मैथिलीपुत्र ब्लॉग पर अपनेक स्वागत अछि। मैथिलीपुत्र ब्लॉग मैथिली साहित्य आ भाषा लेल समर्पित अछि। अपन कोनो तरहक रचना / सुझाव jagdanandjha@gmail.com पर पठा सकैत छी। कृपया एहि ब्लॉगकेँ subscribe/ फ़ॉलो करब नहि बिसरब, जाहिसँ नव पोस्ट होएबाक जानकारी अपने लोकनिकेँ भेटैत रहत।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

मैथिली साहित्यमे श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक काज


मैथिली साहित्यमे श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक काजपर प्रकाश डालनाइ अर्थात सुरुजकेँ दिप देखेनाइ। मुदा भक्त सभ अपन-अपन श्रद्धा आ सामर्थ हिसाबे सूर्यकेँ दिपे नहि पानि सेहो सपर्पित कैरते अछि। हमरामे ओ सामर्थ नहि अछि तथापि  हम एहीठाम प्रयास कय रहल छी मैथिली साहित्यक अनंत अंतरिक्षमे गजेन्द्र रुपी सुरूजकेँ अपन आखरक माध्यमसँ दिप देखाबै केर।  

जन्म - ३० मार्च १९७१ (भागलपुर), आइ करीब ५४ वर्षक एतेक कम अबस्थामे एतेक बेसी उपलब्धि, दुनियामे बहुत कम देखै लेल भेटै छैक। एखन धरि  श्री गजेन्द्र ठाकुर जी मुख्यतः मैथिली,  अंग्रेज़ी आ आन-आन भाषा संगे हुनक मुल रचना, अनुसंधान, इतिहास, खोज, भाषा विज्ञान, मैथिली-अंग्रेज़ी शव्दकोश आ अनुवाद सहित करीब सावा सयसँ बेसी पोथी लिख चुकल छथि। जे की मैथिली साहित्य लेल आकाश गंगा सन एकटा अनंत शृंखला बनल अछि, जाहिमे मैथिली साहित्य, इतिहास आ अनुसंधानकेँ विद्यार्थी संगे संग विद्वान लोकनि स्नान कय अपन ज्ञान रूपी पियाससँ तृप्त भय सकैत छथि। मैथिली भाषाक लेखनकेँ कोनो एहेन विधा नहि जाहिमे ओ काजे टा नहि वरन अद्भुत काज नहि केने हुएथ। एक गोट इतिहासकारकेँ रुपमे, मिथिला- प्राचीन विदेह आऔर मैथिलकेँ वर्तमान समयमे स्थापित करैक रूपमे, आधुनिक मैथिली-अंग्रेजी शव्दकोशक निर्माण, प्राचीन मिथिलाक पंजीव्यवस्थाक संग्रह आ संकलन एहन दुरूह काजकेँ सम्पन्न केनाइ कोनो चमत्कारसँ कम नहि बुझना जाइत अछि। एतबे नहि हुनक सभ रचना, खोज, ग्रन्थकेँ ओ देवनागरी सहित मैथिलीक मूल लिपि, तिरहुत लिपि (मिथिलाक्षर लिपि) मे सेहो लिखी कय मिथिलाक धरोहर आ साहित्यएटा नहि वरन अति प्राचीन, भारती साहित्यक गौरव आ विश्व धरोहर तिरहुत लिपिकेँ पुनर्जीवन संगे ओकर विकास आऔर प्रचार पर सेहो खूब बेस काज कय रहल छथि। संगे-संग ब्रेल लिपिपर हुनक काजक जतेक प्रसंसा केयल जेए से कम।

मैथिली साहित्यमे कतेको एहेन विधा जेकर अस्तित्व गजेन्द्र  युगसँ पहिने नहि वा नहिएकेँ जकाँ छल, ओहेन कतेको विधाकेँ मैथिली साहित्यमे स्थापित करैमे हुनक योगदानकेँ जतेक कहल जेए से कम होयत। जेना कि गजल, बीहनि कथा, हाइकू, रुबाइ, टंका, सेनुर आदि आदि। एकटा उदाहरण, आइसँ करीब-करीब अठारह-बीस वर्ष पहिने एक समय छलै जहिया मैथिलीमे मैथिलीक कतेको जूएल साहित्यकार सभ घोषणा कय देने रहथि जे गजल विधा मैथिली लेल नहि छै अथवा मैथिलीमे गजल नहि कहल जा सकै छै। जे किछु गजल लिखेबो केएल रहै, से सभमे बेसी रास गजल नहि गजल जकाँ किछु रहै। मुदा आइ श्री गजेन्द्र ठाकुर जी व हुनक टीमक प्रयाससँ मैथिली गजलक व्याकरणे टा स्थापित नहि भेल वरन मैथिलीमे दर्जनसँ बेसी गजलकार बहरयुक्त गजल लिख रहल छथि, संगे दर्जन भरिसँ बेसी खाँटी गजलक पोथी मैथीलीमे लिखा गेल अछि।

श्री गजेन्द्र ठाकुर जी मात्र एकटा इतिहासकार, पुरालेखविद्, विद्वान, साहित्यकार, लेखक, कथाकार, कवि, गजलकार, समीक्षक सहित कलमेटाक धनी नहि अपितु एकटा क्षेष्ठ लीडरक सभटा गुण हुनकामे कूइट कूइट कय भरल अछि। ओ अपन साहित्यिक ज्ञान आ मातृभाषा मैथिलीक सिनेह केर अपन नेतृत्व गुणसँ इन्टरनेटपर परैस कऽ दुनियाँकेँ अलग-अलग हिस्सामे रहै बला मैथिली अनुरागी पाठक, मैथिली भाषाक विद्यार्थी आ साहित्यकार सभकेँ एक ठाम अनि कय मैथिली साहित्य केर विकासक गतिकेँ दुनियाक आन-आन विकसित भाषा सभक समक्ष आनि ठार कय देला।

इन्टरनेटपर मैथिली भाषाक प्रथम उपस्थित ‘भालसरिक गाछ’ केर रुपमे सन २००० मे हुनके द्वारा भेल अछि। जे आगू अपन विकास क्रममे ‘विदेह - प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका’ ( http://www.videha.co.in/ ) धरि पहुँचल अछि। आ विदेह आ विदेहक टीम मैथिली भाषा आ साहित्य लेल जतेक काज केलक से केकरोसँ छुपल नहि अछि। ओ काज नव-नव विद्याकेँ मैथिलीमे स्थापित केनाइ होइ, नव-नव प्रतिभाकेँ इन्टरनेटकेँ द्वारा ताइक कय, माँइज कय, पॉलिस कय कऽ दुनियाँक सामने प्रस्तुत केनाइ होइ। सैकड़ों टा नव-नव प्रतिभाकेँ जिनका साहित्य वा मैथिली साहित्यसँ दूर-दूर धरि कोनो सम्बन्ध नहि छल ओ सभ गजेन्द्र ठाकुर जीसँ विदेह व आन-आन इन्टरनेटक माध्यमसँ जुड़ि आइ स्थापित साहित्यकार, लेखक, कवि, गजलकार, कथाकार आदि आदिकेँ रूपमे जानल जाइ छथि।

नव-नव विधा आ नव-नव प्रतिभाकेँ आगू बढ़बै संगे-संग विदेह पूरान आ स्थापित मैथिली साहित्यकार सभकेँ अपन कृतिकेँ दुनियाँक सामने एकटा आँगुरकेँ क्लीकसँ पहुँचाबैक अवसर देलकै। ततबे नहि पुरानसँ पुरान पिछला अंक सभकेँ पढ़ै केर सुविधा संगे संगे सैकड़ों लेखक आ साहित्यकारक हजारो टा पोथीक ई-वर्जन विदेह आर्काइवकेँ मैथिली पोथी डाउनलोडमे राखल अछि। जे कि अपना आपमे एकटा अनुपम उपलब्धि अछि। इन्टरनेटकेँ दुनियामे एकटा एहेन पुस्तकालय जे विद्यार्थी, शोधकर्ता, साहित्यकार, लेखक, पाठक आ मैथिली अनुरागीकेँ बिना कोनो मोल आ समयक स्वतंत्रता संगे पढै केर अवसर दै छैक। आ एहिठाम विदेह अर्थात गजेन्द्र ठाकुर जी, ओ अपने वा हुनकर टीम, टीम अर्थात हुनक नेतृत्व  कौशलक उदाहरण।

एतवे नहि एकटा कहाबैत छैक ‘कोस कोसपर बदले पानी, तीन कोस पर बदले वाणी’। एहिठाम पानिक चर्चा तँ नहि मुदा वाणीक चर्चा करी तँ भूतकालमे मैथिली व मैथिली साहित्य बहुत लोकप्रिय आ समृद्ध रहल होयत मुदा वर्तमान कालमे सरकारक उपेक्षा, लोकक मात्र सरकारपर निर्भरता, मैथिली भाषासँ रोजगार/ नोकरीक अवसर केर आभाव, अपन मातृभाषाक प्रति सिनेकह कमी सहित आन-आन कारणे मैथिली भाषामे एकीकरणक अभावे एकरूपताक सदति अभाव रहल। दोसर आखरमे कही तँ मैथिली भाषामे मानक मैथिलीक अभाव रहल। फराक फराक लेखक, विद्वान, पत्र-पत्रिका संपादक सभ अपन-अपन ज्ञान आ सुविधाक हिसाबे मैथिलीकेँ परसअ लगला एहि अव्यवहारिकताकेँ तोरैत विदेह, श्री गजेन्द्र ठाकुर जी आ हुनक टीम मैथिली भाषा आ वर्तनीक एकरूपताक लेल सोहो भरपूर काज कयलथि। श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक मैथिली भाषाक मानक रुप पर केयल गेल काजक संगे-संग विदेह ई-पत्रिकाक संपादकीय, विदेहक संपादित रचना सभ सहित विदेहसँ जुड़ल अधिकतर लेखक सभक भाषा आ वर्तनीमे एकरुपताक दर्शन होयत अछि।

जाहि समय अथवा कालखंडमे कोनो सरकार, संस्था वा अकादमी, मैथिली भाषा व साहित्य लेल पूर्ण समर्पणसँ काज नहि कय रहल अछि ओही समयमे श्री गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा व्यक्तिगत रूपसँ एतेक रास काज केनाइ अकल्पनीय आ अविश्वसनीय अछि। एतेक रास काज हुनक ज्ञान, योग्यता आ मातृभाषा मैथिलीक प्रति हुनक समर्पणकेँ तँ देखाइए रहल अछि संगे संग एहीमें लगै छै समय आ धन दुनू। एकटा आम व्यक्ति लग आइकेँ समयमे धन आ समय दुनूक अभाव रहै छै आ जिनका लग छनि हुनका लग मोन नहि। एहिठाम गजेन्द्र ठाकुर जीक उपर गणेश जीक बुद्धि, सरस्वती जीक ज्ञान रुपी आशीर्वाद तँ छइन्हें संगे महामायाक देल ओ विराट करेजा, जे ओ धन वा कोनो तरहक नाम व पुरस्कारक मोह देखने बीना मैथिली भाषा आ साहित्य लेल भगीरथी काज कय रहल छथि। एही भगीरथी काजकेँ लेल हुनकर जतेक प्रशंसा केयल जेए से कम होएत। मैथिली भाषा आ साहित्य प्रति हुनक एहि समर्पणकेँ कोनो मूल्य वा पुरस्कारसँ नहि नापल जा सकैए, ओ अमूल्य अनमोल अछि। कोनो पुरस्कारसँ श्रेष्ठ अछि। मैथिली भाषा आ साहित्यमे हुनकर एहि योगदानकेँ लेल हुनका युग-युग तक याद राखल जायत।

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 


शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

गजल

करेजमे बसा हमरो तँ कनी  पिआर करु

अपन बना क हमरा प्रिय अहाँ दुलार करु 

 

नुका क छी अहीँकेँ हम रखने हिया त’रे

करब अहाँक पूजा नै सगरो पसार करु 


मनक तरंग सबटा छोरि अहीँक छी बनल

विचारु नै इना जल्दीसँ अहाँ कहार करु

 

सिनेह होइ की छै आबु  तँ हम कहैत छी

जिवू खुशीसँ जीवन नै अकरा पहार करू

 

दुलार नै जतय धन केर बिना कियो करै

सिनेह ओइ ‘मनु’ दुनियासँ किना उधार करु

 

(मात्रा क्रम 12-12-12-221-12-12-12 सभ पाँतिमे)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


सोमवार, 1 सितंबर 2025

गजल

नुका कय मुँह अपन सगरो कनै छी हम 

विरहकेँ आगिमे  सदिखन जरै छी हम 


लगा नेहक किए ई आँच चलि गेलौं

करेजक दर्द सहियो नहि सकै छी हम

 

लगन एतेक सतबै छै बुझल नहि छल
विछोहे राति दिन घुटि-घुटि मरै छी हम 

 

नजरिमे छी सभक हारल बताहे टा

बुझत की आन आनंदे रहै छी हम

 

पिया ओता हमर ई सोचि जीबै छी

लगोने आश ‘मनु’ रस्ता तकै छी हम 

 
(बहरे हजज, मात्रा क्रम : 1222-1222-1222)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 

शनिवार, 30 अगस्त 2025

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीक उपन्यास मनसरबीक समीक्षा


 समीक्षक - जगदानन्द झा ‘मनु



अंतरजातीय प्रेमपर आधारित, डॉ. कैलाश कुमार मिश्र लिखित उपन्यासमनसरबीमैथिली साहित्य खास कय मैथिली उपन्यास लेल एक गोट अनुपम धरोहर केर रूपमे, मैथिली साहित्य अनुरागी लोकनीक लेल साबित होएत। मिथिला समाजक ताना-बाना, परिवेश, कुरीति, सामाजिक विसमता, नारीक स्थिति अस्तीत्व, धनिक वर्गक द्वारा गरीब सभपर केएल गेल अमानवीय शोषण, धन दैहिक शक्तिक दुरुपयोग, बहु बेमेल ब्याह, वासना, प्रेम, निश्छल ईश्वरीय प्रेम, कमोबेश मानवीय संवेदनाक सभ पक्ष केर अपनामे समेटनेमनसरबीमैथिली साहित्यक एकटा उच्चय कोटिक उपन्यास अछि।  

मनोरंजन सहित लेखक सम्पूर्ण पोथीमे रोचकता कौतुहलता बनबैमे पूर्ण रुपसँ सफल भेल छथि। पाठक एकबेर पोथीकेँ पढ़व शुरू केलाक बाद बिना पुरा पढ़ने नहि रहि सकैत छथि।  उपन्यासक भाषा जनमानस के कंठमे बसल सोझ, सरल चित्रात्मक अछि। पढ़ैकालमे सिनेमाक परदा जकाँ मानस पटलपर एक-एकटा दृश्य चलैमान लगैत अछि। आँगन-दलान, खेद-खड़िहान, धूल-माटि, भूख-पिआस, प्रेम-विरह सभ आँखिक आगाँ साक्षात देखाइ लगैत अछि। संवाद स्वाभाविक लयात्मक अछि।मनसरबीउपन्यासमे  समकालीन मिथिलाक ग्रामीण जीवनक  सजीव चित्र जेना संवेदना, यथार्थ लोक-संस्कृतिक केर यथार्थ दर्शन होइत अछि।

मनसरबी, राघव बुलकी केर निश्छल प्रेमक अनुपम प्रेम कथा अछि। राधव संस्कारी, पढ़ल लिखल, बुझनूक, सभकेँ संग लय चलै बला एकटा गामक गरीब ब्राह्मण घरक बेटा अछि। ओतय बुलकी बहुत गरीब गामक अमात घरक बेटी अछि। ब्याह भेला पछाइतो बुलकी अपन सासुर घरबालाकेँ छोड़ि नैहरमे अपन बुढ़ गरीब माय-पापक संगे रहि रहल अछि।  गाम घरक सभ काज जेना माल-जालकेँ सेवा, घास करब, बौइनी करब सभ काज करैत अछि। अनुपम सुनरि देह मोनक मालकिन बुलकी। अपना सुन्नरता आकर्षण केर कारण गामक कतेको लोकक नजरिमे बसैक संगे धनिक दवंग राजकांतक बलात्कार केर सजा सेहो पबैत अछि। राघव बुलकीक प्रेम जेना, सुग्गा-मैनाक प्रेम। जेना हिर रांझाक प्रेम। जेना वसंत प्रकृति केर प्रेम। जेना सुर बाँसुरीक प्रेम। निश्छल, अलौकिक, प्रेमक पूर्णता, मधुर-मिलन भेला बादो ग्राम्य जीवन समाजक बुनल ताना बाना केर बुझैत एक रहितो समाजक नजरिमे एक नहि भय सकला।  उपन्यासकार अपन उपन्यासमें दुनूक यौवन, रुप, चरित्र, प्रेम, विरहकेँ एहेन सुन्नर शब्दक मालामे गूँथने छथि जेकर प्रशंसा केनाइ सूर्यकेँ दिया देखबय जकाँ होएत।

उपन्यास राघव बुलकी संगे संगे बहुत रास आरो कतेको पात्र चरित्र कथाकेँ अपनामे समटने अछि। एक तरफ़ राघव बुलकी, दू टा अलग अलग जातिकेँ होबाक कारणे समाजिक रूपसँ एक नहि भ सकल ओतय दोसर दिस नैना आ नन्द एक दोसरापर सर्वत्र समर्पण कय देला बादो सामजक सामने एक नहि भ पेला किएक तँ दुनू एक्के गोत्रसँ रहथि। नेना नन्दक प्रेमकेँ अपन करेजामें समटने नहि चाहितो एकटा द्वितीवरसँ ब्याहल जाइ छथि आ किछुए समयमे नन्दक वियोककेँ नहि सहि परलोक बासी भ जाइत छथि।

लखरु ख़लीफ़ा एक टा नामी पहलवान अपन ताक़त के जोरसँ समाजमे अन्यायके बले बहुते धन कमाइए। मुदा अंत काल गूँह गिजैत धरपरिवार समाज सभसँ दूर नरक केर यातना भोगैत अछि।

उपन्यासक एक-एकटा पात्र मानु जीवन्त हुए। शब्द आ दृश्यक अनुपम प्रस्तुति कैलाशजी कयने छथि। हुनक एहि उपन्यासक लेखनीमें एकटा आकर्षण अछि जे पाठककेँ पूरा उपन्यास पढ़ें लेल उत्साहित करैत अछि।

हाँ किछु वर्तनी सम्बंधित दोष अछि, जेकरा प्रकाशन हाउस आँगाक एडिशनमे ठीक कय लेता इ उम्मीद अछि।

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीकेँ हुनक एहि अनुपम कृतिकेँ लेल बहुत बहुत बधाइ संगे  माय भगवतीसँ प्रार्थना कि अपने एनाहिते मैथिली साहित्यकेँ समृद्धि करैमे सदति लागल रही।

 

विधा : उपन्यास

पोथीक नाम : मनसरबी

भाषा :  मैथिली

लेखक: डॉ० कैलाश कुमार मिश्र

प्रकाशक :  मैत्रेयी प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष: २०२५

मूल्य : ₹ २००/-