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शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

गजल

साँप चलि गेल लाठी पीटे रहल छी

बाप मुइला पछाइत भोजक टहल छी

 

पानि नै अन्न कहियो जीवैत देबै

गाम नोतब सराधे लोकक कहल छी

 

पानि आँखिक सभक दुनियामे मरल अछि

लाज  भरना द हम ताड़ीमे बहल छी

 

केकरा हम हृदय अप्पन खोलि कहबै

लोक खातिर  अनेरे धेने जहल छी

 

सुनि हम्मर गजल जग पागल बुझैए

दर्द मुस्कीसँ झपने ‘मनु’ सब सहल छी

 

(बहरे असम, मात्राक्रम  2122-1222-2122)

© जगदानन्द झा 'मनु' 

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