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बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

अन्हार



अहाँ सोचैत की रहैत छी ?
हऽम !
हम सोचैत नहि छी
हम देखैत छी
हम दुनीयाँकेँ बुझैक प्रयत्न कए रहल छी
कि हमहूँ एहि दुनीयाँक हिस्सा छी?
कि हम देशक हिस्सा छी ?
कि हम एहि राजक हिस्सा छी ?
कि हम एहि समाजक हिस्सा छी ?
कि हम अपन परिवारक हिस्सा छी ?
नहि ! नहि ! नहि ! नहि !
तँ फेर हमर अस्तित्व की अछि ?
हम एहिठाम किएक एलहुँ ?
हम एहिठाम किएक छी ?
हम एहिठाम की कए रहल छी?
किछु नहि
पत्ता नहि
नहि जनैत छी
किछु नहि
नहि ! नहि ! नहि ! नहि !
किछु नहि
किछु नहि अर्थात शून्य 
शून्य
अन्हार
नाकामयाबी
अलगाव ।

एहि जिनगीक कोन मोल
जकर किछु सार्थकता नहि
जन्म लेनाइ
अभाबमे पोसेनाइ
सपनाक गरदैन घोटनाइ
माथपर जिमेदारी आ चिन्ताक बोझ
असफलता
शून्यता
फेर एक दिन
सभ चिन्तासँ मुक्त भऽ
लुप्त भऽ जेनाइ
काल्हि
जाहिखन एकटा नव भोर होएत
केकरो मोनमे इआद नहि
केकरो मुँहमे नाम नहि
इतिहासक पन्नामे कथा नहि
फेर एकटा शून्य
घोर अन्हार
अपार अन्हारक साम्राज्य
जाहिठाम
आन कि अपनो सभ इआद नहि राखत ।

की इहे जिनगी छी ?
एकरे नाम जीवन अछि ?
इहे मनुक्खक जीवन पाबैक हेतु
चौरासी लाख योनी पार करए परैक छैक
एहिठाम की भेटल
खाली शून्य
घोर अपार अन्हार
यदि हाँ
इहे जीवन अछि
इहे जीवनक सार अछि
तँ, हे भगवती
हमरापर दया करू
हमरापर कृपा करू
हमरा अहाँक ई जीवन नहि चाही
हमरासँ नीक तँ कीड़ा मकोड़ा
मानलहुँ कि ओकरो लग बड्ड शून्य छैक 
घोर अन्हार छैक
मुदा
अभाब नहि छै
असफलता नहि छै
निराशा नहि छै
चिन्ता नहि छै
माथपर बोझ नहि छै
ओ अपनाकेँ तुक्ष नहि बुझै छै
आर
फेर ओकरा
एकटा नव उच्च जीवन पाबैक आशो तँ छैक ।

हमरा लग की अछि ?
किछु नहि
खाली आर खाली घोर अन्हार
हम जन्म लै छी
आ ओकरा तियाइग कए
एकटा अनन्तमे हरा जाइ छी
काल्हि
हमर नामो धरि नहि रहि जाइए
हे भगवती
कि हमरा सभकेँ
एहने जीवन भोगैक लेल
जीवन देने छी
तँ कृपा कऽ अपन जीवन लए लिअ
हमरा सभकेँ एहेन जीवन नहि चाही
कमसँ कम
हमरा तँ बिल्कुल नहि
हमरापर दया करू भगवती
अपन ई जीवन लऽ लिअ ।
 
@ जगदानन्द झा ‘मनु’

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

चलू मिथिला



घुइर चलू घुइर चलू मैथिल
अपन मिथिला देश
बाट जोहै छथि माए मिथिला,
आँचर मे लऽ स्नेहक सनेश।
उजइर पुजइर गेल छै ओकर
सभटा खेत पथार
गाम घर सभ भक्क पड़ल छै
डिबिया बाती नै जरै छै
देख ई दशा
माए मिथिला के फाटै छै कुहेश ।...
जाहि धरा पर बहैत अछि
सात सात धार
आई ओहि धरा के छाती अछि सुखाएल
खाए लेल काइन रहल अछि नेन्ना भुटका
माइर रहल छथि माए मिथिला चित्कार ।
देखू देखू हे मिथिलावाशी केहन आएल काल
देब भूमि तपोभूमि
आई बनल आतंकक अड्डा
जतऽ कहियो पशु पंछियोँ वाचैत छल शास्त्र
आई ओहि धरा सँ सुना रहल अछि बम बारुदक राग ।
हे मैथिल!
दोसरक नगरी रौशन केलौँ
छोइड़ अपन देश
आबो जँ नै आएब मिथिला
तऽ भऽ जाएत मिथिला डीह 
कुहैर कुहैर क कहैथ माए मिथिला ई..
चलू चलू यौ मैथिल अपन मिथिला देश
फेर सँ बनेबै ओहने मिथिला
देखतै देश विदेश..जय मिथिला
   :गणेश कुमार झा "बावरा"

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

हकार (ओमप्रकाश झा) ८१म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक

हकार (ओमप्रकाश झा)
८१म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक आयोजन देवघरमे २२ मार्च २०१४ शनि दिन भऽ रहल अछि। ई आयोजन देवघरमे बमपास टाउन स्थित "बिजली कोठी" नम्बर ३ मे संध्या ५ बजे सँ २२ मार्च २०१४ केँ शुरू भऽ कऽ २३ मार्चक भोर धरि हएत। अहाँ सभ कथाकार लोकनि सादर आमंत्रित छी।

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

गजल

हेतै खतम गुटबाज बेबस्था
बनतै सभक आवाज बेबस्था

भेलै बहुत चीरहरणक खेला
राखत निर्बलक लाज बेबस्था

देसक आँखिमे नोर नै रहतै
सजतै माथ बनि ताज बेबस्था

मिलतै सभक सुर ताल यौ ऐठाँ
एहन बनत ई साज बेबस्था

"ओम"क मोन कहि रहल छै सबकेँ
करतै आब किछु काज बेबस्था

दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-लघुदीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घदीर्घ-दीर्घ प्रत्येक पाँतिमे एक बेर।

२२२१-२२१२-२२

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

गजल



प्रेम कलशसँ अमृत अहाँ पीया तँ दिअ
मुइल जीवन फेरसँ हमर जीया तँ दिअ

काल्हि नै बाँचत शेष जीवन केर किछु
एकटा सुन्नर अपन सन धीया तँ दिअ

रहअ दिअ हमरा आब चाही प्राण नै
मैरतो  बेरीया अपन हीया तँ दिअ 

प्राण बिनु देहक हाल देखू आब नै
बाटपर ओगरने आँखिकेँ सीया तँ दिअ

जाइ छी ‘मनु’ पाछूसँ नै टोकब अहाँ
अपन हाथसँ काठी कनी दीया तँ दिअ

(बहरे हमीम, मात्रा क्रम- २१२२-२२१२-२२१२)
जगदानन्द झा ‘मनु’         

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

गाम बदलि रहल अछि



गाम बदलि रहल अछि
समाँग बदलि रहल अछि
छ्नीक सुखक खातीर
लोक चाम बदलि रहल अछि।

गामक फूसक घर
पक्कामे बदलि रहल अछि
शहरक पक्का मकान
टावरमे बदलि रहल अछि।

टीभी रेडिओ
मोबाईलमे बदलि रहल अछि
ब्याहक पबित्र बंधन
लिव इन रिलेशनशिपमे बदलि रहल अछि।
अख़बार आबि गेल नेटपर
चूल्हा गेएशमे बदलि रहल अछि।

पाइ पाइकेँ फरिछोँटमे
भाइ भाइकेँ बदलि रहल अछि
रुपैया नहि आब चौब्बनी अठ्ठनीमे
सिनेह बदलि रहल अछि।

परिभाषा आब सम्बन्धकेँ
खर्चामे बदलि रहल अछि
पिता पुत्रक प्रेम सबहक सोँझा
सराधमे बदलि रहल अछि।

मुखिया बदलि रहल अछि
सरपन्च बदलि रहल अछि
नहि कोनो गामक
समस्या बदलि रहल अछि।

माए कनै छथि एखनो
आँचर तर मुँह नुका कए
अछैते बेटा पुतहु बिनु
नहि हुनक हाथ झरकेनाइ बदलि रहल अछि।

बापक आँखिक नोर
एखनो ताकि रहल अछि
आबि बनेए कियो लाठी
नहि हुनक सपना बदलि रहल अछि।

@जगदानन्द झा ‘मनु’    

रविवार, 22 दिसंबर 2013

गजल

सौंसे सिरा हाटपर  खा तीमन घरक तीत लगलै
सुलबाइ बाबूक गप्पसँ ससुरक वचन हीत लगलै

अप्पन घरक खेत आँगनमे खटब बुड़िबक सनककेँ
परदेशमे नाक अप्पन रगड़ैत नव रीत लगलै

आदर्श काजक चलब गामे-गाम झंडा लऽ आगू
माँगेत घर भरि तिलक बेटा बेरमे जीत लगलै

प्रेम तँ बदलै सभक बुझि धन बल अमीरी गरीबी
निर्धन अछूते रहल धनिकाहा कते मीत  लगलै

माए बहिन केर बोलसँ सभकेँ लगै कानमे झ’र
सरहोजि साइरक गप ‘मनु’केँ मधुरगर गीत लगलै

(बहरे मुजस्सम वा मुजास, मात्रा क्रम – २२१२-२१२२/२२१२-२१२२)
जगदानन्द झा ‘मनु’ 

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

गजल

डूबने बिनु बुझब कोना निशा की छै
प्रेम बिनु केने कि जानब सजा की छै

बसि क’ धारक कात हेलब सिखब कोना
आउ देखी कूदि एकर मजा की छै

नोकरी कय नै कियो धन कमेलक बड़
अपन मालिक बनु तँ एहिसँ भला की छै

आइ अप्पन बलसँ पीएम बनतै ओ
हारि झूठ्ठे ढोल पीटब हबा की छै

रोडपर कोनो करेजक परल टुकड़ा
ओहि छनमे ‘मनु’सँ पुछबै दया की छै 

(बहरे कलीब, मात्रा क्रम, २१२२-२१२२-१२२२)
जगदानन्द झा 'मनु'

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

गजल

आब चाही बस अहाँ केर मुस्कीटा
नै मरब पीने बिनु प्रेम चुस्कीटा

जे अहाँ बजलौं करू ओकरो पूरा
की अहूँ भेलौं खली बम्म फुस्कीटा

नै कटाबू नाक आबू सभक सोंझाँ
की तरे-तर रहब मारैत भुस्कीटा

डर लगैए भीड़मे नै निकलु बाहर
देख टीभी बसि घरे करब टुस्कीटा

मनु दखेलौं सभक अपनो कनी देखू
बिसरि अप्पन काज नै बनब घुस्कीटा

(बहरे कलीब, मात्रा क्रम – २१२२-२१२२-१२२२)