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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

गजल

जखन मोन कानल गजल कहलौं

रहल कोंढ़ छानल गजल कहलौं

 

जमाना सुतल छल जखन नींदसँ

तहन राति जानल गजल कहलौं

 

गरीबक घरक जेठ बेटा हम

अभाबे इ गानल गजल कहलौं

 

जुआ छल लदल कांहपर लोकक

पसीनासँ सानल गजल कहलौं

 

उमर ‘मनु’ बितल आर की करबै

अपन मोन ठानल गजल कहलौं

 

(मात्राक्रम 122-122-1222, सभ पाँतिमे)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’



गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

सत्य देखल - श्री शरदिन्दु चौधरी जीक व्यंग्य संग्रह “बड़ अजगुत देखल” केर समीक्षा


श्री शरदिन्दु चौधरी जीक जीवन एकटा पत्रकारिता व साहित्य केर विद्यार्थिक लेल मीलक पाठर साबित भय सकैत अछि। श्री शरदिन्दु चौधरी एक गोट श्रेष्ठ पत्रकार, समृद्ध लेखक आ साहित्यकार तँ छथिए संगे संग ओ छथि एकटा कोमल करेजाक स्वामी। जखन ओ देखैत छथि समाजमे धर्म आ राजनीतिक ओटमे लोक फरेब आ कारी व्यापार कय रहल अछि तँ ओ दुख फेंटल आश्चर्य संगे तमसा सेहो जाएत छथि आ ई सब हुनक मोनक भाव हुनक लेखनीसँ साक्षात्कार होइत अछि।

हुनक भाषा आ भाषाशैली चाहे ओ पत्रकारक रूपे हुएथि व्यंग्यकार बा साहित्यकार रूपे सहज आ मधुर अछि। हमरा एहेन जीवन भरि मिथिला मैथिलीसँ दूरो रहै बला विद्यार्थिकेँ करेजामे हुनक एक एकटा आखर मउध जकाँ मीठ घोलैत पसरि जाइत अछि। ओ जतए जे कहै चाहैत छथि ओ कियो सहजतासँ बुझि सकैत अछि। एहि गुणक कारण भय सकैत अछि हुनक विताएल तीन दशकसँ बेसी समय जे पत्रकारिताक मात्र सेवेटा नहि रहल वरन ओ मैथिली पत्रकारिताक लेल एकटा साक्षात्कार रहला।

रहल जस अपजसक गप्प तँ ई अप्पन हाथमे नहि छैक। हम सभ ओनाहितो बुझै छीयैक जे मैथिली साहित्यमे गुणसँ बेसी गालबजाउन, गुटबंदी आ तूँ हमरा दें हम तोरा देबौकेँ चलन बेसी छैक। मिथिला मैथिलीक समाजक एहनेसन रंग देख कय शरदिन्दु चौधरीक मुँहसँ निकलल होएत “बड़ अजगुत देखल”। शरदिन्दु चौधरीक पोथी “बड़ अजगुत देखल” कहै लेल ई व्यंग्य संग्रह अछि मुदा वास्तवमे ई कामदेवक वाण सनक अछि। जाही वाणक घावसँ सोनीत बहैत कियौ नहि देखै छैक मुदा मनकेँ तार तार कय दै छैक। आओर इहे हाल होएत अछि एकटा सुधि आ निष्पक्ष पाठकक जखन ओ शरदिन्दु चौधरी जीक व्यंग्य संग्रह “बड़ अजगुत देखल” पढ़ैत छथि। असलमे कही तँ “बड़ अजगुत देखल” पढ़ला बाद बुझना जाइत अछि जेना सत्य देखने होई वा सत्यसँ साक्षात्कार भेल हुए। लेखक स्वयं पोथीक भूमिका “मुक्ति पायबाक प्रयत्न”मे कहैत छथि, “ई ने हास्य अछि, नें व्यंग्य अछि, हमर कहबाक एकटा ढंग अछि।”

आ जँ हम कही तँ, “ई ने हास्य अछि, नें व्यंग्य अछि, शरदिन्दु चौधरीक कहबाक एकटा ढंग अछि। जाहिमे देखाइत छैक सभकेँ अपन कर्तव्य आ काज मुदा परचट्ट जकाँ सभकियो आँखि कान केने अपन बंद अछि।

एही व्यंग्य संग्रहकेँ तरकशमे कुल बीस गोट व्यंग्य रूपी वाण राखल अछि, जे समाजक अगुआ, नेता, मठाधीश, संगठाधीश, सभक कृतकेँ देखार कय रहल अछि आ एहिमेँ शरदिन्दु चौधरी जीक कहैक ठंग आ लेखनीक जतेक प्रसंशा कएल जेए से कम।

पहील व्यंग्य, “जनहित”मे कोना करिया कक्का बाढ़ि सहाय काजमे आयल करोड़ो रूपया संतोष झाक द्वारा गवन कय लेलाक कारणे तमसाएल लोकसभकेँ कोना शांतेटा नहि कएला, संतोष झाक कुकर्मकेँ झंपैत अपन अपन धरकेँ भरैकेँ पुरा इंतज़ाम कय सेला। आजुक समयमे सगरो एहिना भय रहल छैक।  तूहुँ खो हमहुँ खाइ छी, जनता जेए चुल्ही तअर।

दोसर व्यंग्य “धन्यवाद ज्ञापन” कोना दुर्गा पूजाक उत्सब धूम धामसँ मनाएल गेल। भांगड़ा, डांडिया, गरबा, बिहू, पहाड़ी नाच सहित देश विदेशक सांस्कृतिक कार्यक्रम बहुत नीकसँ प्रस्तुत केएल गेल। नहि प्रस्तुत रहेए तँ मिथिला मैथिलीक गीत संगीत कला लोककथा आ सांस्कृतिक कोनो कार्यक्रम। सब कार्यकर्ता संयोजक आ कलाकार सभकेँ धन्यवाद ज्ञापन दै काल एकरा स्वीकार करैत कोना करिया कक्काक गला अवरुद्ध भ गेलनि ।

“मोआबजाक खोजमे” वस्तुतः मिथिलाक बाढ़ि आ माओवादीक संकट आ सरकार द्वारा कोनो निवारण नें कय कोना छूच्छे मोआबजा द क अपन इतीश्री बुझैत अछि। मोआबजा सेहो की तँ पाँच शेर अनाज वा किछु सय टाका। एहि बहाने एहीठाम मिथिलाक धरती परक लोकक मूल्य लगाएल गेल अछि। वस्तुतः रोचक सत्य, अकल्पनीय आ चिन्ताजनक। वास्तवमे शरदिन्दु चौधरी जीक कहबाक ढंग ज़बरदस्त अछि।

‘की मथै छी।’

‘मिथिला।’

‘की तकै छी।’

‘मैथिली।’

‘भेटल ?’

‘नइं।’

ई उत्कृष्ट संवाद थिक “की मथै छी ?”सँ ज़बरदस्त। प्रतेक बर्ख विद्यापति पर्वमे मिथिला मैथिली विकासक निमित्त काज आ ओकर विभिन्न पक्षकेँ देखाबैत “की मथै छी?” व्यंग्य व्यंग्य नहि भय कऽ वास्तविक चित्रण अछि जेकरा लेखक अपन शव्दमे कहि हमरा सबहक गालपर एकटा जोड़गर थापर मारैत सुतल मिथिलाबासीक आँखि खोलैक पूरा प्रयास केने छथि।

“दिव्य ज्ञानक प्राप्ति”मे स्तनपान सप्ताहकेँ केन्द्रित करैत कतेक आसान शव्दमे लेखक सबहक सामने गप्प राखैमे सफल छथि। संगे चिन्तित सेहो। समाजमे स्त्रीकेँ कोना एकटा वस्तु बुझल जा रहल अछि। स्त्री सेहो ओहिमे खुस भ अपनाकेँ वस्तु मानि, हुनक वस्तु नहि खराप भ जाइन तेँ डरे कोना बच्चाकेँ ईश्वर प्रदत अमृतसँ दूर राखि अपन एकटा नव प्रवृत्तिक निर्माण कय रहल छथि।

दर्शन सुदर्शन”मे दुकान जकाँ मिथिला मैथिलीक संस्थान/ विद्यापति पर्वक संस्था, पुरस्कार वितरण, कवि सम्मेलनक वास्तविकताकेँ उजागर केएल गेल अछि। ख़ास कय पटनाक चेतना समितिक कार्य प्रणाली आ अवरुद्ध मिथिला मैथिलीक विकास कार्यकेँ कटाक्ष करैत सम्पूर्ण व्यवस्थाकेँ नांगट कय देने अछि। शरदिन्दु चौधरी जीक शव्देमे एकटा निष्पक्ष आ निरगूट साहित्यकारक लेल – “ जाइत छी तँ जाउ, मुदा ई जानि लिअ जे कतबो लिखब, कतबो पढ़ब अहूँक वैह गति होएत जे विद्यापतिकेँ भेलनिहें। अहूँ ओहिना कोनो कोनटामे मुँह नुकोने नुकायल रहब। नाम सभ अवश्य लेत, सप्पत भने अहाँक खायत, संकल्पो अहीँक नामपर लेत, मुदा करत वैह जे ओकरा मोन होयतैक। पड़ाइत रहब तँ एहिना पड़ाइते रहि जायब।”

“हम मैथिल छी” मे उजागर केने छथि देश सहित मिथिला आ खासकय मिथिलाक गामक बेरोज़गारीक मार्मिक दृश्य। संगे जाहि काजमे मैथिल सबसँ आँगा अछि ओकर ज्ञान करबैत छथि, आ ओ काज अछि राय देनाई।

चुनावी तुक्कामें आजुक समयकेँ राजनीति, चुनाव आ चुनाव व्यवस्था, नेता आ जनताक बीचक सम्बंध एक एक टाक खोंइचा छोरा कय ओकर वास्तविकताकेँ देखार केएल गेल अछि। कोना नेता लोकनि भोटरकेँ भेंड़ा बुझि ओकरा अपना पक्षमे करबा लेल जाति पातिक फूटवार कय अप्पन लक्ष साधैमे निपुण छथि। ओतय जनता सेहो आब बूझनुक होयबाक चेष्टामे लागल अछि। जाति पातिसँ उपर भ जीवन रक्षाक बातपर, बात करैक लेल तैयार भ रहल अछि।

कोना नेतासभ काजक बलपर नहि टाकाक बलपर जनताकेँ किनैक चेष्टा करैत अछि। कोना पार्टी सभक प्रदेश कार्यालयमे टिकटक बिक्री आ ओकर बादो असफल भेलापर कोना पार्टीक अदला-बदली होइत छैक।

रौदी दाहीक कारणक संगे कोनो उद्योग धंधाक नहि रहने कोना मिथिला समाजक युवाशक्ति रोज़गारक खोजमे पंजाब हरियाणा ओगरने छथि, आ गाममे बचल लोग आवयबला मनीआर्डर पर वकोध्यान लगोने रहैत छथि। कोन मुँहे नेतासभ एहि मूलभूत आवश्यकताकेँ नहि देख पबैत छथि। नेता की नेता जनतो सब अपन अपन वास्तविकता व मूलभूत समस्याकेँ नहि देखि जातिपातिकेँ राजनीतिमे ओझरा अपन विकाससँ दूर पड़ेल जाएत छथि। राजनीति पार्टीमे चोर बनोलक अधिकता आ झगड़ाक एतेक नीकसँ लेखक उजागर केने छथि से वास्तविकतासँ साक्षात्कार करबैत, हमरा सभकेँ अपन राजनीति आ समाजीक व्यवस्थापर एकबेर फेरसँ सोचै लेल विवश कय दैइए।

“हम की करबै सरकार” मे जनताक संगे संग व्यापारी वर्गक व्यथाकेँ बहुत नीकसँ उजागर कएल गेल अछि। कोना व्यापारी सभ महंगाई संगे हाटक चुंगीं, बाजारक रंगदारी संगे संग चुनाव टेक्स सेहो सहैत अछि। चुनाव टेक्स नहि देलापर जानमालकेँ से हानि, आ ई ककरोसँ छूपल नहि छैक। उपरसँ ग्राहकक चिखनापर चिखनाक मांग।

समाजक सब पक्षक अव्यवस्थापर एतेक सटीक आ सूक्ष्म ध्यान देनाई ई शरदिन्दु चौधरी जीक कलमकेँ अलावे आन ठाम नहि देखा सकैत अछि ओहो एतेक सहज आ व्यंग्यक रूपमे।

मिथिलाक घूरतर बैसल लोकसभ सेहो आइ काल्हि आर्थिक आ राजनीतिक व्यवस्थासँ व्यथित भय एहने गप्पसप्प करैत छथि। मिथिलाक आमलोकेँ एखन धरि चुनावक गरमी ओतेक नहि गरमा सकलै जे ओ घूर छोड़ि चुनावक मैदानमे उतरि, समाजक विकास लेल काज क सकै। ओ तँ पचास वर्षसँ चुनाव आ ओकर कार्यक्रमक आदि भ चुकल अछि। कोनो नेता आबैत हुनका लेल सब एकसमान जेहने नागनाथ, तेहने साँपनाथ। आ एहि नागनाथ साँपनाथकेँ झगड़ा आ तुलनात्मक अध्ययन करैत हम सब शरदिन्दु जीक एहेन हीराक चमककेँ नहि देखैत हुनका ओ मान सम्मान नहि द पेएलिअनि जिनकर ओ हक़दार छथि। ईहे विडम्बना अछि मिथिला मैथिलीक साहित्य, समाज आ राजनीतिक, नागराज सांपराजमे ओझराएल, ओहिसँ बाहर निकैल आगू देखैक आवश्यकता हमरा सबकेँ अछि।

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

(विदेह, १५ नवम्बर २०२२ क अंकमे प्रकाशित)

 


 

सोमवार, 28 नवंबर 2022

रुबाइ

सगरो मैथिली साहित्य दहकैत अछि

नव नव विधाक आँच आइ पजरैत अछि

कोटी नमन जिनकर बिछल जारैन अछि 

बारल आगि विदेहक 'मनु' लहकैत अछि 

                    ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


 

शनिवार, 3 सितंबर 2022

सरकारी नौकरी

"गै दाई ! लाल कक्का, ई करीक्का वऽर कतएसँ  लअ अनलनि ?"
"रहअ दहक ! सुनलह नै जे काम पियारा की चाम पियारा, ई करीक्का सरकारी नौकरी करै छै।"
✒ जगदानन्द झा 'मनु' 


रविवार, 11 जुलाई 2021

एकटा मैथिली जमेएकें उत्तर

मिथिलामे जमेएकें भोजन परसैत काल साउस पुछलथिन : "झा जी खीर खेबइ कि हलुआ..??"

जमेए : "किएक घरमे कटोरी एक्के टा छैक की ?''

गुरुवार, 20 मई 2021

गजल

अहाँ रहूँ घरे हम   ठानि अबै छी
एहि पापी पेट लेल छानि अबै छी

रोटी पर नून नै घी पीबि सपना 
हुनक भोजक मंत्र जानि अबै छी 

कमौआ पुतक लातो सोहनगर 
गरीब घरक कोड़ो गानि अबै छी 

चानि पर तेलक अभाबे केश नै
कनियाँगतक खेत फानि अबै छी 

गप्पक कोनो खतिहान नै भेलैए
'मनु' बैसू हम पीबि पानि अबे छी
(सरल वार्णिक बहर - वर्ण १३)
जगदानन्द झा 'मनु'

शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

भक्ति गजल

मैया हमर जगतारनि कल्याणी 

सबहक अहाँ सुधि लेलौं महरानी 


नै हम मिलब माँ बाटक गरदामे

चिंता किए जेकर माय भवानी  


जग ठोकरेलक सदिखन ढेपासन 

देलौं शरण निर्बलके हे दानी


दर्शन अपन दिअ हे अम्बे माता 

नै सोन झूठक चाही नै चानी


धेलक चरण 'मनुतोहर हे मैया 

नै आब जगमे ककरो हम जानी 

(मात्रा क्रम : २२१२-२२२-२२२)

जगदानन्द झा 'मनु'

रविवार, 12 अप्रैल 2020

मोनक प्रश्न

की कवियो सभक धर्म होइ छै ?
कि सभ कवि बेधर्मी होइ छै ?
हाँ हाँ ई जुनि कहि देब, कविक धर्म
हमरा कविक धर्म नहि
हमरा बुझैके अछि कविके घर्म
धर्म ! ओ धर्म
अहाँक पुरखाक घर्म
जे अहाँके वैष्णव बनेलक
जे अहाँके टीक रखब सिखेलक
जे अहाँके माय भगवतीक सेबक बनेलक
आ जे केकरो गायभक्क्षी बनेलक
ओ धर्म

किएक
अनायास ई प्रश्न किएक ?
आइ देख रहल छी
जाहि कविके दाढ़ी नै भेलैए
ओहो गड़ीया रहल अछि
धर्मके टीक आ चाननके
गड़ीया रहल अछि
धर्मक गप्प करै बलाके
गड़ीया रहल अछि
धर्मक स्थानके
आ धर्म देवीके

कमोबेस मैथिलीक कविक सभक
इहे चालि अछि
हाँ ! कियों चिन्हार
तँ कियों अनचिन्हार अछि
तें पुछए परल ई प्रश्न
की कवियो सभक धर्म होइ छै ?
कि सभ कवि बेधर्मी होइ छै ?
यदि बेधर्मी भेनाई अनिवार्य होय कविके
तँ हमहूँ अपन जनउ तोरि ली
टीक काटि
गड़ीयाबै लागू झा मिसरके
खए लागू पाया आ लेग
कवि बनी की नै
मन बुझए अबे की नै
मुदा अकादमी पुरस्कार
भेटत हमरे
सभ परहत हमरे
कर्मे नहि तँ कुकर्मे
सभ परहत हमरे ।
        *****
        जगदानन्द झा "मनु"

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

कविता - भरल चगेंरी मुरही चुरा


                          || तिलासंक्रान्ति ||
                      " भरल चगेंरी मुरही चुरा "
                                       

उठ - उठ बौआ रै निनियाँ तोर ।
अजुका   पाबनि   भोरे   भोर ।।
पहिने  जेकियो   नहयबे  आई ।
        भेटतौ तिलबा रे मुरही लाइ ।।  उठ....

ई पावनि छी मिथिलाक पावनि
सब  पावनि   सं   बड़का  छी ।
भरल     चगेंरी      मुरही     चुरा
तिलवा   लाई   उपरका   छी ।।

उपर  देहिया  थर - थर  काँपय
        भीतर मनुआँ भेल विभोर ।।  उठ....

   चहल पहल भरि मिथिला आँगन
 अइ पावनि के  अजब मिठाई ।
आई   देत   जे   जतेक   डुब्बी
 भेटतै   ततेक   तिलबा  लाई ।।

मुन्ना   देखि  भरय   किलकारी
            जहिना वन में कोइलिक शोर ।।  उठ...

बुढ़िया   दादी   बजा   पुरोहित
छपुआ साडी   कयलक दान ।
तील चाऊर बाँटथि मिथिलानी
    एहि पावनि केर अतेक विधान ।।

     "रमण" खिचड़ी केर चारि यार संग
              परसि रहल माँ पहिर पटोर ।।  उठ......

  गीतकार
     रेवती रमण झा "रमण"
   

  


शनिवार, 11 नवंबर 2017

मैथिलि - हनुमान चालिसा





  ||  मैथिलि - हनुमान चालिसा  ||
     लेखक - रेवती रमण  झा " रमण "
                              ||  दोहा ||
गौरी   नन्द   गणेश  जी , वक्र  तुण्ड  महाकाय  ।
विघन हरण  मंगल कारन , सदिखन रहू  सहाय ॥
बंदउ शत - शात  गुरु चरन , सरसिज सुयश पराग ।
राम लखन  श्री  जानकी , दीय भक्ति  अनुराग । ।
               ||    चौपाइ  ||
जय   हनुमंत    दीन    हितकरी ।
यश  वर  देथि   नाथ  धनु धारी ॥
श्री  करुणा  निधान  मन  बसिया ।
बजरंगी   रामहि    धुन   रसिया ॥
जय कपिराज  सकल गुण सागर ।
रंग सिन्दुरिया  सब गुन  आगर  ॥
गरिमा गुणक  विभीषण जानल ।
बहुत  रास  गुण ज्ञान  बखानल  ॥
लीला  कियो  जानि  नयि पौलक ।
की कवि कोविद जत  गुण गौलक ॥
नारद - शारद  मुनि  सनकादिक  ।
चहुँ  दिगपाल जमहूँ  ब्रह्मादिक ॥
लाल  ध्वजा   तन  लाल लंगोटा  ।
लाल   देह  भुज  लालहि   सोंटा ॥
कांधे    जनेऊ    रूप     विशाल  ।
कुण्डल   कान   केस  धुँधराल  ॥
एकानन    कपि  स्वर्ण   सुमेरु  ।
यौ   पञ्चानन   दुरमति   फेरु  ।।
सप्तानन  गुण  शीलहि निधान ।
विद्या  वारिध  वर ज्ञान सुजान ॥
अंजनि  सूत सुनू  पवन कुमार  ।
केशरी   कंत    रूद्र     अवतार   ॥
अतुल भुजा बल ज्ञान अतुल अइ ।
आलसक जीवन नञि एक पल अइ ॥
दुइ   हजार  योजन  पर  दिनकर ।
दुर्गम दुसह  बाट  अछि जिनकर ॥
निगलि गेलहुँ रवि मधु फल जानि  ।
बाल   चरित  के  लीखत   बखानि  ॥
चहुँ  दिस   त्रिभुवन   भेल  अन्हार ।
जल , थल , नभचर सबहि बेकार ॥
दैवे   निहोरा  सँ   रवि   त्यागल  । 
पल  में  पलटि अन्हरिया भागल  ॥ 
अक्षय  कुमार  के  मारि   गिरेलहुं  ।
लंका   में  हरिकंप  मचयल हू ॥
बालिए अनुज अनुग्रह   केलहु  ।
ब्राह्ण   रुपे  राम मिलयलहुँ  ॥
युग  चारि  परताप  उजागर  ।
शंकर स्वयंम  दया के सागर ॥
सूक्षम बिकट आ भीम रूप धारि ।
नैहि  अगुतेलोहूँ राम काज करि  ॥
मूर्छित लखन  बूटी जा  लयलहुँ  ।
उर्मिला  पति  प्राण  बचेलहुँ  ॥
कहलनि  राम उरिंग  नञि तोर ।
तू तउ भाई भरत  सन  मोर   ॥
अतबे कहि  द्रग  बिन्दू  बहाय  ।
करुणा निधि , करुणा चित लाय ॥
जय  जय  जय बजरंग  अड़ंगी  ।
अडिंग ,अभेद , अजीत , अखंडी ॥
कपि के सिर पर धनुधर  हाथहि ।
राम रसायन सदिखन  साथहि ॥
आठो सिद्धि नो निधि वर दान ।
सीय मुदित चित  देल हनुमान ॥
संकट   कोन ने  टरै  अहाँ   सँ ।
के बलवीर  ने   डरै   अहाँ  सँ  ॥
अधम उदोहरन , सजनक संग ।
निर्मल - सुरसरि जीवन तरंग ॥
दारुण - दुख दारिद्र् भय मोचन ।
बाटे जोहि थकित दुहू  लोचन ॥
यंत्र - मंत्र  सब तन्त्र  अहीं छी ।
परमा नंद स्वतन्त्र  अहीं  छी  ॥
रामक काजे  सदिखन आतुर ।
सीता  जोहि  गेलहुँ   लंकापुर  ॥
विटप अशोक शोक बिच जाय ।
सिय  दुख  सुनल कान लगाय ॥
वो छथि  जतय , अतय  बैदेही ।
जानू  कपीस  प्राण  बिन देही  ॥
सीता ब्यथा  कथा सुनि  कान ।
मूर्छित अहूँ  भेलहुँ  हनुमान ॥
अरे    दशानन   एलो   काल  ।
कहि बजरंगी  ठोकलहुँ  ताल ॥
छल दशानन  मति  के आन्हर ।
बुझलक  तुच्छ अहाँ  के  वानर ॥
उछलि कूदी कपि लंका जारल ।
रावणक सब मनोबल  मारल  ॥
हा - हा  कार  मचल  लंका  में  ।
एकहि टा  घर बचल लंका में  ॥
कतेक कहू कपि की -,की कैल ।
रामजीक काज सब सलटैल  ॥
कुमति के काल सुमति सुख सागर ।
रमण ' भक्ति चित करू  उजागर ॥
               ||  दोहा ||
चंचल कपि कृपा करू , मिलि सिया  अवध नरेश  ।
अनुदिन अपनों अनुग्रह , देबइ  तिरहुत देश ॥
सप्त कोटि महामन्त्रे ,  अभि मंत्रित  वरदान ।
बिपतिक  परल पहाड़ इ , सिघ्र  हरु  हनुमान ॥


          ॥  दुख - मोचन  हनुमान   ॥ 

  जगत  जनैया  , यो बजरंगी  ।
  अहाँ  छी  दुख  बिपति  के संगी
  मान  चित  अपमान त्यागि  कउ ,
  सदिखन  कयलहुँ  रामक काज   । 
   संत  सुग्रीव  विभीषण   जी के,   
   अहाँ , बुद्धिक बल सँ  देलों  राज  ॥ 
   नीति  निपुन  कपि कैल  मंत्रना  
   यौ  सुग्रीव  अहाँ  कउ  संगी  
                   जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

  वन अशोक,  शोकहि   बिच सीता  
  बुझि  ब्यथा ,  मूर्छित  मन भेल  ।
  विह्बल   चित  विश्वास  जगा  कउ
  जानकी     राम     मुद्रिका    देल  ॥
  लागल  भूख  मधु र फल खयलो  हूँ
  लंका   जरलों   यौ   बजरंगी   ॥
                   जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

   वर  अहिरावण  राम लखन  कउ
   बलि प्रदान लउ  गेल  पताल  ।
   बंदि  प्रभू   अविलम्ब  छुरा कउ
   बजरंगी कउ  देलौ कमाल  ॥
   बज्र  गदा  भुज बज्र जाहि  तन 
   कत  योद्धा मरि  गेल  फिरंगी  , 
                   जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

 वर शक्ति वाण  उर जखन लखन , 
 लगि  मूर्छित  धरा  परल निष्प्राण । 
 वैध   सुषेन  बूटी   नर  आनल  ,
 पल में पलटि  बचयलहऊ प्राण  ॥ 
 संकट   मोचन  दयाक  सागर , 
 नाम  अनेक ,  रूप बहुरंगी  ॥ 
             जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

नाग फास  में  बाँधी  दशानन  , 
राम   सहित  योद्धा   दालकउ । 
गरुड़  राज कउ   आनी  पवन सुत  ,
कइल    चूर    रावण   बल  कउ 
जपय     प्रभाते   नाम अहाँ  के ,
तकरा  जीवन  में  नञि  तंगी   ॥ 
                     जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

ज्ञानक सागर ,  गुण  के  आगर  ,
शंक   स्वयम   काल   के  काल  । 
जे जे अहाँ  सँ  बल बति यौलक ,
ताही   पठैलहूँ   कालक  गाल   
अहाँक  नाम सँ  थर - थर  कॉपय ,
भूत - पिशाच   प्रेत    सरभंगी   ॥ 
                      जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ---- 

लातक   भूत   बात  नञि  मानल ,
पर तिरिया लउ  कउ  गेलै  परान  । 
कानै  लय  कुल नञि रहि  गेलै  , 
अहाँक  कृपा सँ , यौ  हनुमान  ॥ 
अहाँक भोजन आसन - वासन ,
राम नाम  चित बजय  सरंगी  ॥ 
                 जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

सील   अगार  अमर   अविकारी  ,
हे   जितेन्द्र   कपि   दया  निधान  । 
"रावण " ह्र्दय  विश्वास  आश वर ,
अहिंक एकहि  बल अछि हनुमान  ॥ 
एहि   संकट   में  आबि   एकादस ,
यौ   हमरो   रक्षा   करू   अड़ंगी  ॥ 
                    जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

  ||  हनुमान  बन्दना  ||

जय -जय  बजरंगी , सुमतिक   संगी  -
                       सदा  अमंगल  हारी  । 
मुनि जन  हितकारी, सुत  त्रिपुरारी  -
                         एकानन  गिरधारी  ॥ 
नाथहि  पथ गामी  , त्रिभुवन स्वामी  
                      सुधि  लियौ सचराचर   । 
तिहुँ लोक उजागर , सब गुण  आगर -
                     बहु विद्या बल सागर  ॥ 
मारुती    नंदन ,  सब दुख    भंजन -
                        बिपति काल पधारु  । 
वर  गदा  सम्हारू ,  संकट    टारू -
                  कपि   किछु  नञि   बिचारू   ॥ 
कालहि गति भीषण , संत विभीषण -
                          बेकल जीवन तारल  । 
वर खल  दल मारल ,  वीर पछारल -
                       "रमण" क किय बिगारल  ॥ 

                ||  हनुमान - आरती  ||

आरती आइ अहाँक  उतारू , यो अंजनि सूत केसरी नंदन  । 
अहाँक  ह्र्दय  में सत् विराजथि ,  लखन सिया  रघुनंदन   
             कतबो  करब बखान अहाँ के '
            नञि सम्भव  गुनगान  अहाँके  । 
धर्मक ध्वजा  सतत  फहरेलौ , पापक केलों  निकंदन   ॥ 
आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---
          गुणग्राम  कपि , हे बल कारी  '
          दुष्ट दलन  शुभ मंगल कारी   । 
लंका में जा आगि लागैलोहूँ , मरि  गेल बीर दसानन  ॥ 
आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---
         सिया  जी के  नैहर  , राम जी के सासुर  '
         पावन  परम ललाम   जनक पुर   । 
उगना - शम्भू  गुलाम जतय  के , शत -शत  अछि  अभिनंदन  ॥ 
आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---
           नित आँचर सँ  बाट  बुहारी  '
          कखन आयब कपि , सगुण  उचारी  । 
"रमण " अहाँ के  चरण कमल सँ , धन्य  मिथिला के आँगन ॥ 
 आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---


रचनाकार -
रेवती रमण झा "रमण "
मो no - 91 9997313751

हम मूर्ख समाजक वाणी छी

|| हम  मूर्ख  समाजक वाणी छी || 
हम  मुर्ख समाजक वाणी  छी  | 
ज्ञाता जन छथि सदय कलंकित 
हमहीं  टा    बस   ज्ञानी    छी || 
                     हम  मुर्ख ---  || 
रामचंद्र    के   स्त्री    सीता  
तकरो      कैल    कलंकित  | 
कयलनि डर सं अग्नि परीक्षा 
भेला    ओहो    शसंकित    || 
एक्कहि  ठामे  गना दैत  छी 
सुर   नर   मुनि  जे   ज्ञानी | 
हम कलंकित सब  के कयलहुँ 
देखू      पलटि     कहानी  ||  
बुद्धिक-बल   तन  हीन  भेल 
बस आप  नौने  सैतानी छी | 
                  हम  मुर्ख ---|| 
बेटा  वी. ए. बैल हमर अछि 
हम   फुइल    कय  तुम्मा  | 
नै  केकरो  सँ  हम  बाजै छी 
बाघ   लगै    छी    गुम्मा  || 
अनकर  बेटा   कतबो बनलै 
 रहलै       त         अधलाहे | 
अगले    दिन उरैलहुँ  हमहीं 
कतेक    पैघ     अफवाहे  || 
अपनहि मोने,अपने उज्ज्वल 
बस   हम   सब  परानी  छी | 
                   हम  मुर्ख ---  ||   
बाहर  के कुकरो  नञि पूछय 
गामक       सिंह       कहबी  | 
परक    प्रशंसा  पढ़ि  पेपर में 
मूँह    अपन     बिचकावी   || 
सदय इनारक फुलल  बेंग सन 
रहलों        एहन        समाज  |
आनक   टेटर  हेरि  देखय लहुँ 
अप्पन       घोलहुँ       लाज | | 
अधम मंच  पर बैसल हम सब 
पंडित  जन  मन  माणि  छी | 
                        हम  मुर्ख --- ||  
गामक    हाथी  के  लुल्कारी  
जहिना      कुकर     भुकय  | 
बाहर   भले  देखि कय हमर 
प्रभुता    पर   में     थुकय  || 
अतय   सुनैने  हैत ज्ञाण की 
वीघर  छी   कानक     दुनू  |
 कोठी  बिना अन्न केर बैसल 
ओकर     मुँह    की    मुनू  || 
हम  आलोचक   पैघ सब सँ 
हमहीं     टा      अनुमानी  || 
                 हम  मुर्ख --- || 
माली  पैसथि  पुष्प  वाटिका 
सिंचथि        तरुवर       मूल | 
पंडित   पैसथि  पुष्प  वाटिका 
लोढथि      सुन्दर      फूल  | | 
लकरिहार  जन  लकड़ी  लाबय 
चूइल्ह       जेमबाय      गामें  |
 सूअर    पैसय    पुष्प  वाटिका 
विष्ठा         पाबय       ठामे  || 
जे अछि  इच्छु  जकर तेहन से 
दृष्टि      ताहि    पर     डारय | 
मूर्खक  हाथ  मणि अछि पाथर 
ज्ञानी       मुकुट      सिधारय  || 
"रमण " वसथु जे एहि समाज में 
मर्दो    बुझू      जनानी      छी  | 
हम   मुर्ख समाजक  वाणी  छी 
                       हम  मुर्ख ---|| 
 रचनाकार -:


रेवती रमन झा "रमण " 
गाम- जोगियारा पतोंर दरभंगा ।
मो - 9997313751 

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

गजल

प्रेम कलशसँ अमरित अहाँ पीया तँ दिअ
मुइल जीवन फेरसँ हमर जीया तँ दिअ 
   
काल्हि नै बाँचत शेष जीवन केर किछु
एकटा सुन्नर सन अपन धीया तँ दिअ
 
रहअ दिअ हमरा आब चाही प्राण नै 
मैरतो  बेरीया अपन हीया तँ दिअ

प्राण बिनु देहक हाल देखू आब नै
बाटपर ओगरने आँखिकेँ सीया तँ दिअ 

जाइ छी ‘मनु’ पाछूसँ  नै टोकब अहाँ 
अपन हाथसँ काठी कने दीया तँ दिअ
(बहरे हमीम, मात्रा क्रम : २१२२-२२१२-२२१२)
जगदानन्द झा 'मनु'

सोमवार, 15 मई 2017

भक्ति गजल

हम्मर अँगना मैया एली
गमके चहुदिस अरहुल बेली

धन हम छी धन हम्मर अँगना 
मैया जतए दर्शन देली

आबू बहिना संगी हम्मर 
मैया संगे    सामाँ खेली 

जे किछू अछि एखन हमरा ल'ग 
ओ  सबटा  मैया   द'क  गेली

बड़ भागसँ 'मनु' भेटल अवसर 
मैया अप्पन   चरण लगेली

(सब पाँतिमे आठ-आठटा दीर्घ, मकताक दोसर पाँतिमे दूटा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानक छूट लेल गेल अछि)
जगदानन्द झा 'मनु'