भहरल भीत नै उठाउ यौ पाहुन
जर्जर टाट नै सटाउ यौ पाहुन
खाली छाड़बै उछेहबै भरि दिन
झहरल चार नै बचाउ यौ पाहुन
पाकल काँच जेहने घरे भरिमे
बाहर नाक नै कटाउ यौ पाहुन
धधकै आगि खड़ खड़ेल पजरल छै
पाइन ढारि नै जराउ यौ पाहुन
सगरो खाम गेल सड़ि हबेलीकेँ
‘मनु’केँ हँसि क नै बजाउ यौ पाहुन
(मात्राक्रम 2221-212-1222, सभ पाँतिमे।)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’