समीक्षक - जगदानन्द झा ‘मनु’
अंतरजातीय प्रेमपर आधारित, डॉ. कैलाश कुमार मिश्र लिखित उपन्यास “मनसरबी” मैथिली साहित्य खास कय मैथिली उपन्यास लेल एक गोट अनुपम धरोहर केर रूपमे, मैथिली साहित्य अनुरागी लोकनीक लेल साबित होएत। मिथिला समाजक ताना-बाना, परिवेश, कुरीति, सामाजिक विसमता, नारीक स्थिति आ अस्तीत्व, धनिक वर्गक द्वारा गरीब सभपर केएल गेल अमानवीय शोषण, धन आ दैहिक शक्तिक दुरुपयोग, बहु आ बेमेल ब्याह, वासना, प्रेम, निश्छल ईश्वरीय प्रेम, कमोबेश मानवीय संवेदनाक सभ पक्ष केर अपनामे समेटने “मनसरबी” मैथिली साहित्यक एकटा उच्चय कोटिक उपन्यास अछि।
मनोरंजन सहित लेखक सम्पूर्ण पोथीमे रोचकता आ कौतुहलता बनबैमे पूर्ण रुपसँ सफल भेल छथि। पाठक एकबेर पोथीकेँ पढ़व शुरू केलाक बाद बिना पुरा पढ़ने नहि रहि सकैत छथि। उपन्यासक भाषा जनमानस के कंठमे बसल सोझ, सरल आ चित्रात्मक अछि। पढ़ैकालमे सिनेमाक परदा जकाँ मानस पटलपर एक-एकटा दृश्य चलैमान लगैत अछि। आँगन-दलान, खेद-खड़िहान, धूल-माटि, भूख-पिआस, प्रेम-विरह सभ आँखिक आगाँ साक्षात देखाइ लगैत अछि। संवाद स्वाभाविक आ लयात्मक अछि। “मनसरबी” उपन्यासमे समकालीन मिथिलाक ग्रामीण जीवनक सजीव चित्र जेना संवेदना, यथार्थ आ लोक-संस्कृतिक केर यथार्थ दर्शन होइत अछि।
मनसरबी, राघव आ बुलकी केर निश्छल प्रेमक अनुपम प्रेम कथा अछि। राधव संस्कारी, पढ़ल लिखल, बुझनूक, सभकेँ संग लय क चलै बला एकटा गामक गरीब ब्राह्मण घरक बेटा अछि। ओतय बुलकी बहुत गरीब गामक अमात घरक बेटी अछि। ब्याह भेला पछाइतो बुलकी अपन सासुर आ घरबालाकेँ छोड़ि नैहरमे अपन बुढ़ गरीब माय-पापक संगे रहि रहल अछि। गाम घरक सभ काज जेना माल-जालकेँ सेवा, घास करब, बौइनी करब सभ काज करैत अछि। अनुपम सुनरि देह आ मोनक मालकिन बुलकी। ओ अपना सुन्नरता आ आकर्षण केर कारण गामक कतेको लोकक नजरिमे बसैक संगे धनिक आ दवंग राजकांतक बलात्कार केर सजा सेहो पबैत अछि। राघव आ बुलकीक प्रेम जेना, सुग्गा-मैनाक प्रेम। जेना हिर आ रांझाक प्रेम। जेना वसंत आ प्रकृति केर प्रेम। जेना सुर आ बाँसुरीक प्रेम। निश्छल, अलौकिक, प्रेमक पूर्णता, मधुर-मिलन भेला बादो ग्राम्य जीवन आ समाजक बुनल ताना बाना केर बुझैत एक रहितो समाजक नजरिमे एक नहि भय सकला। उपन्यासकार अपन उपन्यासमें दुनूक यौवन, रुप, चरित्र, प्रेम, विरहकेँ एहेन सुन्नर शब्दक मालामे गूँथने छथि जेकर प्रशंसा केनाइ सूर्यकेँ दिया देखबय जकाँ होएत।
उपन्यास राघव आ बुलकी संगे संगे बहुत रास आरो कतेको पात्र चरित्र आ कथाकेँ अपनामे समटने अछि। एक तरफ़ राघव आ बुलकी, दू टा अलग अलग जातिकेँ होबाक कारणे समाजिक रूपसँ एक नहि भ सकल ओतय दोसर दिस नैना आ नन्द एक दोसरापर सर्वत्र समर्पण कय देला बादो सामजक सामने एक नहि भ पेला किएक तँ दुनू एक्के गोत्रसँ रहथि। नेना नन्दक प्रेमकेँ अपन करेजामें समटने नहि चाहितो एकटा द्वितीवरसँ ब्याहल जाइ छथि आ किछुए समयमे नन्दक वियोककेँ नहि सहि परलोक बासी भ जाइत छथि।
लखरु ख़लीफ़ा एक टा नामी पहलवान अपन ताक़त के जोरसँ समाजमे अन्यायके बले बहुते धन कमाइए। मुदा अंत काल गूँह गिजैत धरपरिवार समाज सभसँ दूर नरक केर यातना भोगैत अछि।
उपन्यासक एक-एकटा पात्र मानु जीवन्त हुए। शब्द आ दृश्यक अनुपम प्रस्तुति कैलाशजी कयने छथि। हुनक एहि उपन्यासक लेखनीमें एकटा आकर्षण अछि जे पाठककेँ पूरा उपन्यास पढ़ें लेल उत्साहित करैत अछि।
हाँ किछु वर्तनी सम्बंधित दोष अछि, जेकरा प्रकाशन हाउस आँगाक एडिशनमे ठीक कय लेता इ उम्मीद अछि।
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीकेँ हुनक एहि अनुपम कृतिकेँ लेल बहुत बहुत बधाइ संगे माय भगवतीसँ प्रार्थना कि अपने एनाहिते मैथिली साहित्यकेँ समृद्धि करैमे सदति लागल रही।
विधा : उपन्यास
पोथीक नाम : मनसरबी
भाषा : मैथिली
लेखक: डॉ० कैलाश कुमार मिश्र
प्रकाशक : मैत्रेयी प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष: २०२५
मूल्य : ₹ २००/-