साँप चलि गेल लाठी पीटे रहल छी
बाप मुइला पछाइत भोजक टहल छी
पानि नै अन्न कहियो जीवैत देबै
गाम नोतब सराधे लोकक कहल छी
पानि आँखिक सभक दुनियामे मरल अछि
लाज भरना द हम ताड़ीमे बहल छी
केकरा हम हृदय अप्पन खोलि कहबै
लोक खातिर अनेरे धेने जहल छी
सुनि क हम्मर गजल जग पागल बुझैए
दर्द मुस्कीसँ झपने ‘मनु’ सब सहल छी
(बहरे असम, मात्राक्रम 2122-1222-2122)
© जगदानन्द झा 'मनु'
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें