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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

मैथिली साहित्यमे गजेन्द्र ठाकुर जीक योगदान

मैथिली साहित्यमे गजेन्द्र ठाकुर जीक काजपर प्रकाश देबाक माने भेल सूर्यकेँ दीप देखेनाइ। तथापि एहिठाम प्रयास कय रहल छी मैथिली साहित्यक अनंत अंतरिक्षमे गजेन्द्र रूपी सूर्यकेँ अपन आखरक माध्यमसँ दीप देखेबाक। गजेन्द्रजीक जन्म- 30 मार्च 1971 (भागलपुर), एखन करीब 54 वर्षक एतेक कम अवस्थामे एतेक बेसी उपलब्धि, दुनियामे बहुत कम देखै लेल भेटै छैक। एखन धरि गजेन्द्र ठाकुर जी मुख्यतः मैथिली एवं अंग्रेज़ी भाषामे अनुसंधान, पंजी इतिहास, भाषा विज्ञान, मैथिली-अंग्रेज़ी शव्दकोश आ अनुवाद एवं मौलिक साहित्य सहित करीब सवा सयसँ बेसी पोथी लीखि चुकल छथि। जे कि मैथिली साहित्य लेल आकाशगंगा सन एकटा अनंत शृंखला बनल अछि, जाहिमे मैथिली साहित्य, इतिहास आ अनुसंधानकेँ विद्यार्थी संगे संग विद्वान लोकनि अपन ज्ञानक पियासकेँ मेटा सकैत छथि। मैथिली लेखनक कोनो एहेन विधा नहि जाहिमे ओ अद्भुत काज नहि केने होथि। एक इतिहासकारकेँ रूपमे, मिथिला आ मैथिलकेँ वर्तमान समयमे स्थापित करैक रूपमे, आधुनिक मैथिली-अंग्रेजी शव्दकोशक निर्माण, प्राचीन मिथिलाक पंजी व्यवस्थाक संग्रह आ संकलन एहन दुरूह काजकेँ सम्पन्न केनाइ कोनो चमत्कारसँ कम नहि बुझना जाइत अछि। एतबे नहि हुनक सभ रचना, खोज, ग्रन्थकेँ ओ देवनागरी सहित मैथिलीक मूल लिपि, तिरहुता लिपि (मिथिलाक्षर लिपि) मे सोहो लीखि कय मिथिलाक धरोहर आ साहित्यए टा नहि वरन अति प्राचीन तिरहुता लिपिक विकास आ प्रचार पर सेहो खूब बेस काज कय रहल छथि। संगे-संग ब्रेल लिपिपर हुनक काजक जतेक प्रसंसा कयल जाए से कम।

मैथिली साहित्यमे कतेको एहन विधा जकर अस्तित्व गजेन्द्र युगसँ पहिने नहि वा नहिए जकाँ छल, ओहन कतेको विधाकेँ मैथिली साहित्यमे स्थापित करै मे हुनक योगदानकेँ जतेक कहल जाए से कम होयत। जेना कि गजलशास्त्र, बीहनि कथा, रुबाइ, टंका, शेनर्यू आ हैबून आदि-आदि।  टंका, शेनर्यू आ हैबून ई तीनू जापानी काव्य विधाकेँ मैथिलीमे गजेन्द्र ठाकुरजी अनलाह। मैथिलीमे हाइकू पहिनेसँ छै मुदा टंका, शेनर्यू आ हैबून गजेन्द्रजीसँ पहिने मैथिलीमे नहि छल। गजेन्द्र ठाकुर जी मात्र एकटा इतिहासकार, पुरालेखविद्, विद्वान, साहित्यकार, लेखक, कथाकार, कवि, गजलकार, समीक्षक सहित कलमेटाक धनी नहि अपितु एकटा श्रेष्ठ लीडरक सभटा गुण हुनकामे भरल अछि। ओ अपन साहित्यिक ज्ञान आ मातृभाषा मैथिलीक सिनेह केर अपन नेतृत्व गुणसँ इन्टरनेटपर परसि कऽ दुनियाँकेँ अलग-अलग हिस्सामे रहै बला मैथिली अनुरागी पाठक, मैथिली भाषाक विद्यार्थी आ साहित्यकार सभकेँ एक ठाम अनि कय मैथिली साहित्य केर विकासक गतिकेँ दुनियाँक आन-आन विकसित भाषा सभक समक्ष आनि ठार कय देला।

इन्टरनेटपर मैथिली भाषाक प्रथम उपस्थित ‘भालसरिक गाछ’ केर रुपमे सन 2000 मे हुनके द्वारा भेल अछि। इएह भालसरिक गाछ 2008 मे विदेहक नामसँ पाक्षिक पत्रिकाक रूपमे आएल। वर्तमानमे विदेहक माध्यमें मैथिली भाषा आ साहित्य लेल जतेक काज भेलै से केकरोसँ नुकाएल नहि अछि। ओ काज नव-नव विद्याकेँ मैथिलीमे स्थापित केनाइ हो, नव-नव प्रतिभाकेँ इन्टरनेटकेँ द्वारा ताकि कय, माँजि कय, पॉलिश कय कऽ दुनियाँक सामने प्रस्तुत केनाइ हो। अनेको नव-नव प्रतिभाकेँ जिनका साहित्य वा मैथिली साहित्यसँ दूर-दूर धरि कोनो सम्बन्ध नहि छल ओ सभ गजेन्द्र ठाकुर जीसँ विदेह व आन-आन इन्टरनेटक माध्यमसँ जुड़ि आइ स्थापित साहित्यकार, लेखक, कवि, गजलकार, कथाकार आदि आदिकेँ रूपमे जानल जाइ छथि। नव-नव विधा आ नव-नव प्रतिभाकेँ आगू बढ़बै संग विदेह पुरान आ स्थापित मैथिली साहित्यकार सभकेँ दुनियाँक सामने एकटा आँगुरकेँ क्लिकसँ पहुँचाबैक अवसर देलकै। ततबे नहि पुरानसँ पुरान पिछला अंक सभकेँ पढ़ै केर सुविधा संगे संगे अनेको लेखक आ साहित्यकारक बहुत रास पोथीक ई-वर्जन विदेह आर्काइवकेँ मैथिली पोथी डाउनलोडमे राखल अछि। जे कि अपना आपमे एकटा अनुपम उपलब्धि अछि। इन्टरनेटकेँ दुनियामे एकटा एहन पुस्तकालय अछि जे विद्यार्थी, शोधकर्ता, साहित्यकार, लेखक, पाठक आ मैथिली अनुरागीकेँ बिना कोनो मोल आ समयक स्वतंत्रता संगे पढैक अवसर दै छै।

एहन समय अथवा कालखंड जाहिमे कोनो सरकार, संस्था वा अकादमी, मैथिली भाषा व साहित्य लेल पूर्ण समर्पणसँ काज नहि कय रहल अछि ओही समयमे गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा व्यक्तिगत रूपसँ एतेक रास काज केनाइ अकल्पनीय आ अविश्वसनीय अछि। एतेक रास काज हुनक ज्ञान, योग्यता आ मातृभाषा मैथिलीक प्रति हुनक समर्पणकेँ तँ देखाइए रहल अछि संगे-संग एहिमे लगै छै समय आ धन दुनू। एकटा आम व्यक्ति लग आइकेँ समयमे धन आ समय दुनूक अभाव रहै छै आ जिनका लग छनि हुनका लग मोन नहि। एहिठाम गजेन्द्र ठाकुर जीक ऊपर गणेश जीक बुद्धि, सरस्वती जीक ज्ञान रूपी आशीर्वाद तँ छनिहें संगे महामायाक देल ओ विराट करेजा, जे ओ धन वा कोनो तरहक नाम व पुरस्कारक मोह देखने बिना मैथिली भाषा आ साहित्य लेल भगीरथ काज कय रहल छथि। एही भगीरथ काजक लेल हुनकर जतेक प्रशंसा कयल जाए से कम होएत। मैथिली भाषा आ साहित्य प्रति हुनक एहि समर्पणकेँ कोनो मूल्य वा पुरस्कारसँ नहि नापल जा सकैए, ओ अमूल्य अनमोल अछि। कोनो पुरस्कारसँ श्रेष्ठ अछि। मैथिली भाषा आ साहित्यमे हुनकर एहि योगदानकेँ लेल हुनका युग-युग तक याद राखल जायत।


✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

 


गुरुवार, 5 जून 2025

बीहनि कथाक कथा कहानी संगे

हिन्दी साहित्यमे पहिल कहानी किछु लोक “रानी केतकी की कहानी” केँ मानैत छथि। ई कथा सैयद इंशाअल्लाह खान द्वारा 1803 या 1808 मे लिखल गेल छल। ई कहानी मध्यकालीन भारतक प्रेमकथा अछि। कथामे रानी केतकी आ राजकुमार वीरसेनक प्रेम कहानी कहल गेल अछि। ओतहि किछु लोक किशोरी लालक “इन्दुमती” केँ तँ किछु लोक माधवरावक “एक टोकरी भर मिट्टी” केँ पहिल कहानी मानैत छथि। मुदा हिन्दी कहानीक असली विकास प्रेमचंदक कहानी आ हुनक समयसँ भेल।

प्रेमचंदक जीवनकाल 1880 सँ 1936 छल। 1803 सँ पहिने 'कहानी' शब्दक प्रयोग केओ नहि कएने छल। तँ की 1803 वा प्रेमचंदक युगसँ पहिने कोनो कहानी नहि छल? वेद, उपनिषद आ पुराणमे हजारो कहानीक वर्णन अछि, मुदा ओकरा 'कथा' कहल जाइत छल; जेना पंचतंत्रक कथा, जे 300 ई.पू. पहिने लिखल गेल छल।

वर्तमान हिन्दी साहित्यमे कहानीक अर्थ अंग्रेजीक Short Story  सँ लेल जाइत अछि। मुदा हिन्दी साहित्यमे आइ-काल्हि मुख्य कहानीसँ अलग, छोट-छोट कहानी करीब तीन-चारि सय शब्दमे खूब लिखल जा रहल अछि, जेकर नामकरण हिन्दी साहित्यमे 'लघुकथा'क रूपमे भेल अछि। किछु लोक एहि लघुकथाक तुलना मैथिलीक 'बीहनि कथा'सँ करैत छथि, जखन कि मैथिलीमे बीहनि कथा आ लघुकथा दुनू स्वतंत्र रूपसँ लिखल जा रहल अछि।

आब मैथिली कथाक वर्गीकरणकेँ हम सभ एहि रूपमे देख सकैत छी:

  • बीहनि कथा: कथ्य वा संवाद जेकर मुख्य अंग होइत अछि, एक दृश्यमे संपूर्ण कथा संपन्न होइत अछि, आ शब्द सीमा अधिकतम एक सय धरि होए तँ बेसी नीक।
  • लघुकथा: संवादक संगहि भूमिका अथवा बिना संवादक सेहो, एकसँ दू दृश्यमे संपन्न होबाक चाही; एकर शब्द सीमा करीब पाँच सय धरि देखल जाइत अछि।
  • कथा: जकरा हिन्दी साहित्यमे 'कहानी' कहल गेल अछि। मैथिली साहित्यमे कथा वा कथा संग्रहक खूब रचना भेल अछि।
  • दीर्घ कथा: अर्थात् नमहर  कथा; जाहि ठाम विस्तारसँ व्याख्या कए रचना कएल गेल होए। ई एतेक नमहर होइत अछि जे चारि-पाँच टा कथासँ एकटा पोथीक निर्माण भ’ सकैत अछि।

 

आब कने गप्प करैत छी 'बीहनि कथा'क संबंधमे –

बीहनि कथा नव विधा होइतो, आइ ई कोनो तरहक परिचय लेल मोहताज नहि अछि। मैथिलीमे नित्य नव-नव बीहनि कथा आ बीहनि कथाक पोथी लिखल जा रहल अछि। हम एकर इतिहास आ उत्पतिक संबंधमे एतय नहि कहब, मुदा एतवा कहबामे कोनो हर्ज नहि जे बीहनि कथाक स्थापना आ विकास लेल मुन्नाजीक (मनोज कर्ण) भगीरथि योगदानकेँ नहि बिसरल जा सकैत अछि। वर्तमानमे मैथिलीक बीहनि कथाकार सभ दुनियाक बड़का-बड़का भाषाकेँ एहि विधा दिस सोचबा लेल विवश कए देलन्हि अछि। अंग्रेजीमे एकर नामकरण अथवा भाषांतर 'सीड स्टोरी' (Seed Story) कहि भेल अछि। हिंदी आ अंग्रेजीमे जकर कोनो स्थान नहि छल, ओहेन एकटा नव विधाक अग्रज मैथिली साहित्य अछि आ ओ विधा थिक, 'बीहनि कथा'। किछु लोक बीहनि कथा आ लघुकथामे फराक नहि कए पाबैत छथि, मुदा दुनूमे बहुत फराक अछि। बीहनि अर्थात् बीआ (बीज)। तेनाहिते मोनक विचारक बीआ, जे कखनो कतौ फूटि सकैत अछि। विचारक एकटा एहेन बीहनि (बीज) जे लोकक करेजाकेँ स्पर्श करैत, मस्तिष्ककेँ सोचबा लेल विवश कए दए। बीहनि कथाक आवश्यकता समयक संग जरुरी अछि। जेना एक समयमे पाँच दिनक क्रिकेट मैचक प्रचलन छल, ओकर बाद आएल वन-डे क्रिकेट आ आजुक समयक माँग अछि ट्वेन्टी-ट्वेन्टी। तेनाहिते एखुनका समय बीहनि कथाक अछि। बीहनि कथा कोना लिखबाक चाही आओर एकरामे की-की गुण होबाक चाही? संक्षेपमे कही तँ एकटा श्रेष्ठ बीहनि कथामे नीचाँ लिखल गुण होबाक चाही –

  • सम्पूर्ण कथा मात्र एकटा दृश्यमे होबाक चाही: जेना नाटकक मंचन मंच पर होइत अछि आ ओहिमे कतेको दृश्य भ' सकैत अछि, मुदा बीहनि कथाक कथ्य आ कथा दुनू एके दृश्यमे सम्पन्न भ' जेबाक चाही।
  • बीहनि कथाक मुख्य अंग संवाद अछि: संवाद जतेक सटीक आ नीक होएत, कथा ओतेके नीक हेतैक। शब्द चयन एहेन होबाक चाही जे पाठककेँ अर्थ बुझबा लेल सोचय नहि पड़न्हि। जे हम कहय चाहैत छी, ओ तुरन्त पाठकक मानस-पटल पर उतरि जाए।
  • कथाक गप्प पाठकक करेजाकेँ छूबि जाए: पढ़लाक बादो ओ करेजामे दस्तक दैत रहन्हि। कथाक परिणाम वा समाप्तिकेँ फरिछौँट नहि कए, ओकरा पाठकक विवेक पर छोड़ि देबाक चाही।
  • सार्थक उद्देश्य: जँ कथा कोनो सार्थक उद्देश्य वा गप्पकेँ प्रस्तुत करैमे सफल अछि आ समाजक कोनो नीक वा बेजाय पक्षकेँ देखा रहल अछि, तँ ओ सर्वोत्तम अछि।
  • कौतूहल आ अभिरुचि: पढ़बाक कालमे पाठकक मोनमे मनोरंजनक संग-संग रुचि आ कौतूहल बनल रहबाक चाही। एना नहि बुझना पड़बाक चाही जे ओ कोनो प्रवचन सुनि रहल छथि।
  • समसामयिकता: जँ सम्भव होए तँ इतिहास बनि गेल पात्र आ घटना सभसँ बचबाक चाही।

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’



गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

सत्य देखल - श्री शरदिन्दु चौधरी जीक व्यंग्य संग्रह “बड़ अजगुत देखल” केर समीक्षा


श्री शरदिन्दु चौधरी जीक जीवन एकटा पत्रकारिता व साहित्य केर विद्यार्थिक लेल मीलक पाठर साबित भय सकैत अछि। श्री शरदिन्दु चौधरी एक गोट श्रेष्ठ पत्रकार, समृद्ध लेखक आ साहित्यकार तँ छथिए संगे संग ओ छथि एकटा कोमल करेजाक स्वामी। जखन ओ देखैत छथि समाजमे धर्म आ राजनीतिक ओटमे लोक फरेब आ कारी व्यापार कय रहल अछि तँ ओ दुख फेंटल आश्चर्य संगे तमसा सेहो जाएत छथि आ ई सब हुनक मोनक भाव हुनक लेखनीसँ साक्षात्कार होइत अछि।

हुनक भाषा आ भाषाशैली चाहे ओ पत्रकारक रूपे हुएथि व्यंग्यकार बा साहित्यकार रूपे सहज आ मधुर अछि। हमरा एहेन जीवन भरि मिथिला मैथिलीसँ दूरो रहै बला विद्यार्थिकेँ करेजामे हुनक एक एकटा आखर मउध जकाँ मीठ घोलैत पसरि जाइत अछि। ओ जतए जे कहै चाहैत छथि ओ कियो सहजतासँ बुझि सकैत अछि। एहि गुणक कारण भय सकैत अछि हुनक विताएल तीन दशकसँ बेसी समय जे पत्रकारिताक मात्र सेवेटा नहि रहल वरन ओ मैथिली पत्रकारिताक लेल एकटा साक्षात्कार रहला।

रहल जस अपजसक गप्प तँ ई अप्पन हाथमे नहि छैक। हम सभ ओनाहितो बुझै छीयैक जे मैथिली साहित्यमे गुणसँ बेसी गालबजाउन, गुटबंदी आ तूँ हमरा दें हम तोरा देबौकेँ चलन बेसी छैक। मिथिला मैथिलीक समाजक एहनेसन रंग देख कय शरदिन्दु चौधरीक मुँहसँ निकलल होएत “बड़ अजगुत देखल”। शरदिन्दु चौधरीक पोथी “बड़ अजगुत देखल” कहै लेल ई व्यंग्य संग्रह अछि मुदा वास्तवमे ई कामदेवक वाण सनक अछि। जाही वाणक घावसँ सोनीत बहैत कियौ नहि देखै छैक मुदा मनकेँ तार तार कय दै छैक। आओर इहे हाल होएत अछि एकटा सुधि आ निष्पक्ष पाठकक जखन ओ शरदिन्दु चौधरी जीक व्यंग्य संग्रह “बड़ अजगुत देखल” पढ़ैत छथि। असलमे कही तँ “बड़ अजगुत देखल” पढ़ला बाद बुझना जाइत अछि जेना सत्य देखने होई वा सत्यसँ साक्षात्कार भेल हुए। लेखक स्वयं पोथीक भूमिका “मुक्ति पायबाक प्रयत्न”मे कहैत छथि, “ई ने हास्य अछि, नें व्यंग्य अछि, हमर कहबाक एकटा ढंग अछि।”

आ जँ हम कही तँ, “ई ने हास्य अछि, नें व्यंग्य अछि, शरदिन्दु चौधरीक कहबाक एकटा ढंग अछि। जाहिमे देखाइत छैक सभकेँ अपन कर्तव्य आ काज मुदा परचट्ट जकाँ सभकियो आँखि कान केने अपन बंद अछि।

एही व्यंग्य संग्रहकेँ तरकशमे कुल बीस गोट व्यंग्य रूपी वाण राखल अछि, जे समाजक अगुआ, नेता, मठाधीश, संगठाधीश, सभक कृतकेँ देखार कय रहल अछि आ एहिमेँ शरदिन्दु चौधरी जीक कहैक ठंग आ लेखनीक जतेक प्रसंशा कएल जेए से कम।

पहील व्यंग्य, “जनहित”मे कोना करिया कक्का बाढ़ि सहाय काजमे आयल करोड़ो रूपया संतोष झाक द्वारा गवन कय लेलाक कारणे तमसाएल लोकसभकेँ कोना शांतेटा नहि कएला, संतोष झाक कुकर्मकेँ झंपैत अपन अपन धरकेँ भरैकेँ पुरा इंतज़ाम कय सेला। आजुक समयमे सगरो एहिना भय रहल छैक।  तूहुँ खो हमहुँ खाइ छी, जनता जेए चुल्ही तअर।

दोसर व्यंग्य “धन्यवाद ज्ञापन” कोना दुर्गा पूजाक उत्सब धूम धामसँ मनाएल गेल। भांगड़ा, डांडिया, गरबा, बिहू, पहाड़ी नाच सहित देश विदेशक सांस्कृतिक कार्यक्रम बहुत नीकसँ प्रस्तुत केएल गेल। नहि प्रस्तुत रहेए तँ मिथिला मैथिलीक गीत संगीत कला लोककथा आ सांस्कृतिक कोनो कार्यक्रम। सब कार्यकर्ता संयोजक आ कलाकार सभकेँ धन्यवाद ज्ञापन दै काल एकरा स्वीकार करैत कोना करिया कक्काक गला अवरुद्ध भ गेलनि ।

“मोआबजाक खोजमे” वस्तुतः मिथिलाक बाढ़ि आ माओवादीक संकट आ सरकार द्वारा कोनो निवारण नें कय कोना छूच्छे मोआबजा द क अपन इतीश्री बुझैत अछि। मोआबजा सेहो की तँ पाँच शेर अनाज वा किछु सय टाका। एहि बहाने एहीठाम मिथिलाक धरती परक लोकक मूल्य लगाएल गेल अछि। वस्तुतः रोचक सत्य, अकल्पनीय आ चिन्ताजनक। वास्तवमे शरदिन्दु चौधरी जीक कहबाक ढंग ज़बरदस्त अछि।

‘की मथै छी।’

‘मिथिला।’

‘की तकै छी।’

‘मैथिली।’

‘भेटल ?’

‘नइं।’

ई उत्कृष्ट संवाद थिक “की मथै छी ?”सँ ज़बरदस्त। प्रतेक बर्ख विद्यापति पर्वमे मिथिला मैथिली विकासक निमित्त काज आ ओकर विभिन्न पक्षकेँ देखाबैत “की मथै छी?” व्यंग्य व्यंग्य नहि भय कऽ वास्तविक चित्रण अछि जेकरा लेखक अपन शव्दमे कहि हमरा सबहक गालपर एकटा जोड़गर थापर मारैत सुतल मिथिलाबासीक आँखि खोलैक पूरा प्रयास केने छथि।

“दिव्य ज्ञानक प्राप्ति”मे स्तनपान सप्ताहकेँ केन्द्रित करैत कतेक आसान शव्दमे लेखक सबहक सामने गप्प राखैमे सफल छथि। संगे चिन्तित सेहो। समाजमे स्त्रीकेँ कोना एकटा वस्तु बुझल जा रहल अछि। स्त्री सेहो ओहिमे खुस भ अपनाकेँ वस्तु मानि, हुनक वस्तु नहि खराप भ जाइन तेँ डरे कोना बच्चाकेँ ईश्वर प्रदत अमृतसँ दूर राखि अपन एकटा नव प्रवृत्तिक निर्माण कय रहल छथि।

दर्शन सुदर्शन”मे दुकान जकाँ मिथिला मैथिलीक संस्थान/ विद्यापति पर्वक संस्था, पुरस्कार वितरण, कवि सम्मेलनक वास्तविकताकेँ उजागर केएल गेल अछि। ख़ास कय पटनाक चेतना समितिक कार्य प्रणाली आ अवरुद्ध मिथिला मैथिलीक विकास कार्यकेँ कटाक्ष करैत सम्पूर्ण व्यवस्थाकेँ नांगट कय देने अछि। शरदिन्दु चौधरी जीक शव्देमे एकटा निष्पक्ष आ निरगूट साहित्यकारक लेल – “ जाइत छी तँ जाउ, मुदा ई जानि लिअ जे कतबो लिखब, कतबो पढ़ब अहूँक वैह गति होएत जे विद्यापतिकेँ भेलनिहें। अहूँ ओहिना कोनो कोनटामे मुँह नुकोने नुकायल रहब। नाम सभ अवश्य लेत, सप्पत भने अहाँक खायत, संकल्पो अहीँक नामपर लेत, मुदा करत वैह जे ओकरा मोन होयतैक। पड़ाइत रहब तँ एहिना पड़ाइते रहि जायब।”

“हम मैथिल छी” मे उजागर केने छथि देश सहित मिथिला आ खासकय मिथिलाक गामक बेरोज़गारीक मार्मिक दृश्य। संगे जाहि काजमे मैथिल सबसँ आँगा अछि ओकर ज्ञान करबैत छथि, आ ओ काज अछि राय देनाई।

चुनावी तुक्कामें आजुक समयकेँ राजनीति, चुनाव आ चुनाव व्यवस्था, नेता आ जनताक बीचक सम्बंध एक एक टाक खोंइचा छोरा कय ओकर वास्तविकताकेँ देखार केएल गेल अछि। कोना नेता लोकनि भोटरकेँ भेंड़ा बुझि ओकरा अपना पक्षमे करबा लेल जाति पातिक फूटवार कय अप्पन लक्ष साधैमे निपुण छथि। ओतय जनता सेहो आब बूझनुक होयबाक चेष्टामे लागल अछि। जाति पातिसँ उपर भ जीवन रक्षाक बातपर, बात करैक लेल तैयार भ रहल अछि।

कोना नेतासभ काजक बलपर नहि टाकाक बलपर जनताकेँ किनैक चेष्टा करैत अछि। कोना पार्टी सभक प्रदेश कार्यालयमे टिकटक बिक्री आ ओकर बादो असफल भेलापर कोना पार्टीक अदला-बदली होइत छैक।

रौदी दाहीक कारणक संगे कोनो उद्योग धंधाक नहि रहने कोना मिथिला समाजक युवाशक्ति रोज़गारक खोजमे पंजाब हरियाणा ओगरने छथि, आ गाममे बचल लोग आवयबला मनीआर्डर पर वकोध्यान लगोने रहैत छथि। कोन मुँहे नेतासभ एहि मूलभूत आवश्यकताकेँ नहि देख पबैत छथि। नेता की नेता जनतो सब अपन अपन वास्तविकता व मूलभूत समस्याकेँ नहि देखि जातिपातिकेँ राजनीतिमे ओझरा अपन विकाससँ दूर पड़ेल जाएत छथि। राजनीति पार्टीमे चोर बनोलक अधिकता आ झगड़ाक एतेक नीकसँ लेखक उजागर केने छथि से वास्तविकतासँ साक्षात्कार करबैत, हमरा सभकेँ अपन राजनीति आ समाजीक व्यवस्थापर एकबेर फेरसँ सोचै लेल विवश कय दैइए।

“हम की करबै सरकार” मे जनताक संगे संग व्यापारी वर्गक व्यथाकेँ बहुत नीकसँ उजागर कएल गेल अछि। कोना व्यापारी सभ महंगाई संगे हाटक चुंगीं, बाजारक रंगदारी संगे संग चुनाव टेक्स सेहो सहैत अछि। चुनाव टेक्स नहि देलापर जानमालकेँ से हानि, आ ई ककरोसँ छूपल नहि छैक। उपरसँ ग्राहकक चिखनापर चिखनाक मांग।

समाजक सब पक्षक अव्यवस्थापर एतेक सटीक आ सूक्ष्म ध्यान देनाई ई शरदिन्दु चौधरी जीक कलमकेँ अलावे आन ठाम नहि देखा सकैत अछि ओहो एतेक सहज आ व्यंग्यक रूपमे।

मिथिलाक घूरतर बैसल लोकसभ सेहो आइ काल्हि आर्थिक आ राजनीतिक व्यवस्थासँ व्यथित भय एहने गप्पसप्प करैत छथि। मिथिलाक आमलोकेँ एखन धरि चुनावक गरमी ओतेक नहि गरमा सकलै जे ओ घूर छोड़ि चुनावक मैदानमे उतरि, समाजक विकास लेल काज क सकै। ओ तँ पचास वर्षसँ चुनाव आ ओकर कार्यक्रमक आदि भ चुकल अछि। कोनो नेता आबैत हुनका लेल सब एकसमान जेहने नागनाथ, तेहने साँपनाथ। आ एहि नागनाथ साँपनाथकेँ झगड़ा आ तुलनात्मक अध्ययन करैत हम सब शरदिन्दु जीक एहेन हीराक चमककेँ नहि देखैत हुनका ओ मान सम्मान नहि द पेएलिअनि जिनकर ओ हक़दार छथि। ईहे विडम्बना अछि मिथिला मैथिलीक साहित्य, समाज आ राजनीतिक, नागराज सांपराजमे ओझराएल, ओहिसँ बाहर निकैल आगू देखैक आवश्यकता हमरा सबकेँ अछि।

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’

(विदेह, १५ नवम्बर २०२२ क अंकमे प्रकाशित)

 


 

शनिवार, 2 अगस्त 2014

मैथिलीमे एकरूपताक अभाब


“कोस-कोसपर बदले पानी, तीन कोसपर बदले वाणी।” ई कथ्य किनकर अछि, हम नहि जानि मुदा अछि जग जाहिर। कोनो एहन सुधी मनुख नहि जे एहि पाँति सँ अनभिक होथि। आ ई कथ्य सोलह आना सत्य अछि। एक गामसँ दोसर गामक इनार पोखरिक पानिमे अन्तर आबि जाइ छैक। ओना आब इनारक जमाना तँ रहल नहि। गामक घरे-घर चापा कऽल चलि गेलै आ शहरक घरे-घर टंकी। टंकीक पानिमे तँ कनिक समानता देखलो जा सकैत अछि मुदा एक आँगनक चापा कऽलक पानिक   स्वाद दोसर आँगनक चापा कऽलसँ भिन्न होएत। परञ्च हम एहिठाम पानिक संदर्भमे गप्प नहि कहि कऽ भाषाक पक्षक मादे कहै चाहैत छी। पानि जकाँ भाषाक मिजाद सेहो सगरो तीन चारि कोसपर बदलल देखाइत छैक। ई असमानता मिथिले-मैथिलीमे नहि भऽ कँ कमबेसी सम्पूर्ण भारतीय वा अभारतीय भाषामे देखार भऽ चुकल अछि आ ओ गुण कोनो भाषाक विकास आ ओकर उन्नतिक पक्षक धियान राखि ठीके अछि। पानिक मादे जेना कोनो नदी हेतु ओहिमे बहाब भेनाइ स्वभाविक छैक नहि तँ ओ नदीसँ डबरा भऽ जेतैक। तेनाहिते कोनो भाषाक चहुमुखी विकास लेल ओहिमे निरन्तर बहाब, अर्थात नव-नव शव्दक वृद्धि, आन-आन भाषाक सटीक आ प्रचलित शव्दकेँ स्वीकार केनाइ आवश्यक छैक। आ दुनियाँक ओ कोनो भाषा जे अपना आपके एकटा बहुत पैघ रुपे स्थापित केलक, ओकर विकासक इहे अबधारना वा गुणक कारने संभब भेल अछि। हमरा इआद अछि जखन अंग्रेगीक प्रथम शव्दकोष बनल रहैक तँ ओहिमे मात्र एक हजार शव्दकेँ जगह भेटल रहैक आ आइ..... ?

मुदा मैथिलीक संगे, ई गुण किछु बेसीए अछि। किएक तँ मैथिल किछु बेसीए बुद्धिजीवी, शिक्षित आ चलएमान छथि। जतए-जतए गेला अपना भाषाकेँ अपना संगे नेने गेला आ ओतुका भाषाक शव्दकेँ अपना संगे जोड़ने गेला। ओनाहितो अपन मिथिलांचलक प्रतेक दू तीन कोसक बादक भाषामे भिन्नता अछि। पछिमाहा मैथिली पुरबाहा मैथिली, दछिनाहा मैथिली उत्तर भरक मैथिली, कमला कातक मैथिली, कोसी कातक मैथिली। एक्के गाममे बड्डकाक मैथिली, छोटकाक मैथिली। नीक गामक मैथिली तँ बेजए गामक मैथिली। शिक्षित मैथिली तँ अशिक्षित मैथिली। आमिरक मैथिली तँ गरीबक मैथिली। एक्के बेर एतेक बेसी असमानता भऽ गेल अछि जे कतेक ठाम तँ मैथिली नहि कहि कऽ दोसर नामसँ संबोधन भँ रहल अछि।

अपन जाहि गुणक कारण दुनियाँक कोनो दोसर भाषा विकासक रस्तापर चलि रहल अछि, ओतए हमर सबहक मैथिली एहि क्रममे पछुआ रहल अछि। एकर की कारण ? तँ उत्तरमे हमरा मैथिलीक एकटा लोकोक्ति इआद आबि रहल अछि। “जे बड्ड होशियार से तीन ठाम गूँह मखे।” एहि लोकोक्तिकेँ कनी फरिछादी; एकटा पढ़ल लिखल विद्वान् गूँह मँखि गेला, आब ओ एहि गप्पक खोजमे लागि गेला जे, जे मखलौं से गूँहे अछि वा किछु आरो। एहि क्रममे ओ पएरक गूँहकेँ अपन हाथक आंगुरसँ छुला बाद नाकसँ सुंघला। लगलनि ने तीन ठाम, पएरमे, हाथक आंगुरमे, अन्तोगत्बा नाकमे। ओतए एकटा दोसर व्यक्ति बेसी खोज बिन नहि पैर कऽ मखला बाद पानिसँ धो लेलक। “अति सर्वत्र वर्जिते,” इहे रोग मैथिली भाषाक विकासमे लागि गेल अछि। जाहि गुणक कारणे हम आगू बढ़ि सकैत छलहुँ, अपन ओहि गुणकेँ कारण ठमैक गेल छी।

एहि गुण, अतिसय गुण वा कही तँ अबगुनकेँ हम समान्य लोककेँ लेल जेनाकेँ तेना छोरिदी, विकास क्रममे समयक संगमे मानिली जे ओ अपने ठीक भए जेतैक। मुदा जे अपनाकेँ बुद्धिजीवी कहैत छथि, शिक्षित आ मैथिली विकासक ठेकेदार अपनाकेँ मानैत छथि तिनका सभकेँ तँ कदापि नहि छोरल जए आ हुनके सबहक एकरूपताक अभाबे मैथिलीक गति अबरुद्ध भेल अछि। एकटा समान्य लोक ककरा देखत, पढ़त ? एकगोट बुद्धिजीवीकेँ, साहित्यकारकेँ, पत्र-पत्रिकाकेँ, ऑडियो-विडिओ मिडियाकेँ मुदा एखुनका समयमे मैथिली भाषाक एकरूपतामे कतौ समानता नहि अछि। एहिठाम हम समान्य लोकक गप्प नै कहि रहल छी, पढ़ल-लिखल, मैथिलीमे ऑनर्स, एमए०, पिएचडी करै बलाक गप्प कए रहल छी। जिनक सबहक कतेको मैथिली पोथी छपा कऽ समान्य लोकक हाथमे आबि गेल अछि, मैथिलीक पत्र-पत्रिकाक सम्पादक आ सम्पादक मण्डलीक गप्प कए रहल छी। कतेको मैथिलीक पुस्तक छापि चुकल प्रकाशकक गप्प कए रहल छी। ऑडियो-विडिओ बेच कऽ अपन कमाइ करै बला चैनल आ म्यूजिक विडिओज कम्पनीक गप्प कए रहल छी।

सदति भाषाक एकरुपताक अभाब अछि। कनिक काल लेल किनको अज्ञान मानि कए क्षमा कएल जा सकैत अछि मुदा ओहि खन कि कएल जे जखन कियो गोटा अपनाकेँ मुख्य सम्पादक, सम्पादक, मैथिलीक ऑनर्स, एमए पिएचडीक चश्मा पहिरने, ओहि घोड़ा जकाँ लगैत अछि, जेकरा आँखिपर हरियर पट्टी बान्हल छैक आ ओकरा सगरो दुनियाँमे हरियरे-हरियर नजरि अबैत छैक। ई बिडम्बना मैथिलीए संगे किएक ? जीवन भरि अपन घर-परिवारमे मैथिली नहि बजै बला मैथिलीक ठीकेदार बनि जाइत छैक किएक ? एहिठाम हम विदेह ग्रुपक प्रसंशा करैत छी जे ओ अन्तर्जाल आ प्रिन्ट दुनू रूपे मैथिली भाषाक समृधि आ एकरूपता लेल भागीरथी प्रयासमे लागल छथि।

कतेको प्रकाशकक पोथी, कतेको लेखक आ साहित्यकारक कृति, कतेको पत्र-पत्रिका, फलाँ फलाँ मैथिली एकादमीक पोथी आ पत्रिका हमरा लग अछि जाहिमे विभक्ति केर प्रयोग हिन्दीक तर्जपर कएल गेल अछि। कतेक मैथिलीक महान-महान विभूतिसँ हम व्यक्तिगत रुपे संपर्क कए हुनका सभसँ निवेदन केलहुँ जे, मैथिलीमे विभक्तिकेँ सटा कए लिखबा चाही मुदा नहि, ओहे आँखिपर पट्टी बान्हल घोड़ा बला हिसाब। एकटा मुख्य-सम्पादक, सम्पादक, ऑनर्स, एमए, पिएचडी, केनहार अपनाकेँ मैथिलीक ठीकेदार बुझनाहर, दोसर लोकक गप्प कोना मानि लेता। लागल छथि सभकेँ सभ मैथिलीकेँ हिंदी टच देबैमे। जीवन होए वा साहित्य ई गप्प मानै बला छैक जे लोक गल्तीए कए कऽ आगू बढ़ैत छैक। मुदा ओइ लोक आ संस्थाक कि जे गल्तीओ करत, गल्तीकेँ मानबो नहि करत, आ बाजु तँ लड़बो करत, ई तँ ओहे गप्प भेल जकर लाठी तकरे भैंस मुदा एहिठाम गप्प भैंसक नहि छैक, एहिठाम गप्प एकटा प्राचीन, समृद्ध आ श्रेष्ठ भाषाक भविष्य आ एकरूपताक छैक।

दुनियाँक सभ समृद्ध भाषामे एना देखल गेलैए जे आम बोलचाल आ साहित्य, शिक्षा वा सार्वजनिक भाषामे भेद पाएल जाइत छैक। आम बोलचाल आ प्रचलनमे बहुत सगरो छूट छैक वा बन्हँन केर आभाव छैक मुदा साहित्य, शिक्षा आ सार्वजानिक मंच हेतु ओहि भाषाक एकटा मानक रूपक प्रयोग कएल जाइत छैक। एहि तरहक अभाब मैथिलीक संगे किएक ? मैथिली साहित्यकार, सम्पादक, प्रकाशक मैथिलीक मानक रूपक प्रयोग किएक नहि करैत छथि। कतेको जन्मान्हर(ज्ञान रुपे) तँ सिखैक डरे एक्के बेर कहता, “चलू चलू अहाँ फलाँ-फलाँ ग्रुपसँ जुड़ल छी ई ओकर सबहक चर्च छै।“ यौ महराज ई चर्च अहाँ लगकेँ अनलक ई नहि देखि, ई देखू जे की अनलक। कनिक देखैक अपन नजरि बदलि लिअ तँ अहूँक विकास आ संगे संग भाषाक विकासक सेहो सम्भावना मुदा नहि हमर एकटा आँखि फूटेए तँ फूटेए तोहर दुनू फोरबौ। आ एहि फोरा फोरीमे ई किनको चिंता नहि जे ओहि माए बाबूक कि हाल जिनक करेजाक टुकरा अपन दुनू छी।

मैथिलीमे एकरूपताक अभाब, इस्थीति, कारण आ निदानपर चर्चा करी तँ एकटा बेस मोटगर किताब बनि जाएत मुदा मैथिलीक अबरुद्ध विकास हेतु हमरा सभकेँ अपन अपन आँखि नै मुनि एहि चर्चाकेँ आगू बढ़ाबए परत। आ अति शीर्घ मैथिलीक वर्तमान पत्र-पत्रिकाक सम्पादक, प्रकाशक, साहित्यकार, लेखक आर कोनो सार्वजानिक मंचकेँ देखनिहार लोकनि सभकेँ मानक मैथिलीकेँ स्वीकार कए ओकरा आगू आनए परत नहि तँ ओ दिन दूर नहि जहिया हमर सबहक धिया पूरा एकरा इतिहासक पोथीमे पढ़त।
© जगदानन्द झा ‘मनु’

सोमवार, 3 मार्च 2014

मिथिलाक माटिसँ सिनेह राखू


सबरंगी बात, आलेख - डा० कैलाश कुमार मिश्र 
नेना जखन रही तँ माए सदिखन कहथि: "बंटि चुटि खाइ राजा घर जाइ , असगर खाइ डोमा घर जाइ" । ई  गप्प तखन कहथि जखन घरमे कोनो खेबाक किंवा खेलबाक बस्तु कम होइत छल आ हम सभ भाइ बहिन बेसीसँ बेसी लेबाक लेल झगड़ा करए लगैत रही। माए केर आज्ञा मुदा वात्सल्यसँ भरल ई होइत छल जे जतबे वस्तु अछि ओकरा अपनामे सामंजस्यक संग बांटि लिअ' । फेर की,जे कियोक भाइ बहिन बटैैत छलहुँ से पूर्ण निष्ठाक संग। सबहक मुँहपर प्रसन्नताक भाव। कमो  समानमे परिपूर्ण होबाक संतोष। हृदयसँ तिरपीत भेल मोन आ मस्तिष्क ।  ओहि समानपर सबहक अधिकार आ ओहि समानसँ सभकेँ सिनेह। जखन ई बात स्मरण करैत छी तँ बुझना जाइत अछि जे इहे बात मैथिली भाषाक प्रति समस्त मिथिलामे आ मिथिलासँ बाहर रहनिहार सभ वर्ग,सम्प्रदाय, जाति, धर्म आदि केर मैथिली समुदायमे किएक नहि होइत छन्हि?  कहीँ मैथिली भाषाक रस आ स्वरक बट्बारामे हमरा लोकनि छोट-पैघ, ऊँच-नीच, जाति-वर्ग क्षेत्र आदिक नामपर कुकरौझ तँ नहि करए लगैत छी?  ई बड़का प्रश्न अछि जकर तहमे जेनाइ आवश्यक। 
मैथिली भाषा आ साहित्यक तुलना कंसार वालीसँ कएल जा सकैत अछि। जखन नेना रही तँ बीचमे एक अधिबेसु महिला साँझ कए कंसार लगबैत छली। आमक गाछक छाहरिमे एकटा फुसही घर आ घरमे एकटा चुल्हा। चुल्हा जरेबाक लेल पात, बाँसक करची आ आन आन तरहक अनेरुआ जारनि। दूटा फुटलाहा तौलाकेँ खपड़ि चुल्हामे चढ़ल। एकटामे बालु आ दोसरमे अन्न भुजबाक प्रयास। गामक घर सभसँ बच्चा एवं आन आन लोक सभ अनाज जेना चाउर, गहुम,बदाम केराउ आदि कंसार वाली लग लए कऽ अबैत छल। कनसार वाली ओहि अन्न सभकेँ दक्षताक संग भुजि दैत छलैक आ बदलामे एक दू मुठ्ठी अन्न अपन मेहनतानाक तौरपर राखि लैत छली। ओहि कंसारपर भुजा भुजेबाक अधिकार सबहक छलैक। सभकेँ ओहि महिलापर विश्वास छलैक। 
हमरा जनैत मैथिलीकें ओहिना सभ वर्ग, जाति आ क्षेत्र (मिथिलाक क्षेत्र )क पिआर आ सिनेह भेटबाक चाही  मुदा एहेन स्थिति अछि नहि। हमरा लोकनि छोट-छोट गप्पपर लड़ैत छी। हालहिँमे जगदीश प्रसाद मंडलकेँ गुवाहाटीक समारोहमे मुख्य अतिथि नहि बनए देल गेलन्हि। नचिकेता जीकेँ पोथीपर हमरा लोकनि उचित धियान नहि देलहुँ। कियोक बजलाह जे विद्यापति हजाम छलाह तँ बहुतो रास लोक आमील पी लेलन्हि। नारा देमय लगलाह जे विद्यापति ब्राह्मण छलाह।  मुख्य गप्प ई अछि जे विद्यापति मिथिलाक गौरव छथि। एक घरीकेँ लेल मानि लिअ' जे विद्यापति हजाम छलाह तँ की ओ महान नहि छथि? महानताकेँ जाति धर्मसँ की मतलब ? विद्यापति जे छथि वा जे छलाह से अपूर्व छलाह। जखन ई विवाद पढ़लहुँ आ पक्ष आ विपक्ष दुनूक वार्तालाप देखल तँ मोन घोर भ गेल। इहे थिक मैथिलीक दशा। हमरा लोकनि मैथिलीक नामपर जाति-पांतिक संकीर्णतामे डूबल छी। धिक्कार अछि!
एखन एक नीक परम्पराक विकास भए रहल अछि। तथाकथित छोट जातिमे मैथिली भाषा, साहित्यक प्रति रुझान बढ़ल अछि। नव-नव कवि , लेखक साहित्यकार, सृजनशीलतामे उत्साहित छथि। नव बिम्ब नब भावनाक जन्म भए रहल अछि। हलांकी किछु लोक जे पहिनेसँ बिना जनने मैथिलीपर धाक जमेने छथि से लोकनि एहि नव रचनाकार लोकनिकेँ अस्तित्वकेँ स्वीकार करबाक लेल तैयार नहि छथि। होइत छन्हि जेना हुनकर बपौती सम्पतिपर दोसरो लोक आक्रमण कए रहल होन्हि। 
ऐना किएक ? मैथिली लोक भाषा अछि। लोकभाषा ओ भेल जकरा लोक व्यवहारमे प्रयोग कएल जाइत होइ। लोकभाषा किसान,खेतिहर, बोनिहर,आ विद्यार्धि-विद्वान, महिला-पुरुष, आ कार्यालय सभकेँ जोड़य बला भाषा थिक। लोकभाषा ज्ञान आ शिक्षाकेँ सम्हारै बला भाषा थिक। लोकभाषा सृजनताक भाषा थिक। लोकभाषा सबहक भाषा थिक । एहि भाषामे अगर अनेरे अतिक्रमण करबैक, एकर आत्माकेँ खंडित कए संस्कृत एवं आन भाषाक कठिन शव्द घुसेरि एकरा जटिल बनेबैक तँँ ई किछु फंतासि लोकक भाषा भ' जाएत। राजनीतिकरण करबैक तँ भाषा अपन साँस तोरए लागत। निष्प्राण होबए लागत।
हमरा लोकनि विद्यापति केर माला जपैत छी मुदा बिसरी जइत छी जे विद्यापति  देसी भाषाक पक्षधर छला। हुनकर गीत आ लोक रचनाकेँ  खेतक हरवाहासँ मंदिरक पुजारी धरि सभ पसीन करैत छल। मिथिलाक महिला लोकनि एक कंठसँ दोसरक कंठक मध्य पीढ़ी दर पीढ़ी विद्यापति पदावलीकेँ जीअने रहलीह।  नहि कोनो पाण्डुलिपि आ नहिए  कोनो पुस्तकालयकेँ  जरुरत परलनि  हुनका लोकनिकेँ । एतवे नहि कतेको
महिला आओर  पुरुष तँ  विद्यापति केर पदावली परमपरामे अबै बला कतेको  रचनाकेँ  विद्यापति नामे जोड़ि देलनि।
बादमे मैथिलीकेँ आवसकतासँ बेसी संस्कृतीकरण होबअ  लागल। लोक सब संस्कृतक शब्दावलीसँ  मैथिलीकेँ  अनेरे जनमानससँ  दूर करबाक प्रकृतिमे लागि  गेलाह । इमहर खाँटी  शब्दावलीक प्रयोग करय वालाकेँ  उपेक्षा  होबअ लागल। खाँटी  शब्दक उपयोग केनाइ  अशिक्षा  आ अज्ञानताक परिचापक होमय लागल। फेर की छल मैथिली छोटसँ छोट होइत गेलीह  अतवे नहि, नहीं मैथिली भाषाकेँ क्षेत्रीयताक आधारपर सेहो बांटी देल गेल।
उँच -नीच कए  देल गेल। पछिमाहा-दछिनाहा, पुबहा कहि ओहि क्षेत्रक लोकक उपहास केलक।  खांटी  मैथिली विलुप्त भेल जा रहिल छली आ संस्कृत  निष्टमैथिली किछु वर्ग आ समुह  केर बंदनी भऽ गेल छली। भाषाकेँ  वर्ग विशेषसँ जोड़ने विधवंसकारी भऽ  सकैत अछि।  एकर जीवंत उदहारण थिक उर्दू भाषा। उर्दूक अर्थ भेल बजार  एकर विकास सैनिक केन्तेनोमेंट एरियामे सैनिक सब जे विभिन्न प्रान्तसँ होएत छल ओ सब स्थानीय लोक सभसँ आपसमे  वार्तालाप करबाक हेतु सम्प्रेषण केर भाषा अथवा बोली विकसित केलन्हि।  बोलीमे कतेको  तरहक भाषाक कतेको  तरहक शव्दक प्रयोग भेलैक सहजताक संग धीरे धीरे उर्दू विकसित होमय लागल। उर्दू  हिन्दवी परम्परामे आगा बढअ लागल। समस्त उत्तर भारत पंजाब आजुक पाकिस्तान पूर्वी भारत अर्थात बिहार आ पूर्वी उत्तर प्रदेश  धरि  ई  प्राणवान भ गेल। ई जनमानस केर भाषा भ  गेल। प्रेमचंदसँ  ल क आगाँ  सब कियोक उर्दूमे लिखय लगलाह। पूरा पंजाब
हरयाणा आ कश्मीरक हिस्सा  उर्दूमय भ गेल। एहि भाषामे रचनाक ढेर लागि  गेल। बिभाजनक बाद भारत आ पाकिस्तान दू भाग भ गेल। जे मुसलमान भारतमे बचल रहि  गेलाह कहि नहि किएक उर्दूकेँ मुसलमानक अस्तित्वसँ जोड़ि कए देखए लगलाह। राजनीतिसँ प्रेरित भए नेतासभ उर्दूकेँ मुसलमान वर्गक भाषासँ जोड़ि कए देखए लगलाह। रचना-धर्मितामे मंदी आबए लागल। हिन्दू लोकनि अपनाकेँ हिंदीसँ जोड़लनि। फिराक गोरखपुरी, गोपीचंद नारंग, गुलजार सब कियो उर्दूमे लिख एहि भाषाकेँ समृद्ध केलनि। मुदा उर्दुक गध्य साहित्यमे इजाफा नहि भेल। लोकक मोन टूटि गेलैक। पध्य तँ किछु प्राणवान रहबो केएल मुदा साहित्यक पतन सहजहि  परिलक्षित होइत छैक। जँ मैथिलीकेँ सेहो अहिना रखलहुँ तँ मैथिलीक अस्तित्व डामाडोल  भए जाएत।
मैथिलीमेँ सर्वहारा विचारधाराक विकास केनाइ, नव शव्दकोष आ नव शव्दावलीक विकास, लोक  परम्पराकेँ जोड़नाइ सब वर्गक भाषा आ मनोदशा बुझनाइ आवश्यक अछि।  आबू सब गोटे मिल कए मैथिली भाषा आ साहित्यक विकास करी। तखने एकटा ठोस  मैथिली भाषा आ साहित्यक विकास संभव अछि।   
।।जयति मिथिला, जयति मैथिली ।।
(सभार : मिथिलांचल टुडे पत्रिका)