मैथिलीपुत्र ब्लॉग पर अपनेक स्वागत अछि। मैथिलीपुत्र ब्लॉग मैथिली साहित्य आ भाषा लेल समर्पित अछि। अपन कोनो तरहक रचना / सुझाव jagdanandjha@gmail.com पर पठा सकैत छी। कृपया एहि ब्लॉगकेँ subscribe/ फ़ॉलो करब नहि बिसरब, जाहिसँ नव पोस्ट होएबाक जानकारी अपने लोकनिकेँ भेटैत रहत।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024

गजल

प्रेममे हुनकर जहर चिखने जाइ छी 

सब बुझैए हम निशा कयने जाइ छी

 

मानतै के देख मुँह पर मुस्की हमर

की करेजाकेँ अहाँ खुनने जाइ छी 

 

जे मयूरक पाँखि  पेलौं उपहारमे

प्राण बुझि संगे सगर धयने जाइ छी

 

रोशनाई नै कलममे  बड़ अछि कहक

चीर छाती सोणितसँ लिखने जाइ छी

 

जीवनक ठोकर कते लागल  चारुदिश

‘मनु’ सुमरि सब चोट ई सहने जाइ छी


(बहरे जदीद, मात्राक्रम 2122-2122-2212)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’ 


 

रविवार, 8 दिसंबर 2024

रुबाइ

हमहूँ खेत आइ बोटीकेँ रोपलौं

पोसै लेल पेट झूठक हर जोतलौं

कारी कोटसँ कोटमे निसाफ ककरा

टाका पाबि आँखि बान्हि दफा जोखलौं

                   ✍🏻जगदानन्द झा ‘मनु’


बुधवार, 4 दिसंबर 2024

रुबाइ

तोरा नहि हम छोड़लौं नहि हम बेवफा

तोरा बिन नहि मरलौं नहि हम बेवफा

तोहर प्राण गेल बुझि नहि जीवैत ‘मनु’

बिन काठीए जरलौं  नहि हम बेवफा

                ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 


शनिवार, 26 अक्टूबर 2024

गजल

ताड़ीमे कतए मद जे चाही जीबै लेल

माहुरमे कुन जीवन चाही जे चीखै लेल 

 

बाँकी नै ताड़ीएटा टूटल मोनक हेतु

जीवनमे एकर बादो बड़ छै पीबै लेल

  

सिस्टममे फाटल छै मेघसँ धरती धरि कोढ़

एतै कतयसँ दरजी सिस्टम सीबै लेल

 

जीतब हारब सदिखन लगले छै जीवन संग

फेरसँ उठि कोशिश नमहर हेतै जीतै लेल

 

मोनसँ करबै ‘मनु’ अप्पन जीवनकेँ तैयार

कर्मक बीया सगरो बहुते अछि छीटै लेल

 

(बहरे विदेह, मात्राक्रम 2222-2222-222-21 सभ पाँतिमे)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

रुबाइ

पागल हम दुनियामे पियार तकै छी

भलमानुस सब सगर वेपार तकै छी

नै कोनो दाम मनुख मनुखताकेँ

स्वार्थी लोकसँ ‘मनु’ सरोकार तकै छी

                 ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

मंगलवार, 2 अप्रैल 2024

जँ हम मरि जाइ कनिको नै अहाँ कानब - गजल

रुबाइ

एतेक नेहमे लीबैत किएक छी

दुनिया पुछलनि हम जीवैत किएक छी 

सभ बुझला उत्तर ‘मनु’ अहूँ इ जुनि पूछू 

दिन राति एतेक पीबैत किएक छी 

                ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 


रविवार, 31 मार्च 2024

गजल

की बनब चाहै छलौं हम कि बनि गेलौं

प्रेममे प्रियतम अहीँ  केर    सनि गेलौं

 
आश जे परिवारकेँ  आब नहि रहलै

जेब खाली देख सब हीन जनि गेलै

 

सुधि रहल नै बोझ लदने अपन हमरा

प्रेम कनिको भेटते हम तँ कनि गेलौं

          

मोनकेँ भीतर घराड़ी  बसल सदिखन

छल लिखल परदेशके  देश मनि गेलौं                  

 

नेह अप्पन आब नै नेह टा रहलै

मोनमे बसि ‘मनु’ हमर साँस गनि गेलौं

 

(बहरे कलीबमात्राक्रम - 2122-2122-1222 सभ पाँतिमे)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु

 

मंगलवार, 26 मार्च 2024

रुबाइ

घुमि कनखीसँ कनि जे अहाँ ताकि देलहुँ

तन मन अपन एहिपर हम हारि देलहुँ

नहि आब बैकुंठकेँ रहि गेल इच्छा

सगरो अहाँकेँ लेल ‘मनु’ बारि देलहुँ

                  ✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 


शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

गजल

पोथीक तर दबि पढ़ुआ सगर मरि गेल

जे प्रेममे  डूबल जीविते तरि गेल 

 

सदिखन जतय मनमे छल डरक आतंक 

अबिते अहाँके नव फूल फल फरि गेल


धरती तपल छल जे पानि बिन तरसैत

हथियाक हँसिते बरखा निमन परि गेल

   

आनक सुखक चिंता बेस अप्पन दुखसँ

डाहसँ कतेको घर तेल बिन जरि गेल 

      

पाथरसँ मनु शाइर बनि रहल अछि आब

तोरासँ जे  मृगनयनी  नजरि लरि गेल 

(बहरे सलीममात्रा क्रम - 2212-2221-2221)

जगदानन्द झा ‘मनु