मैथिली साहित्य आ भाषा लेल समर्पित Maithiliputra - Dedicated to Maithili Literature & Language
सोमवार, 30 अक्टूबर 2017
गजल
सोमवार, 15 मई 2017
भक्ति गजल
हम्मर अँगना मैया एली
गमकै चहुदिस अड़हुल बेली
धन हम छी धन हम्मर अँगना
मैया जतए दर्शन देली
आबू बहिना संगी हम्मर
मैया संगे सामाँ खेली
जे किछु अछि एखन हमरा लऽग
ओ सबटा मैया दय गेली
बड़ भागसँ ‘मनु’ भेटल अवसर
मैया हमरो सेबा लेली
(मात्राक्रम, सब पाँतिमे आठ-आठटा दीर्घ)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
शनिवार, 6 अगस्त 2016
गजल
शुक्रवार, 5 अगस्त 2016
बेटाक बाप
रभसल
मामासार (बीहनि कथा)
गजल
साँप चलि गेल लाठी पीटे रहल छी
बाप मुइला पछाइत भोजक टहल छी
पानि नै अन्न कहियो जीवैत देबै
गाम नोतब सराधे लोकक कहल छी
पानि आँखिक सभक दुनियामे मरल अछि
लाज भरना द हम ताड़ीमे बहल छी
केकरा हम हृदय अप्पन खोलि कहबै
लोक खातिर अनेरे धेने जहल छी
सुनि क हम्मर गजल जग पागल बुझैए
दर्द मुस्कीसँ झपने ‘मनु’ सब सहल छी
(बहरे असम, मात्राक्रम 2122-1222-2122)
मंगलवार, 21 जून 2016
गजल
हम तँ ढोलक छी सगर बाजिते रहलहुँ
बात सुनलक नहि कियो पीबिते रहलहुँ
प्रेम मोनक बंद रहिगेल मोनेमे
गप्प कोना ई कहब सोचिते रहलहुँ
छल जकर सभ आश ओ छोरि चलि देलक
दर्द लेने मोनमे जीविते रहलहुँ
फाड़ि देखायब करेजा तँ मानत के
तेँ अपन टूटल हिया जोड़िते रहलहुँ
बंद भेलै ई शराबो करत की ‘मनु’
आँखि पथने गाममे ताकिते रहलहुँ
(बहरे कलीब, मात्राक्रम - 2122-2122-1222)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
सोहागिन
दुनू गोटा अप्पन अप्पन आधा बर्फमलाइ खेने होएब कि, सा "जँ हम अहाँक सामने मरि गेलौं तँ हमर सारापर चबूतरा बना देब ।"
मेघ धरि उँच उँच पहाड़, चारू कात प्राकृतिक सौंदर्य, मखमल सन घास, स्वर्गसन वातावरण, बर्फमलाइ केर आनन्दक बिच अचानक एहेन गप्प सुनि, बर्फमलाइ हमर मुँहसँ छूटि हाथमे ठिठैक गेल । कनिक काल सा केर मुँह पढ़ैक असफल प्रयास केलाक बाद; "अवस्य एकटा नीक चबूतरा । जँ हम पहिने मरि गेलौं तँ एतेक व्यवस्था ज़रूर कय जाएब जे एकटा नीक चबू.... "
बिच्चेमे सा हमर मुँहकेँ अप्पन हाथसँ दाबैत, "नीक नहि साधारणे चबूतरा मुदा अहाँक हाथे आ ओहिपर लिखल हुए "सोहागिन सा" ।
@ जगदानन्द झा 'मनु'
प्रेम
आइसँ तीस वर्ष पहिने, हमरे संगे संग नमी वर्ग धरि पढ़ै बाली, सुन्दर, चंचल मात्र मूठ्ठी भरि डाँड़ बाली सु.....
"कि प्रेम इहे छैक की मात्र देहक प्रजनन अंगपर एकाधिकार बना कय राखैमे सफल भेनाइ?"
बेगरता
अगिला जनम
“ठीक छै ! अगिला जन्म अगिला जन्ममे देखल जेतै, एहि जन्मक आनन्द तँ लए लिअ। आ अगिला जन्ममे ओहि हिजड़ाक ब्याह जँ अहिँक संगे भए गेलहि तँ ।"
मुँहझौँसा
“छोर, मुँह झौँसा किएक नहि सुतए देत, अपने तँ ओ बिछानपर परैत मातर कुम्भकरन जकाँ सुति रहल आ हम भरि राति कोरो गनैत बितेलहुँ।”
एसगर - प्रेम बीहनि कथा
बाउ - "तु एतेक कनै किएक छेँ?"
सुधा बाउ केर दुनू हाथ खीच, ओकर हाथपर अपन मुँह रखैत, "हम कहाँ कनि रहल छी।"
ओकरा उदास आ कनैत देखि बाउ दूटा बस छोरि देलकै ।
"हमरो ल' चलू, अहाँ बिनु हम एहिठाम नहि जी सकब । ओहीठाम हम सबकेँ कहबै जे हम अहाँक नोकरानी छी । अहाँक नेनाकेँ खेलाएब, घरमे पोछा लगाएब, बर्तन धोब ।"
ई कथन छल एकटा बिधबा माएक जेकर बेटा दिल्ली बाली संगे ब्याह कय दिल्लीए बसि गेल छल आ माए एसगर गाममे ।
@ जगदानन्द झा 'मनु'