" भरल चगेंरी मुरही चुरा "
मैथिली साहित्य आ भाषा लेल समर्पित Maithiliputra - Dedicated to Maithili Literature & Language
शुक्रवार, 11 जनवरी 2019
कविता - भरल चगेंरी मुरही चुरा
" भरल चगेंरी मुरही चुरा "
शनिवार, 11 नवंबर 2017
मैथिलि - हनुमान चालिसा
लेखक - रेवती रमण झा " रमण "
|| दोहा ||
गौरी नन्द गणेश जी , वक्र तुण्ड महाकाय ।
विघन हरण मंगल कारन , सदिखन रहू सहाय ॥
बंदउ शत - शात गुरु चरन , सरसिज सुयश पराग ।
राम लखन श्री जानकी , दीय भक्ति अनुराग । ।
|| चौपाइ ||
जय हनुमंत दीन हितकरी ।
यश वर देथि नाथ धनु धारी ॥
श्री करुणा निधान मन बसिया ।
बजरंगी रामहि धुन रसिया ॥
जय कपिराज सकल गुण सागर ।
रंग सिन्दुरिया सब गुन आगर ॥
गरिमा गुणक विभीषण जानल ।
बहुत रास गुण ज्ञान बखानल ॥
लीला कियो जानि नयि पौलक ।
की कवि कोविद जत गुण गौलक ॥
नारद - शारद मुनि सनकादिक ।
चहुँ दिगपाल जमहूँ ब्रह्मादिक ॥
लाल ध्वजा तन लाल लंगोटा ।
लाल देह भुज लालहि सोंटा ॥
कांधे जनेऊ रूप विशाल ।
कुण्डल कान केस धुँधराल ॥
एकानन कपि स्वर्ण सुमेरु ।
यौ पञ्चानन दुरमति फेरु ।।
सप्तानन गुण शीलहि निधान ।
विद्या वारिध वर ज्ञान सुजान ॥
अंजनि सूत सुनू पवन कुमार ।
केशरी कंत रूद्र अवतार ॥
अतुल भुजा बल ज्ञान अतुल अइ ।
आलसक जीवन नञि एक पल अइ ॥
दुइ हजार योजन पर दिनकर ।
दुर्गम दुसह बाट अछि जिनकर ॥
निगलि गेलहुँ रवि मधु फल जानि ।
बाल चरित के लीखत बखानि ॥
चहुँ दिस त्रिभुवन भेल अन्हार ।
जल , थल , नभचर सबहि बेकार ॥
दैवे निहोरा सँ रवि त्यागल ।
पल में पलटि अन्हरिया भागल ॥
अक्षय कुमार के मारि गिरेलहुं ।
लंका में हरिकंप मचयल हू ॥
बालिए अनुज अनुग्रह केलहु ।
ब्राह्ण रुपे राम मिलयलहुँ ॥
युग चारि परताप उजागर ।
शंकर स्वयंम दया के सागर ॥
सूक्षम बिकट आ भीम रूप धारि ।
नैहि अगुतेलोहूँ राम काज करि ॥
मूर्छित लखन बूटी जा लयलहुँ ।
उर्मिला पति प्राण बचेलहुँ ॥
कहलनि राम उरिंग नञि तोर ।
तू तउ भाई भरत सन मोर ॥
अतबे कहि द्रग बिन्दू बहाय ।
करुणा निधि , करुणा चित लाय ॥
जय जय जय बजरंग अड़ंगी ।
अडिंग ,अभेद , अजीत , अखंडी ॥
कपि के सिर पर धनुधर हाथहि ।
राम रसायन सदिखन साथहि ॥
आठो सिद्धि नो निधि वर दान ।
सीय मुदित चित देल हनुमान ॥
संकट कोन ने टरै अहाँ सँ ।
के बलवीर ने डरै अहाँ सँ ॥
अधम उदोहरन , सजनक संग ।
निर्मल - सुरसरि जीवन तरंग ॥
दारुण - दुख दारिद्र् भय मोचन ।
बाटे जोहि थकित दुहू लोचन ॥
यंत्र - मंत्र सब तन्त्र अहीं छी ।
परमा नंद स्वतन्त्र अहीं छी ॥
रामक काजे सदिखन आतुर ।
सीता जोहि गेलहुँ लंकापुर ॥
विटप अशोक शोक बिच जाय ।
सिय दुख सुनल कान लगाय ॥
वो छथि जतय , अतय बैदेही ।
जानू कपीस प्राण बिन देही ॥
सीता ब्यथा कथा सुनि कान ।
मूर्छित अहूँ भेलहुँ हनुमान ॥
अरे दशानन एलो काल ।
कहि बजरंगी ठोकलहुँ ताल ॥
छल दशानन मति के आन्हर ।
बुझलक तुच्छ अहाँ के वानर ॥
उछलि कूदी कपि लंका जारल ।
रावणक सब मनोबल मारल ॥
हा - हा कार मचल लंका में ।
एकहि टा घर बचल लंका में ॥
कतेक कहू कपि की -,की कैल ।
रामजीक काज सब सलटैल ॥
कुमति के काल सुमति सुख सागर ।
रमण ' भक्ति चित करू उजागर ॥
|| दोहा ||
चंचल कपि कृपा करू , मिलि सिया अवध नरेश ।
अनुदिन अपनों अनुग्रह , देबइ तिरहुत देश ॥
सप्त कोटि महामन्त्रे , अभि मंत्रित वरदान ।
बिपतिक परल पहाड़ इ , सिघ्र हरु हनुमान ॥
मान चित अपमान त्यागि कउ ,
रेवती रमण झा "रमण "मो no - 91 9997313751
हम मूर्ख समाजक वाणी छी
सोमवार, 30 अक्टूबर 2017
गजल
सोमवार, 15 मई 2017
भक्ति गजल
हम्मर अँगना मैया एली
गमकै चहुदिस अड़हुल बेली
धन हम छी धन हम्मर अँगना
मैया जतए दर्शन देली
आबू बहिना संगी हम्मर
मैया संगे सामाँ खेली
जे किछु अछि एखन हमरा लऽग
ओ सबटा मैया दय गेली
बड़ भागसँ ‘मनु’ भेटल अवसर
मैया हमरो सेबा लेली
(मात्राक्रम, सब पाँतिमे आठ-आठटा दीर्घ)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
शनिवार, 6 अगस्त 2016
गजल
शुक्रवार, 5 अगस्त 2016
बेटाक बाप
रभसल
मामासार (बीहनि कथा)
गजल
साँप चलि गेल लाठी पीटे रहल छी
बाप मुइला पछाइत भोजक टहल छी
पानि नै अन्न कहियो जीवैत देबै
गाम नोतब सराधे लोकक कहल छी
पानि आँखिक सभक दुनियामे मरल अछि
लाज भरना द हम ताड़ीमे बहल छी
केकरा हम हृदय अप्पन खोलि कहबै
लोक खातिर अनेरे धेने जहल छी
सुनि क हम्मर गजल जग पागल बुझैए
दर्द मुस्कीसँ झपने ‘मनु’ सब सहल छी
(बहरे असम, मात्राक्रम 2122-1222-2122)
मंगलवार, 21 जून 2016
गजल
हम तँ ढोलक छी सगर बाजिते रहलहुँ
बात सुनलक नहि कियो पीबिते रहलहुँ
प्रेम मोनक बंद रहिगेल मोनेमे
गप्प कोना ई कहब सोचिते रहलहुँ
छल जकर सभ आश ओ छोरि चलि देलक
दर्द लेने मोनमे जीविते रहलहुँ
फाड़ि देखायब करेजा तँ मानत के
तेँ अपन टूटल हिया जोड़िते रहलहुँ
बंद भेलै ई शराबो करत की ‘मनु’
आँखि पथने गाममे ताकिते रहलहुँ
(बहरे कलीब, मात्राक्रम - 2122-2122-1222)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


