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गुरुवार, 9 जुलाई 2026

गजल

पैघ नहि  जीवनसँ  दोसर सजा कोनो

नहि कतौ अछि एहि दर्दक दवा कोनो

 

बंद केने  मोनमे छी  दुखक सागर

केकरो लागल भनक नहि हवा कोनो

 

सत्य अंतिम मृत्यु अछि जीवनक सबहक

बेसि एहिसँ आन अछि नहि मजा कोनो

 

बेइमानी आ कपटकेँ जतय घर नहि

अछि अहाँ लग एहि जगमे पता कोनो

 

‘मनु’ हियक भीतर अहंकार जे मारय

नहि कतो एहेन भेटल गदा कोनो

 

(बहरे कलीब, मात्राक्रम : 2122-2122-1222)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


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