उताहुल भेलहु हताश अहाँ अयलहु किये नहि

नम्र-निवेदन हम करइत छी अहाँ सँ प्रियतम हमर
गेलहु कतय नुकाय जगा आस अहाँ अयलहु किये नहि

भेल आतुर मोन रूबी केर निरखि-निरखि सुरत अहाँके
फागुन-चैत बित गेल मधुमास अहाँ अयलहु किये नहि

रुबी झा

रविवार, 8 अप्रैल 2012

नाटक:"जागु"
दृश्य:पाँचम
समय:दुपहरिया
(लाल काकी आँगन में धान फटकैत )

(विष्णुदेवक प्रवेश )

विष्णुदेव: गोड़ लागे छी  लाल काकी !

लाल काकी: के..? विष्णुदेव ! आऊ, खूब निकें रहू ।

विष्णुदेव: लाल काकी ! बुझि परैया--एहि बेर धान खूब उपजलाए ?

लाल काकी : हाँ , सब भगवतिक कृपा ! जँ एहि तरहे अन्न-पानि उपजाए , त' मिथिलावाशी कें अपन गाम-घर छोइड़ भदेस नै जाए पड़तैं ।

(प्लेट में एक गिलास आ एक कप चाय  ल' गीताक प्रवेश , गीता दुनु गोटे के चाय द' दुनु गोटे के पाएर छू प्रणाम करैत )

विष्णुदेव: खूब निकें रहू ! पढू-लिखू  यसस्वी बनूँ ! अपन गीता नाम के चरितार्थ करू ।

गीता: से कोना होएत कका ?

विष्णुदेव:...किएक ? अहाँ  स्कूल नै जाइत छी की ?

गीता:...नै !
 लाल काकी: (बीचे में )...आब स्कूल जा' क' की करतै ! बेटी के बेसी पढ़ेनाहि ठीक नै , चिट्ठी-पुर्जी लिखनाई-पढ़नाई आबि गेलहि , बड्ड भेलहि ..

विष्णुदेव:...काकी !! पढाई त' सब लेल अनिवार्य थिक, चाहे ओ बेटी होइथ वा बेटा । आओर , खास क' बेटी कें त' बेसी  पढबाक चाही , कारण, बेटीए त' माए बनैया । माए परिवारक ध्रुव केंद्र होइत छथि । हुनक संस्कार आ शिक्षाक प्रभाव सीधा -सीधा धिया-पुता आ समाज पर परैत अछि ।

लाल काकी:..सें त' बुझलौं ! मुदा, बेसी पढि-लिख लेला सँ विआहक समस्या उत्पन्न भ' जाइत  अछि ! बेसी पढ़त त' बेसी पढ़ल जमाए चाही । बेसी पढ़ल जमाए ताकू त' बेसी दहेज़ --कहाँ  सँ पा'र लागत ?...एक त' पढ़ाइक खर्च , ऊपर सँ दहेजक बोझ , बेटी वाला त' धइस जाइत अछि ।

गीता :....कका ! की बेटी एतेक अभागिन होइत अछि ? ... जकर जन्म लइते माए- बाप दिन-राइत चिंतित रहे लगैत छथि ! बेटीक जन्मइते माए-बाप  "वर" ताकअ लगैत छथि ! आओर ओकर हिस्साक कॉपी-किताबक टका विआह हेतु जमा होबअ लगैत अछि !....कका ! की मात्र दहेजक डर सँ बेटी कें अपन अधिकार सँ वंचित काएल जाइत अछि वा पुरुष प्रधान समाज कें ई डर होइत छन्हि ----जँ नारी बेसी ज्ञानी भ' जेती त' हुनका सँ आगू नै भ' जाए ......???

विष्णुदेव:..नै बेटी , नै ! बेटी अभागिन नै सौभागिन होइत छथि ! बेटी त' दुर्गा , सरस्वती आ लक्ष्मी रूप छथि ! नारी त' पत्नी रूप में दुर्गा अर्थात "शक्तिदात्री ", माए रूप में सरस्वती  अर्थात "ज्ञानदात्री" आ बेटी रूप में लक्ष्मी अर्थात सुखदात्री छथि । हमर शास्त्र में त' नारी कें उच्च स्थान देल गेल अछि , जेना ----
     "यत्र नारी पूज्यन्ते , तत्र लक्ष्मी रमन्ते "
    " या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण सवंस्थिता ।
नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै  नमो: नम: ।।"---आदि -आदि ...
 ई जें समाज में उहा-पोह आ दहेजक प्रकोप देख रहल छी , एकर एकटा मात्र कारण  थिक --'मिथ्या प्रदर्शन ' ! एक-दोसर कें नीच देखेबाक होड़ आओर बेसी-स-बेसी दोसरक सम्पति हड़पबाक लोभ ।

गीता: कका ! त' की हम पढि-लिख नै सकैत छी ? की डॉक्टर बनि समाजक सेवा करबाक हमर सपना पूर्ण नै भ' सकैत अछि ? की हमर आकांक्षा के दहेजक बलि चढअ परतै ?

विष्णुदेव: (गीता सँ )...बेटी , अहाँ जुनि निराश हौ ! अहाँ पढ़ब आ जरुर पढ़ब ! हम सब मिल अहाँ कें जरुर डॉक्टर बनाएब । होनहार पूत केकरो एक कें नै बल्कि समाजक पूत होइत अछि । (लाल काकी सँ )... लाल काकी , ई त' कोनो जरुरी नै जे जँ बेटी डॉक्टर छथि त' "वर" डॉक्टर आ इंजिनियर हौक ! जँ बेटी स्वंम  आत्मनिर्भर छथि त' कोनो नीक संस्कारी आ पढ़ल-लिखल लड़का सँ विआह करबा सकैत छी । अपन सबहक नजरिया के बदले परत, तहने ई समाज आगू बढ़ी सकैत अछि । ... काहिल सँ गीता कें स्कूल जाए दिऔ । पढि-लिख क' अहाँक संग सम्पूर्ण समाज कें नाम रौशन करत । अच्छा आब हम चलैत छी ।(प्रस्थान)
   दृश्य:तेसरक समाप्ति              


गजल@प्रभात राय भट्ट



गजल:-

गजलक शब्द शब्द अछि हिरामोती जेना लगैय ज्योति
जीवनक विछोड मिलन में गजल जेना लगैय मोती

सोचक सागर में डूबी निकालैय कियो हिरामोती
अप्रतिम सुन्दर शब्दक संयोजन जेना लगैय मोती

सुन्दर नारी पर शब्दक गहना भSजाएत अछि भारी
गीत गजल सुन्दर शब्दक रचना जेना लगैय मोती

श्रृंगार रासक शब्द सं अछि नारी केर श्रृंगार सजल
अनुपम शब्दक अनमोल गजल जेना लगैय मोती

निशब्द भावक शब्द बनी ठोर पर घुन्घुनाए गजल
गजलकारक शब्द रचल गजल जेना लगैय मोती

..........वर्ण-२१....................
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

अकक्ष भेल छी। (एकटा हास्य कथा)


अकक्ष भेल छी।
      (एकटा हास्य कथा)

आई दस वर्षक बाद किछु काज स दरभंगा आएल रही। भींसरे भींसरे टेन स दरभंगा स्टेशन उतरले रही कि ने की फुराएल टहलैत टहलैत विश्वविद्यालय कैंपस आबि गेलहुँ। ओतए आबिते मातर सभटा पुरना संस्मरण कॉलेजक पढ़ाई विद्यार्थी जीवनक सभटा हँसी ठीठोला श्यामा माए मंदिर के चक्कर लगाएब जस के तस मोन परि गेल। ओई दिन सोमवार रहै तहू मे सावन महीनाक सोमवारी भक्त लोकनिक भिड़ भिंसरे स बढ़ि गेल रहै की कॉलेज के विद्यार्थी धीया-पूता जवान बुढ़ पुरान सभ पूजा करै लेल अपसियाँत भेल। विशेष कऽ माधवेश्वरनाथ महादेव मंदिर मे और बेसी भीड़। श्यामा माए मंदिर लग पोखरि अछि ओतए माधवेश्वर महादेवक मंदिर सेहो छैक। ओही ठाम श्यामा माए के दर्शन कए बाबाक पूजा लेल महादेव मंदिर अएलहुँ। बाबा के जल बेलपात चढ़ा पूजा केलाक बाद मंदिर स बाहर निकैल बैग पीठ पर लए बिदा भेल रही। कैमरा गारा मे लटकले रहए बिदा होइते रही की पोखरी घाट लक बाबा भेंट भए गेलाह। ओ बजलाह हौ बच्चा के छियह कारीगर एम्हर आब। बाबाक लग मे जा हुनका प्रणाम केलियैन त ओ बजलाह नीके रहअ। अईं हौ कारीगर इ कहअ दारही कटा लेबह से नहि अहि दुआरे त चिन्हैअ में धोखा भए गेल। गारा मे कैमरा लटकल देखलिय त मोन परल जे कहीं तू दरभंगा आएल हेबह। आब ज तूं दरभंगा आबिए गेल छह त हमर पंचैती कए दैए हौ बच्चा कि कहियअ हम त अकऽक्ष भेल छी।
           बाबाक गप सुनी हमरा हँसी स रहल नही गेल। हँसैत हँसैत हम बजलहुँ अइ यौ बाबा अहाँ किएक अकऽक्ष भेल छी आ कथिक पंचैयती। बाबा तामसे अघोर भेल बजलाह अईं हौ कारीगर हम अकऽक्ष भेल छी आ तू दाँत चिआरै मे लागल छह। हम बजलहु यौ बाबा अहाँ जुनि खिसियाउ एकटा गप कहू त अहू सन औधरदानी महादेव ज अकऽक्ष भेल अछि त हमरा सभहक केहेन हाल हेतै। बाबा अपने त सौंसे दुनियाक पंचैयती करैत छी हम एकटा छोट छीन भक्त अहाँक पंचैती कोना करब। बाबा फेर बजलाह हौ बच्चा अप्पन सप्पत कहैत छियैह सत्ते मे हम बड्ड अकऽक्ष भेल छी। हम बजलहुँ यौ बाबा अकऽक्ष त हम मीडियावला सभ भेल छी ख़बर लिखैत आ संपादित करैत, एक चैनल के नोकरी छोरि दोसर चैनल के नाकरी पकड़ैत, मीर्च मसल्ला वला ख़बर बनबैत सुनबैत, चैनल मालिक के दवाब  रूआब सहैत, बौक जेंका चुपचाप अकऽक्ष भेल छी।
    हमर गप सुनि बाबा बजलाह आब हमरो गप सुनबहक की अपने टा कहबहक। हम बजलहुँ नहि यौ बाबा इहेए बात त पुछै लेए छलहुँ जे अहाँ किएक अकऽक्ष भेल छी। बाबा डमरू डूगडूगबैत बजलाह हइए लेए सुनह सबटा राम कहानी जे हम किएक अकऽक्ष भेल छी। हौ बच्चा पहिने एकटा फोटो खीच दैए ने भने चैनलो पर ब्रेकिंग न्यूज़ चला दिहक जे बाबा अकक्ष भेल छथि। लोको त बुझतै ने जे हम केहेन कष्टमय जिनगी जीबि रहल छी। हम बजलहुँ ठीक छैक बाबा अहाँ बजैत जाउ आ हम रेकड केने जाइत छी आ फोटोओ खीच दैत छी मुदा इ कहू जे आई अहाँक त्रिशूल कतए रहि गेल। बाबा अंगोछा स मुँह पुछैत बजलाह हौ कारीगर की कहियअ हौ हम जिबैत जिनगी  अकक्ष भेल छी। गणेश कार्तिक दुनू टा खूरलुच्ची हरदम लड़ाई करैत रहैए एकटा कहैत छै जे हम त्रिशूल ल के नाचब त दोसर कहैत छै जे हम डमरू बजा के नाचब। अहि कहा कही मे इ दुनू टा मुक्कम-मुक्की घिच्चा-तिरी क हमर डमरू सेहो फोरि दैत अछि। एकरा दुनू टा दुआरे हम अकक्ष छी। हौ बच्चा ततबेक नही कि कहियअ हौ नहा धोहआ के बघम्बर पसारि दैत छियैक मुदा कार्तिक के मयूर ओकरा ओई गाछ पर स ओई गाछ पर ल जा के लेरहा घोरहा दैत अछि। तै पर स गणेशक मूस ओकरा कूतैर फूतैर दैत अछि। तूही कहअ त बिना बघम्बर के कोना हम रहब कियो देखनिहार नै कोइ ने टहल टिकोरा क दैत अछि हम त तहु दुआरे अकक्ष भेल छी।
          तूहीं कहअ ने आबक धीया-पूता के लिखा पढ़ा के कि हेतै। हम बजलहुँ आब की भेल यौ बाबा। हमर गप सुनी ओ बजलाह हौ बच्चा तूं बरि खाने बुझहैत छहक कहलियअ त जे हम अपने घरक लोक स अकक्ष भेल छी। हौ बच्चा तोरा सभटा गप की कहियअ जहिया स गणेश के शिक्षामित्र के नोकरी भेटलै आ कार्तिक के पुल बनबै के सरकारी ठिकेदारी भेटलै दुनू गोटे एक्को बेर घूइरो के ने देखैत अछि जे हम जीबैत छी आ की मूइल। तही दुआरे तूंही कहअ ने एहेन धीया-पूता  कोन काजक जे बूढ़ माए बाप के बुरहारी मे मरै लेल  गाम मे असगर छोड़ि दैत अछि आ अपने नोकरी मे मगन भेल सभटा आचार-विचार बिसरैत  सामाजिक कर्तव्य सँ मुह मोड़ि लैत अछि।
      ई गप कहैत-कहैत बाबाक आखि नोरा गेलैन ओ आंखिक नोर पोछि हिंचकैत बजलाह हौ बच्चा आब बुरहारी मे गौरीए दाए टा एकमात्र सहारा। मुदा आब हुनको अवस्था भेलैन ओकरो की दोष। कहैत छियैए जे भांग पीस दियअ त गौरी दाए बजैत छथि आब हमरा भांग पीसल नहि होएत बेसी छौंक लागल अछि त चलि जाउ विश्वविद्यालय कैंपस, शंकरानंद ओइ ठाम भरि छाक भांगक लस्सी पीबि लेब। ओइ ठाम सीएम सांइस आ मारवाड़ी कॉलेज के विद्यार्थी सभ भांग खाई लेल सेहो अबैत छैक। हौ बच्चा हम त तहू दुआरे अकक्ष भेल छी। आब हम एक्को मीनट दरभंगा मे नहि रहब तूं हमरा नेने चलह अपने संगे दिल्ली। हम तोरे साउथ एक्स वला डेरा पर रहब ज जारो बोखार लागत त ओही ठाम एम्स मेडिकल लग्गे मे छै ओतए देखाइओ दिहअ। हम बजलहुँ हं हं बाबा चलू ने इ त हमर सौभाग्य जे अहाँक टहल टिकोरा करबाक हमरा अबसर भेटत।
बाबा बजलाह हौ बच्चा एकटा गप तोरा कहनाइ त बिसैरे गेलियै रूकह कनि, हइए मोन परि गेल। कारीगर सभटा गप तू की सुनबहअ हौ हम की कहियअ ई भागेसर पंडा दुआरे सेहो हम अकक्ष भेल छी। हम हुनका स पुछलियैन से किएक यौ बाबा। त ओ बजलाह हौ कि कहियअ आब महादेव मंदिर मे बोर्ड लगा देलकैयै। हम जिज्ञासावस पुछलहु कथिक बोर्ड यौ बाबा। ओ फेर बजलाह हौ बच्चा श्यामा माए मंदिर में एकटा बोर्ड लागल छैक मुंडन-51रू, यज्ञोपवित-151रू, विबाह-251रू, आ बलिप्रदान-501रू तही के देखा देखी भागेसरो हमरा मंदिर मे एकटा बोर्ड लगा देलकैए जे बाबाक स्पेशल पूजा-501रू, डमरू बजा के पूजा करब-201, दूध चढ़ाएब-151 आ भांगक स्पेशल परसादी-101रू। देखैत छहक जहिया स ई बोर्ड लगलैह तहिया स त हम और बेसी अकक्ष भेल छी।
         हम बजलहुँ से किएक यौ बाबा त ओ बजलाह कि कहियअ विद्यार्थी सभ भांगक परसादी दुआरे मंदिरे मे मुक्कम मुक्की, घिच्चम-तिरी, देह हाथ तोरा-फोरी कए लैत अछि। ततबेक नहि पिछुलका सोमवारी दिन त कि कहियअ एकरा सबहक झग्गरदन मे हमर त्रिशूल टुटि गेल हम त आब तहु दुआरे अकक्ष भेल छी। ओ सभ नीक नहाति पढ़तह नहि आ परीक्षा मे फेल भेला पर वा कम नम्बर अएला पर हमरो गरिअबैत अछि। जे हे जरलाहा महादेव केहने बेईमान छह पास करा दैतह से नहि हौ बच्चा हम त आब तहू दुआरे अकक्ष भेल छी।

लेखक:- किशन कारीगर

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

  गीत@प्रभात राय भट्टलग आऊ लग आऊ सजनी कने चूल्हा पजारैछि
चूल्हा में आंच लगा कS सजनी अधन खौलाबैछि
भूख अछ बड जोर लागल एखन धैर नहि भात पाकल
भूक सँ मोन छटपट करैय होइए नै कम्हरो ताकल

एना नै चूल्हा पजरत बलम धुँआधुकुर किया केनेछी
उकुस मुकुस हमर मौन करैय एना किया सतौनेछी
पजरैय नै चूल्हा अहाँ सँ , अहाँ कोना पकाएब भात यौ
झट सँ चमच नीकाली पिया दहिए चुरा पर फेरु हात यौ

दही जमा कS मटकुरी में मलाई कतS नुकौनेछी
सुखल चुरा खुआ खुआ कS हमरा बड तरसौनेछी
चुरा दहिक संग हम खाएब दरभंगिया पुआ पकवान यए
छैयल छबीला हम छि गोरी जनकपुरिया नव जवान यए

दही जमौने मटकुरी में बलम हम अहिं लेल रखनेछी
खाऊ पिया मोन भईर के आई मुह किया लटकौनेछी
खुआ मलाई खूब खाऊ चाटी चाटी चिनिक चासनी यौ
दही चुरा पर पकवान ऊपर सं चाटु पिआर के चटनी यौ

रचनाकार:- गीत@प्रभात राय भट्ट

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

नाटक: "जागु"
दृश्य: चारिम
समय: दिन

(खेत में नारायण खेत तमैत)
(अकबर कें प्रवेश)

अकबर: प्रणाम, नारायण भाई!

नारायण: खूब निकें रहू !

अकबर: बुझि परैया खेतक खूब सेवा करैत छी !

नारायण: की सेवा करबै ?  माएक दूधक कर्ज कियो चुका सकैत अछि ? तहन  जतेक पार लगैया करैत छी !

अकबर: ...ठीक कहलौं ! माए आ खेत में कनेकों भेद नै । लोक माएक दूध पीब आ खेतक अन्न खाए पैघ होइत अछि , मुदा, देखबा में अबैत अछि जेँ मनुष्य पैघ भेला' बाद  माए आ खेत दुनु  कें बिसैर  भदेस  में जा ' बैस जाइत अछि  ।

नारायण: हम की कही ? ...कहबा लेल हमरा माए कें पांचटा  बेटा , मुदा, केकरो सँ कोनो सुख नै ! चारिटा भदेस रहैत अछि आ हम एकटा गाम पर रहैत छी , जतेक पार लगैत अछि सेवा करबाक प्रयत्न करैत छी ! ओकरा चारू कें त' पांच-छ: वर्ष गाम एलाह  भ' गेलहि ....

अकबर:..पांच-छ: वर्ष !! धन्य छथि महाप्रभु सभ ! की हुनका लोकन कें अपन जननी -जन्मभूमि कें याद नै अबैत छन्हि ??

नारायण:.. फोन केने छलाह --छुट्टी नै भेटहिया ! माए हेतु खर्चा हम सभ भाई मिल क' भेज देब ।

अकबर: तौबा!तौबा!! ई पापी पेट जे नै कराबाए  ! एक बिताक उदर भड़बाक  हेतु जननी-जन्मभूमिक परित्याग ! -भाई , की मिथिलांचल एतेक निर्धन थिक?  की माएक छातीक ढूध सुइख गेलहि  --जे एकर धिया-पुता कें दोसरक छातीक दूध पीबअ लेल विवश होबअ पइड़ रहल छै  ?

नारायण: नै भाई, नै ! हम एहि गप के नै मानैत छी , जे माए मैथिलिक छातीक दूध सुखा गेलाए ! ओकर दूध त' बहि क' क्षति भ' रहल छै ! कारण, धिया -पुता सभ 'सभ्य आ संस्कारी ' दूध पिबहे नै चाहैत अछि ! ओकरा त' भदेसी डिब्बा बंद दूध पिबाक  हीस्सक लागि गेल छै ।

अकबर: ठीक कहलौं ! धान कटेबाक अछि , एकटा ज'न नै भेट रहल अछि । सब दोसर जगह जा' गाहिर -बात सुनि गधहा जेना खटैत अछि, मुदा, अपन गाम आ अपन खेत में काज करबा' में लाज होइत छै ! भदेस में रिक्शा-ठेला सब चलाएत , मुदा, अपना गाम में मजदूरी नै करत ! आ भदेस में अनेरो अपन जननी-जन्मभूमि के अपनों आ दोसरो सँ गरियायत..

नारायण: अरे, हम त' कहैत छि--किछु दिन जँ जी-जान सँ एहि धरती पर मेहनत काएल जाए त' ई धरती फेर हँसत-लहलहाएत । कोनो धिया-पुता कें माएक ममताक आँचर सँ दूर नै रहए  पड़तै ।

अकबर: मुदा, ई होएत कोना ? कोना सुतल आत्मा कें जगाओल जाए?

नारायण:एहि हेतु सभ सँ पहिने हमरा लोकन कें जाइत-पाइत सँ ऊपर उठि एक होबअ पड़त ! हमरा सभ कें बुझअ पड़त  जे हम सभ मिथिलावाशी छी  अओर हमर मात्र एक भाषा थिक 'मिथिली' , हमर मात्र एक उद्देश्य थिक सम्पूर्ण मिथिलाक विकाश ।

अकबर: (खेत सँ माइट उठबैत ) हाँ  भाई, हाँ ! हम सभ एक छी --"मिथिलावाशी" । एहि माइट में ओ सुगंध अछि जकर महक अपना धिया-पुता कें जरुर खिंच लाएत ।(कविता पाठ)
        "हम छी मैथिल मिथिलावाशी, मैथिली मधुरभाषी ।
      मातृभूमि अछि मिथिला हमर, हम मिथिला केर संतान ।
     सीता सन बहिन हमर , पिता जनक समान ।
    नै कोनो अछि भेद-भाव , नै जाइत-पाइत कें अछि निशान ।
आउ एक स्वर में एक संग , हम मिथिला कें करी गुण-गान ---जय मिथिला , जय मैथिली ।
  पर्दा खसैत अछि
तेसर दृश्यक समाप्ति 
 
          

गजल

नहि हम कागजक आखर जनि पएलहुँ
नहि हम  अहाँक करेज में सनि  पएलहुँ

आब केँ पतियाएत हमर मोन कें   कनिको
अहाँ  तs नहि केखनो हमरा  जनि पएलहुँ

बिन पानिक गति जेना माछक होएत छैक
ओहे गति हमर, हम नहि कनि पएलहुँ

अपन देश छोडि कs परदेश जा बसलहुँ
सुन्नर  यादि छोडि नहि किछु अनि पएलहुँ

बर्खो-बर्ख हम रहलहुँ दूर परदेश में
एकरा त ' 'मनु'  अपन  नहि मनि पएलहुँ

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१७)
जगदानन्द झा 'मनु'  : गजल संख्या-३६ 

खुशी



कलुआही, बुध दिनक हटिया, चारुकात भीर-भार, बेपारी आ खरीदारक हल्ला-गुल्ला, कियो बेचैमे व्यस्त तँ  कियो कीनैमे मस्त | दीनानाथजी अपन कनियाँ संगे हटियामे प्रबेश कएलथि | हाटक मुँहेपर एकटा सात-आठ बर्खक बच्चिया हाथमे धनी-पात लेने हल्ला करैत,  "एक रुपैयाकेँ  दू मुठ्ठी, एक रुपैयाकेँ  दू मुठ्ठी"
मुदा सभ  कियोक ओकर बातकेँ  अनसुना करैत हाटक भीरमे बिलीन भेल जाए | दीनानाथजी सेहो ओकर बातकेँ  सुनैत हाटक भीरमे मिल गेलाह |
दू घंटा बाद, जखन दीनानाथजी अपन खरीदारी  कएलाक बाद हाटक मुँहपर वापस एला तँ  देखला, धनी-पात बाली बच्चिया पूर्ववत असगरे हल्ला करैत | दू मिनट मोन भए  ओहिठाम ठार भेला | हुनक कनियाँ, "चलून' धनी-पात तँ  अपने बारीमे बड्ड अछि "
दीनानाथजी, "कनी रुकू | "  कहैत आगू  धनी-पात बाली बच्चियासँ,  "कोना दै छिही बुच्ची"
बुच्ची, " बाबू एक रुपैयाकेँ दू मुठ्ठी, मुदा एखन तक किच्छो नै बिकेल, अहाँ एक रुपैयाकेँ  तीन मुठ्ठी लए  लिअ | "
दीनानाथजी,  "सभटा कतेक छौ |"
बुच्ची गनैत, "एक,दू,- - सात, आठ - - - बारह,तेरह - - - उनैस, बीस, बीस मुठ्ठी बाबूजी |"
दीनानाथजी,  "सभटा दय दे |"
कनियाँ,  "हे-हे की करब ?"
दीनानाथजी कनियाँकेँ  इशारासँ चुप करैत, अपन कुर्ताक जेबीसँ एकटा दस रुपैयाक नोट निकालि कए  बुच्चीकेँ  देला बाद धनी-पात लैत, ओहिठामसँ बिदा भए गेला |
घर अबैत, दलानपर बान्हल जोड़  भरि बरद, हुनक आहटेसँ अपन-अपन कान उठा कए मानु सलामी देबअ लागल | ओहो आगू आबि कs सिनेहसँ दुनूकेँ  माथ होँसथति, अपन झोरीसँ धनी-पात निकालि नाइदमे दए  देलखिन्ह | ई देखि कनियाँ, "ई की कएलहुँ दस रुपैयाक धनी-पात बरदकेँ  दए  देलियै, एतेककेँ  घास लेतहुँ तँ  बरद भरि  दिन खैतए | "
दीनानाथजी,  "कोनो बात नहि दस रुपैया तँ  सभकेँ  देखाइ  छैक मुदा ओइ  धनी-पात बाली बच्चियाकेँ मुँहपर जे असंतोस,निरासा आ दुखक भाव रहैक ओ केकरो नै देखाइ  | आ देखलीयै बिकेला बादक खुशी, ओहि  खुशीक मोल कतौ दस रुपैयासँ बेसी हेतैक |"
*****
जगदानन्द  झा  'मनु'



फहराइयै पताका

देखू मिथिला नगर के फहराइयै पताका
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा

जतक नारी जानकी श्रीराम केर भामिनी
जतक सभ्य संस्कृति के गाबै छथि रागिनी
ई नगरी अपन छोट नगरी जुनि बुझू
अछि सगरो जगत में मचौने धमाका
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा

हल्ली-मदन-वाचस्पति के ख्याति छन्हि
विद्यापतिक गीत सब गुनगुनाइत छन्हि
परमज्ञानी सत्यदेव ज्योतिष के ज्ञाता
मिथिला कहल जाईछ संपन्न गुणवाला
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा

कोइली कुहुकि स्वर पंचम में गाबय
झमझम बरसि मेघ कजरी सुनाबय
भोरे पराती गाबैइयै सुग्गा
परवा स' सजय रोज मंदिर-शिवाला
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा

नीपल जाईछ पीढ़ी गोसाऊनिक नित रोजे
पूजा के शंखनाद कोश-कोश गूजे
घर-घर में शालिग्राम, तुलसी के चौरा
घोघ तर में नारी लागय सीता आ राधा
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा

तुलसिक पनिसल्ला में कूश आ डाबा
नाग पूजल जाइछ ल' क' दूध संग लाबा
पातैर में भोग लागय आम-खीर-पूरी
जगदम्बाक कृपा स' हटल रहय विघ्न बाधा
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा

यश-कीर्ति-वैभव स' परिपूर्ण मिथिलांचल
जनक जीक न्याय के देवतो सब मानल
"मनीषक" अछि कामना जे बढ़ू सब आँगाँ
मैथिलक विचार उच्च, जीवन होइछ सादा
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा

मनीष झा "बौआभाई"