कोना अहाँकेँ घुरि कहब आबै लेल
बड़ दूर गेलौं टाका कमाबै लेल
नै रीत कनिको प्रीतक बुझल पहिनेसँ
टूटल करेजा अछि किछु सुनाबै लेल
ठोकर कपारक लागल जखन सबतरिसँ
नहि नोर आँखिक बचलै नुकाबै लेल
सदिखन अहाँ बैसल मोनमे बनि मीत
की दूर गेलौं हमरे कनाबै लेल
कोना क ‘मनु’ कहतै आब अप्पन दोख
घुरि आउ फेरसँ दुनियाँ बसाबै लेल
(बहरे सलीम, मात्रा क्रम 2212-2221-2221)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मन’
बड्ड सुन्नर ग़ज़ल. सत्ते टाका कमाबैक लेल कते तरहक बिरह से गुज़रय परय छै.
जवाब देंहटाएंआ कनी ई आखरक जांच ब्लॉग पर सय हटा लेबे तै टिप्पैन करय मैं सुबिधा हेते सब कय.
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