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शनिवार, 24 मार्च 2012

गजल


हाथीक दाँत देखाबैकेँ  आर नुकाबैकेँ छै आर 
नेताकेँ  कहैक गप्प छै आर बनाबैकेँ छै आर

केलक भोज नै दालि बड्ड सुडके इ बूझल
भोज करैक बात आरो छैक देखाबैकेँ छै आर

दोसरकेँ फटलमे टाँग सब कीयो अडाबै छै
फाटल अपन सार्बजनिक कराबैकेँ  छै आर

सासुरकेँ मजा बहुते होइ छै सभकेँ बुझल
कनियाँ सन्ग सासुरमे मजा सुनाबैकेँ छै आर

भाई धनक गौरब तँ गौरबे  आन्हर रहै छै 
मोट रुपैया जखन बाप जे पठाबैकेँ छै आर 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

गजल

स्वपन-सुन्नरी हमर सपनाकें ,सपना सँ बाहर आएब कोना ,
हे मृगनयनी स्वर्ग-परी, अहाँ हमर आँखि कें सोझा होएब कोना ,


अहाँ नित सपना में आबि सताबि,केखनो आँखि कें सोझा नै आबै छी ,
सदिखन अहींक सपने में रहि, सपना सँ बाहर जाएब कोना ,

अच्चकें में आबि अहाँ जगाबै छी, आँखी खुजै त किछु नहि पाबए छी ,
हे कमलरुपी जे अहाँ छी, सपना सँ केखन बाहर आएब कोना ,

हम एक्केटक ध्यान लागोने छी ,मोन अछि व्याकुल छाह हसोथै छी ,
अदभुत रचना मोनक हमर ,सपना सँ बाहर लाएब कोना
- - - - - - - - - - - - वर्ण -२५ - - - - - - - - - - - - -
रूबी झा

गीत


बड्ड आस धेने हम एलौं शरण, अहींक पुत्र थीकौं माँ।
रहऽ दियौ हमरा अपन चरण, अहींक पुत्र थीकौं माँ।

लाल रंग अँचरी, लाले रंग टिकुली, माँ केर आसन लाले-लाल,
सिंहक सवारी शोभै, हाथ मे त्रिशूल, अहाँक चमकैए भाल।
करै छी वन्दना धरती सँ गगन, अहींक पुत्र थीकौं माँ।

आंगन नीपेलौं, अहाँक पीढी धोएलौं, छी फूल लेने ठाढ,
दियौ दरसन माँ, दुख करू संहार, भरू सुख सँ संसार।
अहीं कहू हम करी कोन जतन, अहींक पुत्र थीकौं माँ।

नै चाही अन धन, नै चाही जोबन, खाली शरण माँगै छी,
सुनू हमरो पुकार, भरू ज्ञानक भण्डार, एतबा वचन माँगै छी।
कहिया देबै अहाँ हमरा दर्शन, अहींक पुत्र थीकौं माँ।

जपै छी नाम अहींक, हम सब राति दिन, तकियौ एक बेर,
करू हमर उद्धार, लगाबू बेडा पार, नै ए कोनो कछेर।
अछि नोर भरल "ओम"क नयन, अहींक पुत्र थीकौं माँ।

पहिल टिकुला

‎मज्जरक दिन सँ पसरल सुगंध ,
हर्षित मोन सुंघि मातल गंध ,
फूसिये कहै छी कोयलक गीत सुन' जाइ छलौ ,
सच कहौँ बढ़ैत टिकुलाक दर्शन कर' जाइ छलौँ ,
डाँढ़ि-पात लुबधल हरियर टिकुला ,
पैघ-छोट ,वाह! केहन रूप दैब रचला ,
पहिल टिकुला सँ चटनी थारी सजल ,
साल भरि के बाद मुँहक स्वाद बदलल ,
एखने सँ मीठ राजा लागि रहल ,
बम्बई मालदह छकि क' खेबै आश लागल ,
धन्य भेल जिनगी देख पहिल टिकुला ,
"अमित" रसालक ध्यान मे बनल बगुला . . . । ।
अमित मिश्र

गजल

टूटिए जेतै संबंध जँ दस लेल एक सँ , इहो स्वीकार अछि ,
भीड़ मे जीबै छी तेँ भीड़ के बचेनाइ हमर अछिकार अछि ,
हम बनियाँ छी सए कमा लेब , दस छुटि गेल कोनो दुख नै ,
सबल त' बढ़बे करतै ओकरा संग दिअ जे लचार अछि ,
माछक लोभ मे सड़ल माछ ल दुषित नै करब समाज के .
एक दाम मे बिकै बला ककरो जिनगी नै मीना बजार अछि ,
सब के सब सँ किछु-ने- किछु चाहत रहै छै छोट बाट पर ,
अहाँ एक बेर आबू हम दस बेर , इ हमर व्यबहार अछि ,
लड़ाइ क' देह जुनि तोड़ै जाउ , प्रेम क' दिल धरि पहुँचु यौ ,
"अमित" गिनती के फेरा मे नै पड़ू , सगरो अपने संसार अछि . . . । ।
वर्ण-23
अमित मिश्र

गजल

धक सं लागल चोट, करेजा हमर तोड़ि देलऊं
एहन भेलऊं अहां कठोर कि हमरा छोड़ि देलऊं ।
दिन हो चाहे राइत अहांके हम ईयाद छलऊं
एहन अहांके कि भ गेल कि हमरा छोड़ि देलऊं ।

सदिखन छलहुं हमर पास संग आब छोड़ि देलऊं
हम देखितॆ रहलऊं बाट अहां मुख मोड़ि लेललऊं ।
टूटल हमर पूर्ण विश्वास, दूख संग जोड़ि गेलऊं
हमरा सं कि गलती भेल कि हमरा छोड़ि गेलऊं ।
- भास्कर झा 22/03/2012

गुरुवार, 22 मार्च 2012

बेटी पराया धन

कए साल स सुनइत आइब रहल छी,
बेटि त पराया धन होइत अछि ,
जकरा हम सहेजइ छी, संभारइ छी ,
अपन जान स बेसी मानैत छी ,
और फेर चैल जाइत अछि वो एक दिन,
अपन तथाकथित स्वामीक लग|

मुदा एक बात के उत्तर देता कियो हमरा ,
भला किएक कियो अपन धन के ,
वापस लय में सेहो धन माँगइत अछि ,
या फेर अपन धन के अनैहते ,
जर्बैत अछि या घर स निकाइल बाहर करइत अछि |

यदि नय त किएक दहेज के आइग में ,
जरइत अछि हजारो बेटि,
या दर दर ठोकर खाय के लेल मजबूर अछि ,
अपन बाबु के वो राजदुलारी ,
दोष नियत के अछि या अय समाज़ के ,
की यशोदा सेहो आन बुझलक ,
और देवकी सेहो नय अपनेलक |
निशांत झा

परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ@प्रभात राय भट्ट



मिथिला के हम बेट्टी छि मैथिलि हमर नाम यौ
जनक हमर पिता छथि जनकपुर हमर गाम यौ
जगमे भेटत नै कतहूँ एहन सुन्दर मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

मिथिला के हम बेट्टा ची मिथिलेश हमर नाम यौ
मिथिला के हम वासी छि जनकपुर हमर गाम यौ
ऋषि महर्षि केर कर्मभूमि अछि मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

मिथिलाक मैट सं अवतरित भेल्हीं सीता जिनकर नाम यौ
उगना बनी महादेव एलाह पाहून बनी कय राम यौ
धन्य धन्य अछि मिथिलाधाम,मिथिलाधाम जगमे महान यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

हिमगिरी के कोख सं ससरल कमला कोशी बल्हान यौ
मिथिला के शान बढौलन मंडन,कुमारिल,वाचस्पति विद्द्वान यौ
हमर जन्मभूमि कर्मभूमि स्वर्गभूमि मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

कपिल कणाद गौतम अछि मिथिलाक शान यौ
विद्यापति के बाते अनमोल ओ छथि मिथिलाक पहिचान यौ
जगमे भेटत नै कतहूँ एहन सुन्दर मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

बुधवार, 21 मार्च 2012

गजल


जीनाइ भेलै महँग, एतय मरब सस्त छै।
महँगीक चाँगुर गडल, जेबी सभक पस्त छै।

जनता ढुकै भाँड मे, चिन्ता चुनावक बनल,
मुर्दा बनल लोक, नेता सब कते मस्त छै।

किछु नै कियो बाजि रहलै नंगटे नाच पर,
बेमार छै टोल, लागै पीलिया ग्रस्त छै।

खसि रहल देबाल नैतिकताक नित बाट मे,
आनक कहाँ, लोक अपने सोच मे मस्त छै।

चमकत कपारक सुरूजो, आस पूरत सभक,
चिन्तित किया "ओम" रहतै, भेल नै अस्त छै।
(बहरे-बसीत)

गजल

बेटी नहि होइ दुनिआ में, कहु बेटा लाएब कतए सँ
जँ दीप में बाती नहि तँ, कहु दीप जलाएब कतए सँ

आबै दियौ जग में बेटी के, के कहे ओ प्रतिभा,इन्द्रा होइ
भ्रूण-हत्या करब तँ कल्पना,सुनीता पाएब कतए सँ

मातृ-स्नेह, वात्सलके ममता, बेटी छोरि कें दोसर देत
बिन बेटी वर कें कनियाँ कहु कोना लाएब कतए सँ

धरती बिन उपजा कतए, घर बिनु कतए घरारी
बिन बेटी सपनो में, नव संसार बसाएब कतए सँ

हमर कनियाँ, माए बाबी हमर किनको बेटीए छथि
बिन बेटी एहि दुनिआ में, मनु हम आएब कतए सँ 


जगदानन्द झा 'मनु'

मैथिली गीत

एगो बात छिए भौजी मोन में विचारे निरुपमा से नहिं हेतेह बियाह त मरि जएबे कुमारे सपना देखेय छी हम आब दिन के ... यै भौजी लगबु जोगार अहाँ अपना बहिन से जहिया से हम अहाँ के बहिन के देखलौं सुधि बुधि अपन भौजी सबटा बिसरलौं भ गेलेय प्यार हमरा अहाँ बहिन से यै भौजी लगबु जोगार अहाँ अपना बहिन से रुपया पैसा भीैजी किछुओ नहिं लेबेय ऊपर सॅ जेे माँगब सब किछु देबेय गहना हम आनि देबेय चुनि चुनि के यै भौजी लगबु जोगार अहाँ अपना बहिन से बात चलाबु भौजी बात बढ़ाबु अपना बहिन से हमर बियाह कराबु नहिं त खाई लेबे जहर किन के यै भौजी लगबु जोगार अहाँ अपना बहिन से एगो बात छिए भौजी मोन में विचारे निरुपमा से नहिं हेतेह बियाह त मरि जएबे कुमारे सपना देखेय छी हम आब दिन के यै भौजी लगबु जोगार अहाँ अपना बहिन से आशिक ’राज’

प्राचीन मिथिला


मिथिला के मिथिलेश्वर महादेव हम की कहू यौ
स्वम अहाँ छि अन्तरयामी अहाँ सभटा जनैतछी यौ
बसुधाक हृदय छल हमर महान मिथिला
इ हमही नै शाश्त्र पुराण कहैय यौ

मिथिलाक जन जन छलाह जनक एही ठाम
ताहि लेल नाम पडल जनकपुर धाम
राजा जनक छलाह राजर्षि जनकपुरधाम में
सीता अवतरित भेलन्हि मिथिले गाम में

मिथिलाक पाहून बनी ऐलाह चारो भाई राम
विद्यापती के चाकर बनलाह उगना एहि ठाम
चारो दिस अहिं छि महादेव जनकपुर के द्वारपाल
पुव दिस मिथिलेश्वरनाथ पश्चिम जलेश्वरनाथ

उत्तर दिस टूटेश्वरनाथ दक्षिण कलानेश्वरनाथ
किनहू भs सकय मिथिलाक प्राणी अनाथ
इ ध्रुव सत्य अछि प्राचीन मिथिलाक परिभाषा
एखुनो अछि एहन सुन्दर मिथिलाक अभिलाषा

रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

गजल@प्रभात राय भट्ट

गजल@प्रभात राय भट्ट



गजल:-
अहाँ विनु जिन्गी हमर बाँझ पडल अछि
सनेह केर पियासल काया जरल अछि


दूर रहितो प्रीतम अहाँ मोन पडैत छि
प्रीतम अहिं सं मोनक तार जुडल अछि


तडपैछि अहाँ विनु जेना जल विनु मीन
अहाँ विनु जिया हमर निरसल अछि


नेह लगा प्रीतम किया देलौं एहन दगा
मधुर मिलन लेल जिन्गी तरसल अछि


अहाँ विनु प्रीतम जीवन व्यर्थ लगैय
की अहाँक प्रेमक अर्थ नहीं बुझल अछि
..............वर्ण-१६...........
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

मंगलवार, 20 मार्च 2012

प्रवीन नारायण चौधरी जिक कविता -बेटी अहाँ विद्यालय जाउ!

भले जे हेतै बाद में देखबै - एखन अहाँ विद्यालय जाउ!
शिक्षा के शक्ति जगके जननी - अहुँ अपन अस्मिता बनाउ!
जुनि पिछड़ू कोनो विधामें पाछू - अस्तित्वक रक्षा-किला बनाउ!
बेटी अहाँ विद्यालय जाउ!

देखू आइ संसार में नारी - अग्रपाँति नेत्री बनि चलैथ!
जतय दहेजक चाप आ मारि - सैह समाज पिछड़ल छैथ!
शिक्षाके पूँजी सभसऽ बड़का - दहेज-दान के त्याग कराउ!
बेटी अहाँ विद्यालय जाउ!

भारतमें नारी छथि आगू - मिथिला बेसी पिछड़ल अछि!
बीति गेल देखू कते जमाना - गार्गी - भारती पड़ल अछि!
पुनः प्रीतिके रीति सऽ सभके - अपन दिव्य शक्तिके देखाउ!
बेटी अहाँ विद्यालय जाउ!

हरिः हरः!
प्रवीन नारायण चौधरी

रवि मिश्रा जिक प्रस्तुति

हम छी मिथीलाक बेटी हमर की दोस अछी
अहाँ हमरा सँ प्रेम केलौ कहु हमर की दोस अछी

अहाँक पिताजी माँगै छथि दहेज
हमर पिताजी छथि निर्धन कहु हमर की दोस अछी

क निर्धन केर बेटी सँ प्रेम- वीलाप
आब भेलौ कठोर कहु हमर की दोस अछी

मन में बसी अहाँ भेलौ निठुर
हमर जीनजी केलो बेकार कहु हमर की दोस अछी

टुतल मोन झरै या नयन सँ नोर
नै रुकै या नोर कहु हमर की दोस अछी

हमर नोर देखी हंसै या लोक
हम कनैत छि हुनक हंसी सँ कहु हमर

रवि मिश्रा