पूष मास, जाड़ अपन चरम सीमापर। लगातार पन्द्रह दिनसँ शीतलहरी। गामक एकटा टूटल-फूटल खोपड़ीक असोरा। जाड़सँ बचक हेतु असोराक बाँकी दुनूकात बोड़ाक ओहाड़। एकटा पुरान टूटल-फूटल चौकीपर पुआरक ओछैन, ओहिपर करीब सत्तरि वर्षक बेमार असहाय कमलू। माए-बाबू बड्ड सिनेहसँ ओकर नाम कमल रखने रहथि, मुदा अभाव आ गरीबीसँ संघर्ष करैत-करैत कमलसँ कमलूमे बदलि गेल ।
गरीबी आ बुढ़ापा, ओहिपर बीमारीसँ सताएल जीर्ण-शीर्ण शरीर, अभावक कारणे अपन बएससँ दस वर्ष बेसीक लगैत छल। ऊपरसँ जाड़क एहन हाल। जाड़सँ कापैत लगातार खोंखी करैत। खाँसैत-खाँसैत कखनो बीचमे राहत भेटै छैक तँ मुँहसँ, कहु तँ करेजासँ दर्दक थकान संगे दुख मिलल आह ओकर मुहसँ निकलैत छैक। ओहि आहसँ किंचित एक बेर पाथरो पिघलि जाए, मुदा कमलूक आह सुनय बला आ ओकर दर्दकेँ बुझय बला ओहिठाम कतहु केओ नहि। नहि केओ देखभाल करय बला आ नहि केओ पुछय बला। मुदा कमलूक आह आ खोंखीकेँ शाइद एहि गप्पक ज्ञान नहि, तैँ तँ ओ रूकबाक नाम नहि लय रहल छल। खोंखी आओर बेसी असहनीय आ विभत्स भेलजा रहल छलै।
खोंखीक बेगकेँ सम्हारबामे असमर्थ, कमलू एकाएक अपन सम्पूर्ण बलकेँ इकठ्ठा करैत अपन दुनू हाथसँ छातीकेँ कैस कए दबाबैत बैस रहल, कि तहने ओकरा पानिक तलब महसुस भेलैक। आ ओकर मुहसँ अनायास निकलि पड़लै, "पानि -पानि "
मुदा! अभागा कमलू! असहाय कमलू! ओहिठाम ओकर वास्ते एक घूँट पानि दय बला कतहु केओ नहि। ई विचार कमलूकेँ मोनमे अबैत देरी ओकर मुँहपर दर्द भरल व्यंग्यक एकटा मुस्की चमकि गेलैक, जेना ओ अपन शब्दपर पछता रहल होए। अपन दर्दकेँ ठोरपर आनि दाँतसँ कटैत, लाठीक सहारा लैत चौकीक नीचाँ राखाल पानिक लोटा लेबक लेल झुकल। बहुत संघर्सक बाद लोटा उठाबैत जल्दी-जल्दी दू घूँट पानि अपन हलकमे उतारि लेलक। परञ्च पानि पीबैक बाद ओकरा लग एतेक बल नहि रहलैक जे ओ लोटाकेँ फेरसँ नीचाँ राखि सकै। लोटा ओकर हाथसँ छूति कए गुरकि गेलैक। लोटाक बचल पानि चारू कात नीचाँ बहि कए जेना कमलूक भाग्य आ एकाकीपर ठहाका लगाकए हँसैत होए।
कमलू सेहो अपने खाली लोटा जकाँ चौकीपर पसरि जाइत अछि। पड़ला बाद ओकर दहिना हाथ ओकर दुनू आँखिकेँ झँपि दै छैक, जेना अपन आँखिकेँ झाँपि कए नोर नुकाबैक प्रयास कए रहल होए। मुदा निर्लज्ज नोर थिक की रुकबाक नामे नहि लय रहल छैक। आ ई नोर थिक, ओकर बुढ़ाड़ीक?
ओकर बीमारीक?
ओकर भूख-प्यासक?
नहि नहि नहि।
तँ ई नोर किएक?
केकरा लेल?
ई नोर थिक ओकर मनोरथक हत्याक। ई नोर थिक ओकर छिरिआइत सपनाक, जेकरा की ओ अपन शोणितसँ पटेने रहए।
ओकर नोर थिक की रुकबाक नामे नहि लय रहल छैक। मुदा मोन स्वप्नील दुनियाक इन्द्रधनुषी अतीतमे हिलकोर मारय लगलैक।
जखन ओ उनैस बीस वर्षक जवान युवक रहए। माए बड्ड मनोरथसँ ओकर ब्याह रचेने रहथिन। बाबू तँ कखन एहि दुनियासँ गेलखिन, ओकरा मोन धरि नहि। बाबूक सभटा भार माए उठेने रहथिन। केखनो ओकरा बाबूक कमी नहि होबय देलखिन। ब्याह भेलैक। घरमे एकटा सुधड़ कनियाँ एलखिन। समय खुशी-खुशी बीतय लगलै। मुदा ब्याहक पाँच वर्ष बादो ओकर घर नेनाक जन्म नहि भेलैक। कमलू दुनू व्यक्तिक तँ जे हाल, ओकर माएकेँ तँ आब नेनाक बिना दिन काटब मुश्किल भऽ गेलनि। फेर शुरू भेल कोबला-पातिक दौड़। माँ भगवतीक मंदिरमे पातरि राखल गेल। भगवान सत्यनारायणक कथाक कोबला राखल गेल। भगवतीक इच्छासँ ओहो दिन आएल। कमलूक कनियाँ गर्भवती भेली आ नियत समयपर एकटा सुन्नर बालकक जन्म भेलैक। सून घरमे बसंतक आगमन भऽ गेलैक। कमलूक माएक तँ खुशीक मारे धरतीपर पैर नहि टिकैत छलनि। छठिहारक दिन समूचा गाम माछ-भात खुआएल गेल। सत्यनारायण भगवानक कथा कराएल गेल। माँ भगवतीक घरमे पातरि देल गेल। बच्चाक नाम राखल गेल, राज! राज कमल। सम्पूर्ण वातावरण खुशीसँ गमकय लागल। जे आबय कमलूकेँ बधाइ दइत। आखिर दय किएक नहि? सात बरखक बाद जे बाप बनल रहए।
भगवतीक माया जखन नहि देबक रहनि नहि देलखिन। देबय लगलखिन तँ एककेँ बाद एकटा, कमलू चारिटा पुत्रक पिता बनल। घर गृहस्थी खुशी-खुशी चलय लगलै। एहि बीच कमलूक नोकरी सेहो लागि गेलैक। आर्थिक चिंताक समाधान सेहो भऽ गेलैक। चारू बेटाकेँ यथासामर्थ्य नीक जकाँ शिक्षा दिएलक। समयक कालचक्रमे, कमलूक माए अपन जीवनक सम्पूर्ण सुख भोगि स्वर्ग चलि गेली।
देखतए-देखतए कमलूक चारू पुत्र युवा भेल। ओकरो सभक घर बसबक समय आबि गेल। नीक लोक-बेद देख कए चारू बेटाक ब्याह केलक। कमलूक घर पोता-पोतीसँ भरि गेल। भरल-पुरल घर देखब शाइद नियतिकेँ मंजूर नहि। अथबा कमलूक भागमे एहिसँ आगाँक सुख भोगब नहि लिखल रहैक। आर्थिक युग आ परिवारक बोझसँ लदल, कमलूक चारू बेटा एक-एक कए रोजी-रोजगारक खोजमे ओकरा लगसँ दूर होइत गेलैक। चारू बेटा अपन-अपन परिवारक संगे शहरमे बसि गेल। रहि गेल कमलू आ ओकर संग देबक लेल ओकर अर्धांगिनी, पत्नी ओकर चारू पुत्रक माए।
जेना-तेना दुनू प्राणीक जीवन चलैत रहए। परञ्च केखन तक? जेना भोरक बाद साँझ होइत छैक, प्रत्येक शुरुआतक अंत होइत छैक, ओनाहिते प्रत्येक जीवनक मृत्यु। कमलूक कनियाँ सेहो जीवनसँ लड़ैत-लड़ैत कमलूक संग नहि दय पाओली आ एक दिन कमलूकेँ छोरि स्वर्ग लोक चलि गेली। आब कमलु नितांत असगर रहि गेल। आधा तँ कमलु ओहि दिन मरि गेल। बाँकी जीवन जे शेष रहैक, ओहिसँ निकलि कए अपन अतीतमे हरा गेल छल। मुदा नहि जानि कखन ओ अपन अतीतक दुनियासँ निकलि गेल रहए। अथबा कखन निकालि देल गेल रहए, बिधाताक हाथसँ। नोर सुखि कए ओकर गालपर पपड़ी जमि गेल रहैक। दुनू आँखि खुजल। ओहे खुजल आँखिसँ अपन अतीतकेँ निहारि रहल छल, कमलू। आओर ओहे खुजल आँखि आब शाइद केकरो बाट देख रहल छैक। शाइद अपन बेटा सभक।
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
बहुत नीक कथा
जवाब देंहटाएंनीक मार्मिक कथा, बहुत बहुत बधाई मनु जी
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