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रविवार, 1 दिसंबर 2013

गजल

करेजामे अपन  हम की बसेने छी

अहाँकेँ नामटा लिख-लिख नुकेने छी

 

बितैए राति नै  कनिको कटैए दिन

पियाकेँ बाटमे   पपनी सजेने छी

 

हमर ठोरक हँसीकेँ    देख नै हँसियौ

अहाँ हँसि लिअ दरद तेँ हम दबेने छी

 

हमर जीवन अहाँ बिनु नै छलै जीवन

मनुक्खसँ देवता     हमरा बनेने छी

 

गजलमे ई निशा आँखिक अहीँकेँ ‘मनु’

बुझू नै हम  महग   ताड़ी चढ़ेने छी

 

(बहरे हजज, मात्राक्रम  1222-1222-1222)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


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