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शनिवार, 14 जनवरी 2023

जगदानन्द झा ‘मनु’क पच्चीस टा रुबाइ एक्केठाम

रुबाइ १
आँचर नहि उठाबू आँखिसँ पीबय दिअ
हम जन्मसँ पियासल करेज जुड़बय दिअ

ताड़ीसँ  बेसी निसा  अहाँक  हँसीमे

प्रेमक निसामे अपन कनी जीबय दिअ

 

 

रुबाइ २

पीलौं हम तँ लोक कहलक शराबी अछि 

एतअ के नहि कहु बहसल कबाबी अछि

बुझलौं अहाँ सभ   दुनियाक ठेकेदार 

हमरो  आँखिसँ देखू की खराबी अछि  

 

 

रुबाइ 

नै पीब शराब तँ हम जीब कोना कय

फाटल करेजकेँ हम सीब कोना कय

सगरो जमाना भेल दुश्मन शराबक

सबहक सोंझा तँ आब पीब कोना कय

 

 

रुबाइ ४

पीलौं शराब तँ दुनियाँ कहलक बताह 

बिन पीने ई दुनियाँ भेल अछि कटाह

जे नहि पीलक कहाँ अछि ओकरो महल

पीबिए क' किएक नहि बनि जाइ घताह

 

 

रुबाइ ५

भेटल नहि सिनेह   तेँ शराबे पीलौं

दर्शन हुनक हरदम गिलासमे केलौं 

के अछि कहैत शराब छैक खराब ‘मनु’

बिन रहितौं हुनक शराबेसँ हम जीलौं

 

 

रुबाइ 

पीलौं नहि तँ की छै शराब बूझब की 

बिन पीने दुनियाँमे करब तँ करब की 

सभ अछि एक दोसरकेँ खून पीबैत 

खून छोड़ि शराबे पी कय देखब की 

 

 

रुबाइ  

एतेक नेहमे लीबैत किएक छी

दुनिया पुछलनि हम जीवैत किएक छी 

सभ बुझला उत्तर ‘मनु’ अहूँ इ जुनि पूछू 

दिन राति एतेक पीबैत किएक छी 

 

 

 

रुबाइ

कर्जा कय क जीवन हम जीव रहल छी 

फाटल अपनकेँ कहुना सीब रहल छी 

सभ किछु लूटा कय ‘मनु’ अपन जीवनकेँ

निर्लज जकाँ हम ताड़ी पीब रहल छी   

 

 

 

रुबाइ ९

गोरी तोहर काजर जान मारैए 
छौंरा सभ सगर हाय तान मारैए 
पेएलक बड़ भाग काजर विधातासँ 

तोहर आँखिमे कते शान मारैए 

 

 

रुबाइ १०

लाली मानि कय अहाँ ठोरसँ लगा लिअ

आँखिक अपन  करीया काजर बना लिअ

एना जुनि अहाँ   कनखी नजरिसँ देखू
प्रियतम बना ‘मनु’केँ करेजसँ लगा लिअ

 

रुबाइ ११

फूसियो जँ कनी अहाँ इशारा करितहुँ

भरि जीवन हम अहीँक बाटमे रहितहुँ

मुस्कीमे अहाँक अपन मोन लूटा क’

तरहत्थीपर जान लेने  हम अबितहुँ

 

 

रुबाइ १२

साँवरिया पिया अहाँ की कएलहुँ   

साउन चढ़ल छोड़ि चलि कोना गएलहुँ

शीतल हवा बहल सिहरैए हमर तन

कोना रहब बिनु अहाँ बुझि नै पएलहुँ  

 

 

रुबाइ १३

गोरी तोर मुस्कीमे छौ जहर भरल 

नै एना मुँह खोल कते घायल परल 

तोहर फुलझड़ी सन मारुक हँसी सुनि क

भेटत बाटपर कतेको छौंड़ा मरल 

 

 

रुबाइ १४

तोरा देख सुन्नरी सीटी बजैए

धरकन बंद ई कतेकोकेँ करैए

परमाणु बम दुनिया फालतू बनेलक

तोहर कनखीसँ मनुख लाखो मरैए

 

 

रुबाइ १५

जे घाव अहाँ हमर करेजकेँ देलहुँ

सबटा ओ दर्द दुनियाँसँ नुका लेलहुँ  

मुस्कीसँ हमर नै बुझू जे हम खुश छी

खूनक घुट अहाँक खुशीमे पी गेलहुँ

 

 

रुबाइ १६

घुमि कनखीसँ कनि जे अहाँ ताकि देलहुँ

तन मन अपन एहिपर हम हारि देलहुँ

नहि आब बैकुंठकेँ रहि गेल इच्छा

सगरो अहाँकेँ लेल ‘मनु’ बारि देलहुँ

 

 

रुबाइ १७

नाथक पजारल नेह धधैक रहल अछि

असगर करेजा हमर तड़ैप रहल अछि 

लगने कोन अहाँसँ हम नेह लगेलौं

प्रेमक गरमीसँ देह बरैक रहल अछि

 

 

रुबाइ १८

दुनिया जँ नै पुछलक तँ कोनो बात नहि

राखू मोन अहाँ इ तेहनो बात नहि

चिन्है सगर समाज आइ धनीकेकेँ

‘मनु’केँ जँ जाइ बिसरि एहनो बात नहि

 

रुबाइ १९

तोरा नहि हम छोड़लौं नहि हम बेवफा

तोरा बिन नहि मरलौं नहि हम बेवफा

तोहर प्राण गेल बुझि नहि जीवैत ‘मनु’

बिन काठीए जरलौं  नहि हम बेवफा

 

 

रुबाइ २०

आपस दे हमरा  हमर बितल दिन

किरया तोरा दे   ओ सगर बितल दिन

रहि जाएब आब असगरे तोरा बिन

नै यादि करब संगे तोहर बितल दिन

 

 

रुबाइ २१

छी हम जरैत   की अहाँ प्रकाशित रही

सुख लेल अहाँक खुशीसँ हम आँच सही 

बातीकेँ जरैत   ई दुनिया देखलक

बनि तेल हम तँ जरलौं दुख कतेक कही

 

 

रुबाइ २२

पागल हम दुनियामे पियार तकै छी

भलमानुस सब सगर वेपार तकै छी

नै कोनो दाम मनुख मनुखताकेँ

स्वार्थी लोकसँ ‘मनु’ सरोकार तकै छी

 

 

 

रुबाइ २३

बाबूजीक करेजमे  सदिखन रहलहुँ

तन मन धन हुनक सगरो हम पेएलहुँ 
दाही पानि रौदसँ सदिखन बचेलन्हि

सेबाक बेड़मे हम परदेश भगलहुँ 

 

 

रुबाइ २४

बाबूजी देह जान सबटा  देलन्हि 
जे किछु छी एखन बाबूजी केलन्हि
भूखे रहि अपने   हमर पेट भरलन्हि
सुधि बिसरि अपन हमरा मनुख बनेलन्हि

 

 

रुबाइ २५

फगुआ अहाँक बिनु कतेक बेरंग अछि 

बाँकी बस अहाँक यादेटा संग अछि

एही दुनियासँ जहन अहाँ चलि गेलौं 

बुझलौं कतेक कठिन जीवनक जंग अछि

                  ✍🏻जगदानन्द झा ‘मनु’

गुरुवार, 5 जनवरी 2023

गजल

भगवती जकर माए ओ टुगर कहल कोना 

हाथ छै दुनू भेटल रंक ओ रहल कोना

  

माथ पर हमर सदिखन जखन हाथ मैयाकेँ

एहिठाम रहलै कोनो  कठिन टहल कोना 

 

लेब छोरि कखनो देबाक बात कनि सोचू

सगर गाम देखू सुख शांति नहि बहल कोना

 

शेरकेँ घरे बैसल   नहि शिकार भेटै छै

घरसँ जे निकलबै नहि घर बनत महल कोना

 

काज नहि अपन हिस्सा केर ‘मनु’ करी हम सब

ई सहज सगर दुनिया नहि  बनत जहल कोना

(मात्राक्रम : 212-1222/ 212-1222 सभ पाँतिमे)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

रुबाइ

दुनिया जँ नै पुछलक तँ कोनो बात नहि

राखू मोन अहाँ इ तेहनो बात नहि

चिन्है सगर समाज आइ धनीकेकेँ

‘मनु’केँ जँ जाइ बिसरि एहनो बात नहि

                 ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


 

रविवार, 25 दिसंबर 2022

रुबाइ

जे जन्म देलन्हि ओ कहलन्हि गदहा 

जे पोसलन्हि ओ  मानलन्हि गदहा

गदहा जँका सगरो जिन्दगी बितेलहुँ

जिनका बियाहलहुँ बुझलन्हि गदहा 

                ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


बुधवार, 21 दिसंबर 2022

रुबाइ

मुँह पर दरद आबि जेए मरद नै

जे हर बहैत  बसि जेए बरद नै 

जिम्मेदारी घरक गेल विदेशमे 

केनामनु’ बुझलक जेए दरद नै

            ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


 

बुधवार, 14 दिसंबर 2022

गजल

जखन सगरो दर्द भेटल 

अपन सीलौं ठोर रेतल 

 

द’बल अपने हाथ गरदनि 

तखन के ई नोर मेटल 

 

घरक बन्हन छोरि दुनिया

सटल जतए नोट गेटल 

 

भरोसा करु आब कोना 

लखन भेषे चोर फेटल 

 

दहेजक ‘मनु’ चारिचक्का  

बियाहक पहिनेसँ सेटल 

(बहरे मजरिअ, मात्राक्रम 1222-2122)

जगदानन्द झा ‘मनु’

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

हमरा तँ चिन्हते होएब ?

आइ भोरे भोर एकटा अजोध वयोवृद्ध मैथिली साहित्यकार, गीतकार सो कॉल ग़ज़लकारकेँ फ़ोन आएल- “ट्रीन ट्रीन ट्रीन….”
हम- “हेलो”
उम्हरसँ- “के ? मनु।”
हम– “जी”
उम्हरसँ खूब खिसीयाति- “ई की अहाँ सभ फ़ेसबुकपर उल्टासिधा लिखैत रहै छी ? एक दू, एक दू। हम सब तँ भरि ज़िंदगी घास छिललौं।”
हम – “अपने के ?”
उम्हरसँ- “हम सा रे गा मा, हमरा तँ चिन्हते होएब ?”
हम – “हाँ”
उम्हरसँ- “कतेक ?”
हम – “जतेक अहाँ हमरा चिन्है छी।”
की ओ झट फोन राखि देला।
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

गजल

जखन मोन कानल गजल कहलौं

रहल कोंढ़ छानल गजल कहलौं

 

जमाना सुतल छल जखन नींदसँ

तहन राति जानल गजल कहलौं

 

गरीबक घरक जेठ बेटा हम

अभाबे इ गानल गजल कहलौं

 

जुआ छल लदल कांहपर लोकक

पसीनासँ सानल गजल कहलौं

 

उमर ‘मनु’ बितल आर की करबै

अपन मोन ठानल गजल कहलौं

 

(मात्राक्रम 122-122-1222, सभ पाँतिमे)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’



गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

सत्य देखल - श्री शरदिन्दु चौधरी जीक व्यंग्य संग्रह “बड़ अजगुत देखल” केर समीक्षा


श्री शरदिन्दु चौधरी जीक जीवन एकटा पत्रकारिता व साहित्य केर विद्यार्थिक लेल मीलक पाठर साबित भय सकैत अछि। श्री शरदिन्दु चौधरी एक गोट श्रेष्ठ पत्रकार, समृद्ध लेखक आ साहित्यकार तँ छथिए संगे संग ओ छथि एकटा कोमल करेजाक स्वामी। जखन ओ देखैत छथि समाजमे धर्म आ राजनीतिक ओटमे लोक फरेब आ कारी व्यापार कय रहल अछि तँ ओ दुख फेंटल आश्चर्य संगे तमसा सेहो जाएत छथि आ ई सब हुनक मोनक भाव हुनक लेखनीसँ साक्षात्कार होइत अछि।

हुनक भाषा आ भाषाशैली चाहे ओ पत्रकारक रूपे हुएथि व्यंग्यकार बा साहित्यकार रूपे सहज आ मधुर अछि। हमरा एहेन जीवन भरि मिथिला मैथिलीसँ दूरो रहै बला विद्यार्थिकेँ करेजामे हुनक एक एकटा आखर मउध जकाँ मीठ घोलैत पसरि जाइत अछि। ओ जतए जे कहै चाहैत छथि ओ कियो सहजतासँ बुझि सकैत अछि। एहि गुणक कारण भय सकैत अछि हुनक विताएल तीन दशकसँ बेसी समय जे पत्रकारिताक मात्र सेवेटा नहि रहल वरन ओ मैथिली पत्रकारिताक लेल एकटा साक्षात्कार रहला।

रहल जस अपजसक गप्प तँ ई अप्पन हाथमे नहि छैक। हम सभ ओनाहितो बुझै छीयैक जे मैथिली साहित्यमे गुणसँ बेसी गालबजाउन, गुटबंदी आ तूँ हमरा दें हम तोरा देबौकेँ चलन बेसी छैक। मिथिला मैथिलीक समाजक एहनेसन रंग देख कय शरदिन्दु चौधरीक मुँहसँ निकलल होएत “बड़ अजगुत देखल”। शरदिन्दु चौधरीक पोथी “बड़ अजगुत देखल” कहै लेल ई व्यंग्य संग्रह अछि मुदा वास्तवमे ई कामदेवक वाण सनक अछि। जाही वाणक घावसँ सोनीत बहैत कियौ नहि देखै छैक मुदा मनकेँ तार तार कय दै छैक। आओर इहे हाल होएत अछि एकटा सुधि आ निष्पक्ष पाठकक जखन ओ शरदिन्दु चौधरी जीक व्यंग्य संग्रह “बड़ अजगुत देखल” पढ़ैत छथि। असलमे कही तँ “बड़ अजगुत देखल” पढ़ला बाद बुझना जाइत अछि जेना सत्य देखने होई वा सत्यसँ साक्षात्कार भेल हुए। लेखक स्वयं पोथीक भूमिका “मुक्ति पायबाक प्रयत्न”मे कहैत छथि, “ई ने हास्य अछि, नें व्यंग्य अछि, हमर कहबाक एकटा ढंग अछि।”

आ जँ हम कही तँ, “ई ने हास्य अछि, नें व्यंग्य अछि, शरदिन्दु चौधरीक कहबाक एकटा ढंग अछि। जाहिमे देखाइत छैक सभकेँ अपन कर्तव्य आ काज मुदा परचट्ट जकाँ सभकियो आँखि कान केने अपन बंद अछि।

एही व्यंग्य संग्रहकेँ तरकशमे कुल बीस गोट व्यंग्य रूपी वाण राखल अछि, जे समाजक अगुआ, नेता, मठाधीश, संगठाधीश, सभक कृतकेँ देखार कय रहल अछि आ एहिमेँ शरदिन्दु चौधरी जीक कहैक ठंग आ लेखनीक जतेक प्रसंशा कएल जेए से कम।

पहील व्यंग्य, “जनहित”मे कोना करिया कक्का बाढ़ि सहाय काजमे आयल करोड़ो रूपया संतोष झाक द्वारा गवन कय लेलाक कारणे तमसाएल लोकसभकेँ कोना शांतेटा नहि कएला, संतोष झाक कुकर्मकेँ झंपैत अपन अपन धरकेँ भरैकेँ पुरा इंतज़ाम कय सेला। आजुक समयमे सगरो एहिना भय रहल छैक।  तूहुँ खो हमहुँ खाइ छी, जनता जेए चुल्ही तअर।

दोसर व्यंग्य “धन्यवाद ज्ञापन” कोना दुर्गा पूजाक उत्सब धूम धामसँ मनाएल गेल। भांगड़ा, डांडिया, गरबा, बिहू, पहाड़ी नाच सहित देश विदेशक सांस्कृतिक कार्यक्रम बहुत नीकसँ प्रस्तुत केएल गेल। नहि प्रस्तुत रहेए तँ मिथिला मैथिलीक गीत संगीत कला लोककथा आ सांस्कृतिक कोनो कार्यक्रम। सब कार्यकर्ता संयोजक आ कलाकार सभकेँ धन्यवाद ज्ञापन दै काल एकरा स्वीकार करैत कोना करिया कक्काक गला अवरुद्ध भ गेलनि ।

“मोआबजाक खोजमे” वस्तुतः मिथिलाक बाढ़ि आ माओवादीक संकट आ सरकार द्वारा कोनो निवारण नें कय कोना छूच्छे मोआबजा द क अपन इतीश्री बुझैत अछि। मोआबजा सेहो की तँ पाँच शेर अनाज वा किछु सय टाका। एहि बहाने एहीठाम मिथिलाक धरती परक लोकक मूल्य लगाएल गेल अछि। वस्तुतः रोचक सत्य, अकल्पनीय आ चिन्ताजनक। वास्तवमे शरदिन्दु चौधरी जीक कहबाक ढंग ज़बरदस्त अछि।

‘की मथै छी।’

‘मिथिला।’

‘की तकै छी।’

‘मैथिली।’

‘भेटल ?’

‘नइं।’

ई उत्कृष्ट संवाद थिक “की मथै छी ?”सँ ज़बरदस्त। प्रतेक बर्ख विद्यापति पर्वमे मिथिला मैथिली विकासक निमित्त काज आ ओकर विभिन्न पक्षकेँ देखाबैत “की मथै छी?” व्यंग्य व्यंग्य नहि भय कऽ वास्तविक चित्रण अछि जेकरा लेखक अपन शव्दमे कहि हमरा सबहक गालपर एकटा जोड़गर थापर मारैत सुतल मिथिलाबासीक आँखि खोलैक पूरा प्रयास केने छथि।

“दिव्य ज्ञानक प्राप्ति”मे स्तनपान सप्ताहकेँ केन्द्रित करैत कतेक आसान शव्दमे लेखक सबहक सामने गप्प राखैमे सफल छथि। संगे चिन्तित सेहो। समाजमे स्त्रीकेँ कोना एकटा वस्तु बुझल जा रहल अछि। स्त्री सेहो ओहिमे खुस भ अपनाकेँ वस्तु मानि, हुनक वस्तु नहि खराप भ जाइन तेँ डरे कोना बच्चाकेँ ईश्वर प्रदत अमृतसँ दूर राखि अपन एकटा नव प्रवृत्तिक निर्माण कय रहल छथि।

दर्शन सुदर्शन”मे दुकान जकाँ मिथिला मैथिलीक संस्थान/ विद्यापति पर्वक संस्था, पुरस्कार वितरण, कवि सम्मेलनक वास्तविकताकेँ उजागर केएल गेल अछि। ख़ास कय पटनाक चेतना समितिक कार्य प्रणाली आ अवरुद्ध मिथिला मैथिलीक विकास कार्यकेँ कटाक्ष करैत सम्पूर्ण व्यवस्थाकेँ नांगट कय देने अछि। शरदिन्दु चौधरी जीक शव्देमे एकटा निष्पक्ष आ निरगूट साहित्यकारक लेल – “ जाइत छी तँ जाउ, मुदा ई जानि लिअ जे कतबो लिखब, कतबो पढ़ब अहूँक वैह गति होएत जे विद्यापतिकेँ भेलनिहें। अहूँ ओहिना कोनो कोनटामे मुँह नुकोने नुकायल रहब। नाम सभ अवश्य लेत, सप्पत भने अहाँक खायत, संकल्पो अहीँक नामपर लेत, मुदा करत वैह जे ओकरा मोन होयतैक। पड़ाइत रहब तँ एहिना पड़ाइते रहि जायब।”

“हम मैथिल छी” मे उजागर केने छथि देश सहित मिथिला आ खासकय मिथिलाक गामक बेरोज़गारीक मार्मिक दृश्य। संगे जाहि काजमे मैथिल सबसँ आँगा अछि ओकर ज्ञान करबैत छथि, आ ओ काज अछि राय देनाई।

चुनावी तुक्कामें आजुक समयकेँ राजनीति, चुनाव आ चुनाव व्यवस्था, नेता आ जनताक बीचक सम्बंध एक एक टाक खोंइचा छोरा कय ओकर वास्तविकताकेँ देखार केएल गेल अछि। कोना नेता लोकनि भोटरकेँ भेंड़ा बुझि ओकरा अपना पक्षमे करबा लेल जाति पातिक फूटवार कय अप्पन लक्ष साधैमे निपुण छथि। ओतय जनता सेहो आब बूझनुक होयबाक चेष्टामे लागल अछि। जाति पातिसँ उपर भ जीवन रक्षाक बातपर, बात करैक लेल तैयार भ रहल अछि।

कोना नेतासभ काजक बलपर नहि टाकाक बलपर जनताकेँ किनैक चेष्टा करैत अछि। कोना पार्टी सभक प्रदेश कार्यालयमे टिकटक बिक्री आ ओकर बादो असफल भेलापर कोना पार्टीक अदला-बदली होइत छैक।

रौदी दाहीक कारणक संगे कोनो उद्योग धंधाक नहि रहने कोना मिथिला समाजक युवाशक्ति रोज़गारक खोजमे पंजाब हरियाणा ओगरने छथि, आ गाममे बचल लोग आवयबला मनीआर्डर पर वकोध्यान लगोने रहैत छथि। कोन मुँहे नेतासभ एहि मूलभूत आवश्यकताकेँ नहि देख पबैत छथि। नेता की नेता जनतो सब अपन अपन वास्तविकता व मूलभूत समस्याकेँ नहि देखि जातिपातिकेँ राजनीतिमे ओझरा अपन विकाससँ दूर पड़ेल जाएत छथि। राजनीति पार्टीमे चोर बनोलक अधिकता आ झगड़ाक एतेक नीकसँ लेखक उजागर केने छथि से वास्तविकतासँ साक्षात्कार करबैत, हमरा सभकेँ अपन राजनीति आ समाजीक व्यवस्थापर एकबेर फेरसँ सोचै लेल विवश कय दैइए।

“हम की करबै सरकार” मे जनताक संगे संग व्यापारी वर्गक व्यथाकेँ बहुत नीकसँ उजागर कएल गेल अछि। कोना व्यापारी सभ महंगाई संगे हाटक चुंगीं, बाजारक रंगदारी संगे संग चुनाव टेक्स सेहो सहैत अछि। चुनाव टेक्स नहि देलापर जानमालकेँ से हानि, आ ई ककरोसँ छूपल नहि छैक। उपरसँ ग्राहकक चिखनापर चिखनाक मांग।

समाजक सब पक्षक अव्यवस्थापर एतेक सटीक आ सूक्ष्म ध्यान देनाई ई शरदिन्दु चौधरी जीक कलमकेँ अलावे आन ठाम नहि देखा सकैत अछि ओहो एतेक सहज आ व्यंग्यक रूपमे।

मिथिलाक घूरतर बैसल लोकसभ सेहो आइ काल्हि आर्थिक आ राजनीतिक व्यवस्थासँ व्यथित भय एहने गप्पसप्प करैत छथि। मिथिलाक आमलोकेँ एखन धरि चुनावक गरमी ओतेक नहि गरमा सकलै जे ओ घूर छोड़ि चुनावक मैदानमे उतरि, समाजक विकास लेल काज क सकै। ओ तँ पचास वर्षसँ चुनाव आ ओकर कार्यक्रमक आदि भ चुकल अछि। कोनो नेता आबैत हुनका लेल सब एकसमान जेहने नागनाथ, तेहने साँपनाथ। आ एहि नागनाथ साँपनाथकेँ झगड़ा आ तुलनात्मक अध्ययन करैत हम सब शरदिन्दु जीक एहेन हीराक चमककेँ नहि देखैत हुनका ओ मान सम्मान नहि द पेएलिअनि जिनकर ओ हक़दार छथि। ईहे विडम्बना अछि मिथिला मैथिलीक साहित्य, समाज आ राजनीतिक, नागराज सांपराजमे ओझराएल, ओहिसँ बाहर निकैल आगू देखैक आवश्यकता हमरा सबकेँ अछि।

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

(विदेह, १५ नवम्बर २०२२ क अंकमे प्रकाशित)

 


 

सोमवार, 28 नवंबर 2022

रुबाइ

सगरो मैथिली साहित्य दहकैत अछि

नव नव विधाक आँच आइ पजरैत अछि

कोटी नमन जिनकर बिछल जारैन अछि 

बारल आगि विदेहक 'मनु' लहकैत अछि 

                    ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


 

शनिवार, 3 सितंबर 2022

सरकारी नौकरी

"गै दाई ! लाल कक्का, ई करीक्का वऽर कतएसँ  लअ अनलनि ?"
"रहअ दहक ! सुनलह नै जे काम पियारा की चाम पियारा, ई करीक्का सरकारी नौकरी करै छै।"
✒ जगदानन्द झा 'मनु' 


रविवार, 11 जुलाई 2021

एकटा मैथिली जमेएकें उत्तर

मिथिलामे जमेएकें भोजन परसैत काल साउस पुछलथिन : "झा जी खीर खेबइ कि हलुआ..??"

जमेए : "किएक घरमे कटोरी एक्के टा छैक की ?''

गुरुवार, 20 मई 2021

गजल

अहाँ रहूँ घरे हम   ठानि अबै छी
एहि पापी पेट लेल छानि अबै छी

रोटी पर नून नै घी पीबि सपना 
हुनक भोजक मंत्र जानि अबै छी 

कमौआ पुतक लातो सोहनगर 
गरीब घरक कोड़ो गानि अबै छी 

चानि पर तेलक अभाबे केश नै
कनियाँगतक खेत फानि अबै छी 

गप्पक कोनो खतिहान नै भेलैए
'मनु' बैसू हम पीबि पानि अबे छी
(सरल वार्णिक बहर - वर्ण १३)
जगदानन्द झा 'मनु'