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शनिवार, 30 अगस्त 2025

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीक उपन्यास मनसरबीक समीक्षा


 समीक्षक - जगदानन्द झा ‘मनु



अंतरजातीय प्रेमपर आधारित, डॉ. कैलाश कुमार मिश्र लिखित उपन्यासमनसरबीमैथिली साहित्य खास कय मैथिली उपन्यास लेल एक गोट अनुपम धरोहर केर रूपमे, मैथिली साहित्य अनुरागी लोकनीक लेल साबित होएत। मिथिला समाजक ताना-बाना, परिवेश, कुरीति, सामाजिक विसमता, नारीक स्थिति अस्तीत्व, धनिक वर्गक द्वारा गरीब सभपर केएल गेल अमानवीय शोषण, धन दैहिक शक्तिक दुरुपयोग, बहु बेमेल ब्याह, वासना, प्रेम, निश्छल ईश्वरीय प्रेम, कमोबेश मानवीय संवेदनाक सभ पक्ष केर अपनामे समेटनेमनसरबीमैथिली साहित्यक एकटा उच्चय कोटिक उपन्यास अछि।  

मनोरंजन सहित लेखक सम्पूर्ण पोथीमे रोचकता कौतुहलता बनबैमे पूर्ण रुपसँ सफल भेल छथि। पाठक एकबेर पोथीकेँ पढ़व शुरू केलाक बाद बिना पुरा पढ़ने नहि रहि सकैत छथि।  उपन्यासक भाषा जनमानस के कंठमे बसल सोझ, सरल चित्रात्मक अछि। पढ़ैकालमे सिनेमाक परदा जकाँ मानस पटलपर एक-एकटा दृश्य चलैमान लगैत अछि। आँगन-दलान, खेद-खड़िहान, धूल-माटि, भूख-पिआस, प्रेम-विरह सभ आँखिक आगाँ साक्षात देखाइ लगैत अछि। संवाद स्वाभाविक लयात्मक अछि।मनसरबीउपन्यासमे  समकालीन मिथिलाक ग्रामीण जीवनक  सजीव चित्र जेना संवेदना, यथार्थ लोक-संस्कृतिक केर यथार्थ दर्शन होइत अछि।

मनसरबी, राघव बुलकी केर निश्छल प्रेमक अनुपम प्रेम कथा अछि। राधव संस्कारी, पढ़ल लिखल, बुझनूक, सभकेँ संग लय चलै बला एकटा गामक गरीब ब्राह्मण घरक बेटा अछि। ओतय बुलकी बहुत गरीब गामक अमात घरक बेटी अछि। ब्याह भेला पछाइतो बुलकी अपन सासुर घरबालाकेँ छोड़ि नैहरमे अपन बुढ़ गरीब माय-पापक संगे रहि रहल अछि।  गाम घरक सभ काज जेना माल-जालकेँ सेवा, घास करब, बौइनी करब सभ काज करैत अछि। अनुपम सुनरि देह मोनक मालकिन बुलकी। अपना सुन्नरता आकर्षण केर कारण गामक कतेको लोकक नजरिमे बसैक संगे धनिक दवंग राजकांतक बलात्कार केर सजा सेहो पबैत अछि। राघव बुलकीक प्रेम जेना, सुग्गा-मैनाक प्रेम। जेना हिर रांझाक प्रेम। जेना वसंत प्रकृति केर प्रेम। जेना सुर बाँसुरीक प्रेम। निश्छल, अलौकिक, प्रेमक पूर्णता, मधुर-मिलन भेला बादो ग्राम्य जीवन समाजक बुनल ताना बाना केर बुझैत एक रहितो समाजक नजरिमे एक नहि भय सकला।  उपन्यासकार अपन उपन्यासमें दुनूक यौवन, रुप, चरित्र, प्रेम, विरहकेँ एहेन सुन्नर शब्दक मालामे गूँथने छथि जेकर प्रशंसा केनाइ सूर्यकेँ दिया देखबय जकाँ होएत।

उपन्यास राघव बुलकी संगे संगे बहुत रास आरो कतेको पात्र चरित्र कथाकेँ अपनामे समटने अछि। एक तरफ़ राघव बुलकी, दू टा अलग अलग जातिकेँ होबाक कारणे समाजिक रूपसँ एक नहि भ सकल ओतय दोसर दिस नैना आ नन्द एक दोसरापर सर्वत्र समर्पण कय देला बादो सामजक सामने एक नहि भ पेला किएक तँ दुनू एक्के गोत्रसँ रहथि। नेना नन्दक प्रेमकेँ अपन करेजामें समटने नहि चाहितो एकटा द्वितीवरसँ ब्याहल जाइ छथि आ किछुए समयमे नन्दक वियोककेँ नहि सहि परलोक बासी भ जाइत छथि।

लखरु ख़लीफ़ा एक टा नामी पहलवान अपन ताक़त के जोरसँ समाजमे अन्यायके बले बहुते धन कमाइए। मुदा अंत काल गूँह गिजैत धरपरिवार समाज सभसँ दूर नरक केर यातना भोगैत अछि।

उपन्यासक एक-एकटा पात्र मानु जीवन्त हुए। शब्द आ दृश्यक अनुपम प्रस्तुति कैलाशजी कयने छथि। हुनक एहि उपन्यासक लेखनीमें एकटा आकर्षण अछि जे पाठककेँ पूरा उपन्यास पढ़ें लेल उत्साहित करैत अछि।

हाँ किछु वर्तनी सम्बंधित दोष अछि, जेकरा प्रकाशन हाउस आँगाक एडिशनमे ठीक कय लेता इ उम्मीद अछि।

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीकेँ हुनक एहि अनुपम कृतिकेँ लेल बहुत बहुत बधाइ संगे  माय भगवतीसँ प्रार्थना कि अपने एनाहिते मैथिली साहित्यकेँ समृद्धि करैमे सदति लागल रही।

 

विधा : उपन्यास

पोथीक नाम : मनसरबी

भाषा :  मैथिली

लेखक: डॉ० कैलाश कुमार मिश्र

प्रकाशक :  मैत्रेयी प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष: २०२५

मूल्य : ₹ २००/-

मंगलवार, 15 जुलाई 2025

गजल

आबि जायब हमर अंतिम बिदाई पर

फूल दय देब हाथसँ मुँह दिखाई पर 

 

नोर नहि देखलक कष्टक कियो कखनो

आँखि सबहक  हमर हाथक मिठाई पर 

 

पोसलौं पेट  जीवन भरि कमा हम मरि

घेंट लेलक कटा हँसि ओ  फिदाई पर

 

आइ दिन धरि तँ सब सहिते छलौं ई हम

आबि जिद गेल पापीकेँ मिटाई पर

 

केकरा ‘मनु’ कहत आ के सुनत एतअ

बड़ हँसै छैक सब आनक पिटाई पर


(बहरे मुशाकिल, मात्राक्रम - 2122-1222-1222)

✍🏻जगदानन्द झा ‘मनु’

 


गुरुवार, 5 जून 2025

बीहनि कथाक कथा कहानी संगे

हिन्दी साहित्यमे पहिल कहानी किछु लोक “रानी केतकी की कहानी” केँ मानैत छथि। ई कथा सैयद इंशाअल्लाह खान द्वारा 1803 या 1808 मे लिखल गेल छल। ई कहानी मध्यकालीन भारतक प्रेमकथा अछि। कथामे रानी केतकी आ राजकुमार वीरसेनक प्रेम कहानी कहल गेल अछि। ओतहि किछु लोक किशोरी लालक “इन्दुमती” केँ तँ किछु लोक माधवरावक “एक टोकरी भर मिट्टी” केँ पहिल कहानी मानैत छथि। मुदा हिन्दी कहानीक असली विकास प्रेमचंदक कहानी आ हुनक समयसँ भेल।

प्रेमचंदक जीवनकाल 1880 सँ 1936 छल। 1803 सँ पहिने 'कहानी' शब्दक प्रयोग केओ नहि कएने छल। तँ की 1803 वा प्रेमचंदक युगसँ पहिने कोनो कहानी नहि छल? वेद, उपनिषद आ पुराणमे हजारो कहानीक वर्णन अछि, मुदा ओकरा 'कथा' कहल जाइत छल; जेना पंचतंत्रक कथा, जे 300 ई.पू. पहिने लिखल गेल छल।

वर्तमान हिन्दी साहित्यमे कहानीक अर्थ अंग्रेजीक Short Story  सँ लेल जाइत अछि। मुदा हिन्दी साहित्यमे आइ-काल्हि मुख्य कहानीसँ अलग, छोट-छोट कहानी करीब तीन-चारि सय शब्दमे खूब लिखल जा रहल अछि, जेकर नामकरण हिन्दी साहित्यमे 'लघुकथा'क रूपमे भेल अछि। किछु लोक एहि लघुकथाक तुलना मैथिलीक 'बीहनि कथा'सँ करैत छथि, जखन कि मैथिलीमे बीहनि कथा आ लघुकथा दुनू स्वतंत्र रूपसँ लिखल जा रहल अछि।

आब मैथिली कथाक वर्गीकरणकेँ हम सभ एहि रूपमे देख सकैत छी:

  • बीहनि कथा: कथ्य वा संवाद जेकर मुख्य अंग होइत अछि, एक दृश्यमे संपूर्ण कथा संपन्न होइत अछि, आ शब्द सीमा अधिकतम एक सय धरि होए तँ बेसी नीक।
  • लघुकथा: संवादक संगहि भूमिका अथवा बिना संवादक सेहो, एकसँ दू दृश्यमे संपन्न होबाक चाही; एकर शब्द सीमा करीब पाँच सय धरि देखल जाइत अछि।
  • कथा: जकरा हिन्दी साहित्यमे 'कहानी' कहल गेल अछि। मैथिली साहित्यमे कथा वा कथा संग्रहक खूब रचना भेल अछि।
  • दीर्घ कथा: अर्थात् नमहर  कथा; जाहि ठाम विस्तारसँ व्याख्या कए रचना कएल गेल होए। ई एतेक नमहर होइत अछि जे चारि-पाँच टा कथासँ एकटा पोथीक निर्माण भ’ सकैत अछि।

 

आब कने गप्प करैत छी 'बीहनि कथा'क संबंधमे –

बीहनि कथा नव विधा होइतो, आइ ई कोनो तरहक परिचय लेल मोहताज नहि अछि। मैथिलीमे नित्य नव-नव बीहनि कथा आ बीहनि कथाक पोथी लिखल जा रहल अछि। हम एकर इतिहास आ उत्पतिक संबंधमे एतय नहि कहब, मुदा एतवा कहबामे कोनो हर्ज नहि जे बीहनि कथाक स्थापना आ विकास लेल मुन्नाजीक (मनोज कर्ण) भगीरथि योगदानकेँ नहि बिसरल जा सकैत अछि। वर्तमानमे मैथिलीक बीहनि कथाकार सभ दुनियाक बड़का-बड़का भाषाकेँ एहि विधा दिस सोचबा लेल विवश कए देलन्हि अछि। अंग्रेजीमे एकर नामकरण अथवा भाषांतर 'सीड स्टोरी' (Seed Story) कहि भेल अछि। हिंदी आ अंग्रेजीमे जकर कोनो स्थान नहि छल, ओहेन एकटा नव विधाक अग्रज मैथिली साहित्य अछि आ ओ विधा थिक, 'बीहनि कथा'। किछु लोक बीहनि कथा आ लघुकथामे फराक नहि कए पाबैत छथि, मुदा दुनूमे बहुत फराक अछि। बीहनि अर्थात् बीआ (बीज)। तेनाहिते मोनक विचारक बीआ, जे कखनो कतौ फूटि सकैत अछि। विचारक एकटा एहेन बीहनि (बीज) जे लोकक करेजाकेँ स्पर्श करैत, मस्तिष्ककेँ सोचबा लेल विवश कए दए। बीहनि कथाक आवश्यकता समयक संग जरुरी अछि। जेना एक समयमे पाँच दिनक क्रिकेट मैचक प्रचलन छल, ओकर बाद आएल वन-डे क्रिकेट आ आजुक समयक माँग अछि ट्वेन्टी-ट्वेन्टी। तेनाहिते एखुनका समय बीहनि कथाक अछि। बीहनि कथा कोना लिखबाक चाही आओर एकरामे की-की गुण होबाक चाही? संक्षेपमे कही तँ एकटा श्रेष्ठ बीहनि कथामे नीचाँ लिखल गुण होबाक चाही –

  • सम्पूर्ण कथा मात्र एकटा दृश्यमे होबाक चाही: जेना नाटकक मंचन मंच पर होइत अछि आ ओहिमे कतेको दृश्य भ' सकैत अछि, मुदा बीहनि कथाक कथ्य आ कथा दुनू एके दृश्यमे सम्पन्न भ' जेबाक चाही।
  • बीहनि कथाक मुख्य अंग संवाद अछि: संवाद जतेक सटीक आ नीक होएत, कथा ओतेके नीक हेतैक। शब्द चयन एहेन होबाक चाही जे पाठककेँ अर्थ बुझबा लेल सोचय नहि पड़न्हि। जे हम कहय चाहैत छी, ओ तुरन्त पाठकक मानस-पटल पर उतरि जाए।
  • कथाक गप्प पाठकक करेजाकेँ छूबि जाए: पढ़लाक बादो ओ करेजामे दस्तक दैत रहन्हि। कथाक परिणाम वा समाप्तिकेँ फरिछौँट नहि कए, ओकरा पाठकक विवेक पर छोड़ि देबाक चाही।
  • सार्थक उद्देश्य: जँ कथा कोनो सार्थक उद्देश्य वा गप्पकेँ प्रस्तुत करैमे सफल अछि आ समाजक कोनो नीक वा बेजाय पक्षकेँ देखा रहल अछि, तँ ओ सर्वोत्तम अछि।
  • कौतूहल आ अभिरुचि: पढ़बाक कालमे पाठकक मोनमे मनोरंजनक संग-संग रुचि आ कौतूहल बनल रहबाक चाही। एना नहि बुझना पड़बाक चाही जे ओ कोनो प्रवचन सुनि रहल छथि।
  • समसामयिकता: जँ सम्भव होए तँ इतिहास बनि गेल पात्र आ घटना सभसँ बचबाक चाही।

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’



शनिवार, 31 मई 2025

गजल

बड़ सुनल जस  माइ हे तोहर दुअरिया

जोड़ि कल अनलौं  सिनेहक हम गठरिया

 

सूप डाला कोनिया सभमे अरज छै

थाढ़ दुखलै गोरबा   फेरूँ नजरिया

 

दुख दुखीयाकेँ हरै   परमेश्वरी तूँ

माइ हमरे बेरिया मुनलअ किबरिया

 

दिन छये देने छलौं शोभा अपन जे

फेर दर्शन दिअ अहाँ हम छी भिखरिया

 

मोन टूटल जाइए  छल देह टूटल

‘मनु’ तकै छै माइकेँ सगरो नगरिया

 

(बहरे रमल, मात्राक्रम 2122-2122-2122)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 

 


मंगलवार, 13 मई 2025

रुबाइ

जीवन मृत्युकेँ छोर तोहर हाथमे

कठपुतली इ जग डोर तोहर हाथमे

हम सरनागत एलौं तोहर सरनमे

सगरो कष्टक तोड़ तोहर हाथमे

             ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

रविवार, 11 मई 2025

रुबाइ


जिनका देलौं करेजा वेपारी

मोनसँ खलेलनि जनि हमर लाचारी

हम रहि सिधा साधा सज्जन बेचारी

पहुँचल फेरल बड़ पैघ खेलाड़ी

                  ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


शनिवार, 26 अप्रैल 2025

रुबाइ

हे कृष्ण फेर अवतार एकबेर लिअ 

पापी कुकरमी सभकेँ आबि घेर लिअ 

धरती अहाँक डूबि रहल अधर्ममे 

जतरा आबि एक बेर अपन फेर लिअ 

                ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 


बुधवार, 26 मार्च 2025

पोथी चर्चा, कविता आ गीत संग्रह- व्यथा




पोथीक नाम : व्यथा

विधा : कविता गीत संग्रह 

भाषा : मैथिली 

कवि/ लेखक: जगदानन्द झामनु

पोथी परिचय:  ‘व्यथाशीर्षक कविता-संग्रह जगदनानन्द झामनुद्वारा रचित कुल 34 गोट कविता 16 टा गीतक संकलन थिक। अधिकांश कविता मिथिलाक गौरव-गाथासँ लए कए महिलाक दशा पर चित्रित अछि। एकर अतिरिक्त किछु कविता आन आन विषयपर कविक भावोद्गार व्यक्त करैत अछि। संगहि गीतमे कविक अर्चनाक स्वर मुखरित भेल अछि। मिथिलाक गुणगान एकर अतीत आओर वर्तमानक बीच विरोधाभास विषयपर पहिल 14 टा कविता सुन्दर सुमधुर स्वरमे सजाओल गेल अछि। बाँकीक आन कविता सभ सेहो पाठकक मनोरंजन आ अपन माटि पानिकेँ यादि आ महत्वतासँ चित्रित करैत करेजामे एकटा मधुर कम्पन करैत अछि। 

मूल्य: 290 भा ₹ (संपूर्ण भारतमे डाक खर्च सहित, भारतसँ बाहर डाक खर्च अतिरिक्त)

पोथी प्राप्ति लेल: अपन पूर्ण पता, मोबाइल नम्बर, पिन कोड सहित +91 92124 61006 प  वाट्सअप करी