सुख भरल संसार चाही
दुखक नै अंबार चाहीमोन सदिखन खूब हरखे
बमक नै टंकार चाही
भरल घर मिथलाक ज्ञानसँ
अन्नकेँ भंडार चाही
डोलि अम्बर फूल बरखे
भक्तकेँ झंकार चाही
सभ कियो 'मनु' हँसिक' भेटे
एहने संसार चाही
बहरे रमल, (२१२२-२१२२)
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