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शनिवार, 6 अगस्त 2016

गजल

बनेलहुँ अपन हम जान अहाँकेँ
जँ कहि लाबि देबै चान अहाँकेँ

हँसीमे सभक माहुर झलकैए
सिनेहसँ भरल मुस्कान अहाँकेँ

कमल फूल सन गमकैत अहाँ छी
जहर भरल आँखिक बाण अहाँकेँ

पियासल अहाँ बिनु रहल सगर मन
सिनेहक तँ चाही दान अहाँकेँ

करेजक भितर 'मनु' अछि कि बसेने
रहल नै कनीको  भान अहाँकेँ 
(मात्रा क्रम ; १२२-१२२-२१ १२२)
(सुझाव सादर आमंत्रित अछि)
© जगदानन्द झा 'मनु' 

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

बेटाक बाप


        "ई जे भरि दिन नेतागिरीमे लागल रहै छी कि एहिसँ पेट भरत? चलू अप्पन पेटक आगि तँ जेना तेना मिझा लेब कनिक बेटीक ब्याहो केर चिंतासँ तँ डरू । भेल तँ ३-४ वर्खमे ओकरो ब्याह करए परत, ओहु लेल १०-१५ लाख रूपैया चाही ।"
         "केहेन गप्प करै छी ? आब ओ ज़माना नहि रहलै । बेटा आ बेटीमे फराके की? जेना बेटाक पढ़ाइ-लिखाइ लालन पालनमे ख़र्चा तेँनाहिते बेटीमे । बेटी बेटासँ कतौ कम नहि । आ हम्मर बेटी तँ लाखोमे एक अछि ।"
         "ई अहाँ बुझै छीयै मुदा समाजमे दहेज लोभी बेटाक बाप नहि ।"
© जगदानंद झा 'मनु' 

रभसल

"धूर भौजी ! अहुँ बड़ रभसल जकाँ किनादन करैत रहै छी ।"
"यौ लाल बाबु रहै दियौ, जँ हम एना रभसल जकाँ नहि करितौँ तँ, ई जे कोरामे भतिजाकेँ लदने रहै छी से मनोरथ अहाँक भैया बुते तँ रहिए गेल रहिते ।"
© जगदानंद झा 'मनु' 

मामासार (बीहनि कथा)


मामा आ सार पर केखनो विश्वास नहि करी । इतिहास गबाह अछि । नहि कोनो मामा भगिना के भेलै आ नहि कोनो सार बहिनोइ के भेलै । कंस, शकुनि, बंगाल रियासत केर बादशाह सिराजुदौल्लाक सार(मिर कासीम आ मिर साकी) , जायचन्द आ एहेन एहेन कतेको मामा आ सार घर-घरमे नुकेएल अछि । 
एकटा पूरान फकरा छै, जखन गिदड़के मौत अबै छै तँ ओ शहर दिस भागैत अछि । एहि फकराके आब एना बूझल जेए, जखन कोनो मनुखके बिपैत आबै बला होइ तँ ओ सासुर क भगैए वा सारके पोसैए । सार आ गहुमन साँपमे कोनो फराक नहि । ई दुनू कखन डैस लेत बिधने बुझता । आ जूएस गहुमन भेला मामा । (ई खालि हमर मंतव्य अछि जरूरि नहि जे अहुँ एकरा मानी । मामा अहाँके सार अहाँके जीवन अहाँके मर्ज़ी अहाँकेँ । हम तँ मात्र इतिहास आ अपन मंतव्य शेयर केलहुँ । 😊😊😊)
© जगदानंद झा 'मनु' 

गजल

साँप चलि गेल लाठी पीटे रहल छी

बाप मुइला पछाइत भोजक टहल छी

 

पानि नै अन्न कहियो जीवैत देबै

गाम नोतब सराधे लोकक कहल छी

 

पानि आँखिक सभक दुनियामे मरल अछि

लाज  भरना द हम ताड़ीमे बहल छी

 

केकरा हम हृदय अप्पन खोलि कहबै

लोक खातिर  अनेरे धेने जहल छी

 

सुनि हम्मर गजल जग पागल बुझैए

दर्द मुस्कीसँ झपने ‘मनु’ सब सहल छी

 

(बहरे असम, मात्राक्रम  2122-1222-2122)

© जगदानन्द झा 'मनु'