जीवन भरि सबहक सुनिते रहलहुँ
मोनक सभ पीड़ा पिबिते रहलहुँ
गामक घर आँगन खाली कय हम
शहरक धूवाँमे जिबिते रहलहुँ
पोखरि भरि बाड़ीसँ मिला लयने
बिन माछक थारी तकिते रहलहुँ
सभकेँ सभ किछु नहि भेटल जगमे
भागक लिखलाहा गणिते रहलहुँ
मुँह बोने कौआ सगरो बैसल
चुप भय ‘मनु’ सभटा सहिते रहलहुँ
(बहरे मीर, मात्राकर्म : 22-2-22-22-22, तेसर शेरकेँ पहिल पाँतिमे दूटा अलग-अलग लघुकेँ दिर्घ मानक छूट लेल गेल अछि।)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
