करेजामे अपन हम की बसेने छी
अहाँक नामटा लिख-लिख नुकेने छी
बितै अछि राति नहि कनिको कटै अछि दिन
पियाक बाटमे पपनी सजेने छी
हमर ठोरक हँसीकेँ देखि नहि हँसियौ
अहाँ हँसि लिअ दरद तेँ हम दबेने छी
हमर जीवन अहाँ बिनु नहि छलै जीवन
मनुक्खसँ देवता हमरा बनेने छी
गजलमे ई निसा आँखिक अहींक ‘मनु’
बुझू नहि हम महग ताड़ी चढ़ेने छी
(बहरे हजज, मात्राक्रम 1222-1222-1222,
मतलाक दोसर पाँतिमे, अहाँक गणना 122 मानल गेल अछि, 'क' केँ 'हाँ' केर दीर्घताकेँ कारण या गजलक प्रवाहमे 2 मानक छूट लेल गेल अछि।
तेसर शेरकेँ दोसर पाँतिमे पियाक गणना 122 मानल गेल अछि, 'क' केँ बाद ‘बा’' केर उच्चारणक प्रवाहकेँ कारण ‘क’ पर वजन पड़ैत अछि या गजलक प्रवाहमे 2 मानक छूट लेल गेल अछि। तेनाहीते मकताक पहिल पाँतिमे, अहींक गणना 122 मानल गेल अछि, ‘क’ केँ गजलक प्रवाहमे 2 मानक छूट लेल गेल अछि। )
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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