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गुरुवार, 21 मई 2026

निर्गुण गजल

ई संसार अछि खाली बसेरा बुझि क आयब भाइ

लेलहुँ जन्म जगमे एक दिन सभ छोरि जायब भाइ

 

साँसक डोर टूटत दूर तखने सभ भ जायत भाइ

माटिक मूरती ई देह सुख कोना क  पायब भाइ


हरिकेँ नाम जगमे जे भजत फल ओ तँ पायत भाइ

धन-बल मोहमे जीवन कते आरो गमायब भाइ

 

जायत संग कृत टा तुच्छ बाँकी सब कहायत भाइ

काल्हिक अछि ककर जगमे भरोसा की बसायब भाइ

 

सत अछि ‘मनु’ कहै जगमे कतय हरि छोरि जायब भाइ

माया सभसँ रहि बड़ दूर  हरि-हरि मनसँ गायब भाइ

(बहरे रूप, मात्राक्रम 2221-2221-2221-2221)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’