अनलौं करेजा हमर ई स्वीकार करु
हमरासँ एना अहाँ नै बेपार करु
गरदनि उठा कनिक हमरा नै देखबै
हम आब एतेक कोना सिंगार करु
सस्ता महग बाढ़ि रौदी सगरो भरल
सोइच गरीबक अहाँ किछु सरकार करु
हरलौं कते युगसँ तन मन धन बनि अपन
नै आब ऐ आतमा पर अधिकार करु
झूठक बटोरल अहाँकेँ बहुमत रहल
‘मनु’ नै सड़ल बाँटि जनता बेमार करु
(बहरे सगीर, मात्राक्रम - 2212-2122-2212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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