मैथिली साहित्य आ भाषा लेल समर्पित Maithiliputra - Dedicated to Maithili Literature & Language
रविवार, 16 फ़रवरी 2025
मंगलवार, 11 फ़रवरी 2025
पोथी चर्चा, गजल संग्रह- नढ़िया भुकैए हमर घराड़ीपर
शनिवार, 18 जनवरी 2025
मनु केर हाइकू
१
सब होएत
भवसागर पार
कृष्ण नामसँ
२
कृपा सदति
बना कय राखब
हे भगवान
३
वृंदावनके
कन-कनमे कृष्ण
वास करैत
४
नंदगाममे
सबतरि देवता
गोपीभेषमे
५
निधिवनमे
गोपाल गोपी संग
रास रचैत
६
धर्मक संगे
सगरो छथि कृष्ण
कुरूक्षेत्रमे
७
नारीमे सारी
की सारीमे नारी छै
जानथि कृष्ण
८
मथुरा एलौं
कृष्णमय भेलहुँ
अहीँक कृपा
९
राखब कृपा
सबपर माधव
सुनूँ विनती
१०
बसि जाउ हे
हमर राधा रानी
मन मनमे
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
शुक्रवार, 10 जनवरी 2025
हाइकू की छैक वा हाइकू कोना लिखल जाइ छैक
हाइकू मुलत: जापानी काव्य विधा छैक। हाइकूकेँ जन्म, पालनपोषण आ विकास जापानमे, जापानी संस्कृती आ जापानी माटि पानिमे सनि कय भेल छैक। सत्रहवीं शताब्दीक मध्यमे हाइकूकेँ एकटा स्वतंत्र काव्य विधाकेँ रुपमे स्थापित करैमे मात्सुओ बाशो केर सराहनीय काजकेँ सदति यादि राखल जाएत। हाइकू अपन लोक प्रियता आओर सहजता केर कारण जापानसँ निकलि आन-आन भाषा होइत आइ मैथिलीमे सेहो खूब लिखाएल जा रहल अछि।
हाइकू एकटा वार्णिक छंद रचना छैक, जे कुल तिन पाँतिमे लिखल जाइ छै। एकर वार्णिक संरचना छैक पाँच-सात-पाँच, अर्थात एकर पहिल आ तेसर पाँतिमें पाँच-पाँच टा आखर (अक्षर) आ दोसर पाँतिमे सातटा आखर होइत छै। हाइकूमे तुकबंदी वा कोनो विशेष छंदक पालन नहि होइत छैक। आ नहि विराम चिन्हक प्रयोग कएल जाइत छैक। हाइकू लिखैक लेल शब्द चयनमे विशेष ध्यान देबाक चाही। पूर्वमे हाइकू केर मुख्य विषय प्रकृति आ मौसम रहलै मुदा आब एहेन गप नहि रहि गेलैए, आब मानव प्रवृति, ईश्वर महिमा सहित आन आन विषय क्षेत्रमे एकर निरन्तर विस्तार भय रहल छैक।
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
गुरुवार, 9 जनवरी 2025
गजल
अनलौं करेजा हमर ई स्वीकार करु
हमरासँ एना अहाँ नै बेपार करु
गरदनि उठा कनिक हमरा नै देखबै
हम आब एतेक कोना सिंगार करु
सस्ता महग बाढ़ि रौदी सगरो भरल
सोइच गरीबक अहाँ किछु सरकार करु
हरलौं कते युगसँ तन मन धन बनि अपन
नै आब ऐ आतमा पर अधिकार करु
झूठक बटोरल अहाँकेँ बहुमत रहल
‘मनु’ नै सड़ल बाँटि जनता बेमार करु
(बहरे सगीर, मात्राक्रम - 2212-2122-2212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024
गजल
प्रेममे हुनकर जहर चिखने जाइ छी
सब बुझैए हम निशा कयने जाइ छी
मानतै के देख मुँह पर मुस्की हमर
की करेजाकेँ अहाँ खुनने जाइ छी
जे मयूरक पाँखि पेलौं उपहारमे
प्राण बुझि संगे सगर धयने जाइ छी
रोशनाई नै कलममे बड़ अछि कहक
चीर छाती सोणितसँ लिखने जाइ छी
जीवनक ठोकर कते लागल चारुदिश
‘मनु’ सुमरि सब चोट ई सहने जाइ छी
(बहरे जदीद, मात्राक्रम 2122-2122-2212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
मंगलवार, 17 दिसंबर 2024
रविवार, 8 दिसंबर 2024
रुबाइ
हमहूँ खेत आइ बोटीकेँ रोपलौं
पोसै लेल पेट झूठक हर जोतलौं
कारी कोटसँ कोटमे निसाफ ककरा
टाका पाबि आँखि बान्हि दफा जोखलौं
✍🏻जगदानन्द झा ‘मनु’
बुधवार, 4 दिसंबर 2024
रुबाइ
तोरा नहि हम छोड़लौं नहि हम बेवफा
तोरा बिन नहि मरलौं नहि हम बेवफा
तोहर प्राण गेल बुझि नहि जीवैत ‘मनु’
बिन काठीए जरलौं नहि हम बेवफा
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
रविवार, 17 नवंबर 2024
शनिवार, 26 अक्टूबर 2024
गजल
ताड़ीमे कतए मद जे चाही जीबै लेल
माहुरमे कुन जीवन चाही जे चीखै लेल
बाँकी नै ताड़ीएटा टूटल मोनक हेतु
जीवनमे एकर बादो बड़ छै पीबै लेल
सिस्टममे फाटल छै मेघसँ धरती धरि कोढ़
एतै कतयसँ दरजी ई सिस्टम सीबै लेल
जीतब हारब सदिखन लगले छै जीवन संग
फेरसँ उठि कोशिश नमहर हेतै जीतै लेल
मोनसँ करबै ‘मनु’ अप्पन जीवनकेँ तैयार
कर्मक बीया सगरो बहुते अछि छीटै लेल
(बहरे विदेह, मात्राक्रम– 2222-2222-222-21 सभ पाँतिमे)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
