मैथिली साहित्यमे श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक काजपर प्रकाश डालनाइ अर्थात सुरुजकेँ दिप देखेनाइ। मुदा भक्त सभ अपन-अपन श्रद्धा आ सामर्थ हिसाबे सूर्यकेँ दिपे नहि पानि सेहो सपर्पित कैरते अछि। हमरामे ओ सामर्थ नहि अछि तथापि हम एहीठाम प्रयास कय रहल छी मैथिली साहित्यक अनंत अंतरिक्षमे गजेन्द्र रुपी सुरूजकेँ अपन आखरक माध्यमसँ दिप देखाबै केर।
जन्म - ३० मार्च १९७१ (भागलपुर), आइ करीब ५४ वर्षक एतेक कम अबस्थामे एतेक बेसी उपलब्धि, दुनियामे बहुत कम देखै लेल भेटै छैक। एखन धरि श्री गजेन्द्र ठाकुर जी मुख्यतः मैथिली, अंग्रेज़ी आ आन-आन भाषा संगे हुनक मुल रचना, अनुसंधान, इतिहास, खोज, भाषा विज्ञान, मैथिली-अंग्रेज़ी शव्दकोश आ अनुवाद सहित करीब सावा सयसँ बेसी पोथी लिख चुकल छथि। जे की मैथिली साहित्य लेल आकाश गंगा सन एकटा अनंत शृंखला बनल अछि, जाहिमे मैथिली साहित्य, इतिहास आ अनुसंधानकेँ विद्यार्थी संगे संग विद्वान लोकनि स्नान कय अपन ज्ञान रूपी पियाससँ तृप्त भय सकैत छथि। मैथिली भाषाक लेखनकेँ कोनो एहेन विधा नहि जाहिमे ओ काजे टा नहि वरन अद्भुत काज नहि केने हुएथ। एक गोट इतिहासकारकेँ रुपमे, मिथिला- प्राचीन विदेह आऔर मैथिलकेँ वर्तमान समयमे स्थापित करैक रूपमे, आधुनिक मैथिली-अंग्रेजी शव्दकोशक निर्माण, प्राचीन मिथिलाक पंजीव्यवस्थाक संग्रह आ संकलन एहन दुरूह काजकेँ सम्पन्न केनाइ कोनो चमत्कारसँ कम नहि बुझना जाइत अछि। एतबे नहि हुनक सभ रचना, खोज, ग्रन्थकेँ ओ देवनागरी सहित मैथिलीक मूल लिपि, तिरहुत लिपि (मिथिलाक्षर लिपि) मे सेहो लिखी कय मिथिलाक धरोहर आ साहित्यएटा नहि वरन अति प्राचीन, भारती साहित्यक गौरव आ विश्व धरोहर तिरहुत लिपिकेँ पुनर्जीवन संगे ओकर विकास आऔर प्रचार पर सेहो खूब बेस काज कय रहल छथि। संगे-संग ब्रेल लिपिपर हुनक काजक जतेक प्रसंसा केयल जेए से कम।
मैथिली साहित्यमे कतेको एहेन विधा जेकर अस्तित्व गजेन्द्र युगसँ पहिने नहि वा नहिएकेँ जकाँ छल, ओहेन कतेको विधाकेँ मैथिली साहित्यमे स्थापित करैमे हुनक योगदानकेँ जतेक कहल जेए से कम होयत। जेना कि गजल, बीहनि कथा, हाइकू, रुबाइ, टंका, सेनुर आदि आदि। एकटा उदाहरण, आइसँ करीब-करीब अठारह-बीस वर्ष पहिने एक समय छलै जहिया मैथिलीमे मैथिलीक कतेको जूएल साहित्यकार सभ घोषणा कय देने रहथि जे गजल विधा मैथिली लेल नहि छै अथवा मैथिलीमे गजल नहि कहल जा सकै छै। जे किछु गजल लिखेबो केएल रहै, से सभमे बेसी रास गजल नहि गजल जकाँ किछु रहै। मुदा आइ श्री गजेन्द्र ठाकुर जी व हुनक टीमक प्रयाससँ मैथिली गजलक व्याकरणे टा स्थापित नहि भेल वरन मैथिलीमे दर्जनसँ बेसी गजलकार बहरयुक्त गजल लिख रहल छथि, संगे दर्जन भरिसँ बेसी खाँटी गजलक पोथी मैथीलीमे लिखा गेल अछि।
श्री गजेन्द्र ठाकुर जी मात्र एकटा इतिहासकार, पुरालेखविद्, विद्वान, साहित्यकार, लेखक, कथाकार, कवि, गजलकार, समीक्षक सहित कलमेटाक धनी नहि अपितु एकटा क्षेष्ठ लीडरक सभटा गुण हुनकामे कूइट कूइट कय भरल अछि। ओ अपन साहित्यिक ज्ञान आ मातृभाषा मैथिलीक सिनेह केर अपन नेतृत्व गुणसँ इन्टरनेटपर परैस कऽ दुनियाँकेँ अलग-अलग हिस्सामे रहै बला मैथिली अनुरागी पाठक, मैथिली भाषाक विद्यार्थी आ साहित्यकार सभकेँ एक ठाम अनि कय मैथिली साहित्य केर विकासक गतिकेँ दुनियाक आन-आन विकसित भाषा सभक समक्ष आनि ठार कय देला।
इन्टरनेटपर मैथिली भाषाक प्रथम उपस्थित ‘भालसरिक गाछ’ केर रुपमे सन २००० मे हुनके द्वारा भेल अछि। जे आगू अपन विकास क्रममे ‘विदेह - प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका’ ( http://www.videha.co.in/ ) धरि पहुँचल अछि। आ विदेह आ विदेहक टीम मैथिली भाषा आ साहित्य लेल जतेक काज केलक से केकरोसँ छुपल नहि अछि। ओ काज नव-नव विद्याकेँ मैथिलीमे स्थापित केनाइ होइ, नव-नव प्रतिभाकेँ इन्टरनेटकेँ द्वारा ताइक कय, माँइज कय, पॉलिस कय कऽ दुनियाँक सामने प्रस्तुत केनाइ होइ। सैकड़ों टा नव-नव प्रतिभाकेँ जिनका साहित्य वा मैथिली साहित्यसँ दूर-दूर धरि कोनो सम्बन्ध नहि छल ओ सभ गजेन्द्र ठाकुर जीसँ विदेह व आन-आन इन्टरनेटक माध्यमसँ जुड़ि आइ स्थापित साहित्यकार, लेखक, कवि, गजलकार, कथाकार आदि आदिकेँ रूपमे जानल जाइ छथि।
नव-नव विधा आ नव-नव प्रतिभाकेँ आगू बढ़बै संगे-संग विदेह पूरान आ स्थापित मैथिली साहित्यकार सभकेँ अपन कृतिकेँ दुनियाँक सामने एकटा आँगुरकेँ क्लीकसँ पहुँचाबैक अवसर देलकै। ततबे नहि पुरानसँ पुरान पिछला अंक सभकेँ पढ़ै केर सुविधा संगे संगे सैकड़ों लेखक आ साहित्यकारक हजारो टा पोथीक ई-वर्जन विदेह आर्काइवकेँ मैथिली पोथी डाउनलोडमे राखल अछि। जे कि अपना आपमे एकटा अनुपम उपलब्धि अछि। इन्टरनेटकेँ दुनियामे एकटा एहेन पुस्तकालय जे विद्यार्थी, शोधकर्ता, साहित्यकार, लेखक, पाठक आ मैथिली अनुरागीकेँ बिना कोनो मोल आ समयक स्वतंत्रता संगे पढै केर अवसर दै छैक। आ एहिठाम विदेह अर्थात गजेन्द्र ठाकुर जी, ओ अपने वा हुनकर टीम, टीम अर्थात हुनक नेतृत्व कौशलक उदाहरण।
एतवे नहि एकटा कहाबैत छैक ‘कोस कोसपर बदले पानी, तीन कोस पर बदले वाणी’। एहिठाम पानिक चर्चा तँ नहि मुदा वाणीक चर्चा करी तँ भूतकालमे मैथिली व मैथिली साहित्य बहुत लोकप्रिय आ समृद्ध रहल होयत मुदा वर्तमान कालमे सरकारक उपेक्षा, लोकक मात्र सरकारपर निर्भरता, मैथिली भाषासँ रोजगार/ नोकरीक अवसर केर आभाव, अपन मातृभाषाक प्रति सिनेकह कमी सहित आन-आन कारणे मैथिली भाषामे एकीकरणक अभावे एकरूपताक सदति अभाव रहल। दोसर आखरमे कही तँ मैथिली भाषामे मानक मैथिलीक अभाव रहल। फराक फराक लेखक, विद्वान, पत्र-पत्रिका संपादक सभ अपन-अपन ज्ञान आ सुविधाक हिसाबे मैथिलीकेँ परसअ लगला एहि अव्यवहारिकताकेँ तोरैत विदेह, श्री गजेन्द्र ठाकुर जी आ हुनक टीम मैथिली भाषा आ वर्तनीक एकरूपताक लेल सोहो भरपूर काज कयलथि। श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक मैथिली भाषाक मानक रुप पर केयल गेल काजक संगे-संग विदेह ई-पत्रिकाक संपादकीय, विदेहक संपादित रचना सभ सहित विदेहसँ जुड़ल अधिकतर लेखक सभक भाषा आ वर्तनीमे एकरुपताक दर्शन होयत अछि।
जाहि समय अथवा कालखंडमे कोनो सरकार, संस्था वा अकादमी, मैथिली भाषा व साहित्य लेल पूर्ण समर्पणसँ काज नहि कय रहल अछि ओही समयमे श्री गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा व्यक्तिगत रूपसँ एतेक रास काज केनाइ अकल्पनीय आ अविश्वसनीय अछि। एतेक रास काज हुनक ज्ञान, योग्यता आ मातृभाषा मैथिलीक प्रति हुनक समर्पणकेँ तँ देखाइए रहल अछि संगे संग एहीमें लगै छै समय आ धन दुनू। एकटा आम व्यक्ति लग आइकेँ समयमे धन आ समय दुनूक अभाव रहै छै आ जिनका लग छनि हुनका लग मोन नहि। एहिठाम गजेन्द्र ठाकुर जीक उपर गणेश जीक बुद्धि, सरस्वती जीक ज्ञान रुपी आशीर्वाद तँ छइन्हें संगे महामायाक देल ओ विराट करेजा, जे ओ धन वा कोनो तरहक नाम व पुरस्कारक मोह देखने बीना मैथिली भाषा आ साहित्य लेल भगीरथी काज कय रहल छथि। एही भगीरथी काजकेँ लेल हुनकर जतेक प्रशंसा केयल जेए से कम होएत। मैथिली भाषा आ साहित्य प्रति हुनक एहि समर्पणकेँ कोनो मूल्य वा पुरस्कारसँ नहि नापल जा सकैए, ओ अमूल्य अनमोल अछि। कोनो पुरस्कारसँ श्रेष्ठ अछि। मैथिली भाषा आ साहित्यमे हुनकर एहि योगदानकेँ लेल हुनका युग-युग तक याद राखल जायत।
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’