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गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

गजल

करेजामे हमर साजन आबि गेलै

मनक सभ तार बटगबनी गाबि गेलै

 

हुनक मुस्कीसँ सगरो दुनियाक सम्पति

करेजा जानि नै  कोना पाबि गेलै

 

बलमकेँ दर्द कनिको जनिते हमर मन

कतेको दुख   अपन चट्टे दाबि गेलै

 

बनेलहुँ अपन जखनसँ संगी अहाँकेँ

जिला भरि केर लोकक मुँह बाबि गेलै

 

बसेने छलहुँ मन मंदिरमे जिनक छबि

हुनक मनकेँ विनय ई ‘मनु’ भाबि गेलै

 

(बहरे करीब, मात्राक्रम 1222-1222-2122) 

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


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