हँसि हमर गप्प सुनलौं अहाँ
दर्दकेँ नै तँ बुझलौं अहाँ
दाँतकेँ बीचमे जीभ सन
मोनमे सच्च मुनलौं अहाँ
चिन्हलौं नै हमर मोनकेँ
जानि धनहीन घुमलौं अहाँ
देखते रंग दुनियाक ई
मोनकेँ तोरि झुमलौं अहाँ
छोड़ि दुखमे खुशीकेँ पकड़ि
कोंढ़ ‘मनु’ केर खुनलौं अहाँ
(बहरे मुतदारिक, मात्राक्रम 212-212-212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें